आज कल बड़े मज़े हैं...

ह्म्म्म...
इन दिनों मिजाज़ ही अलग है
मौसम ही शायद बदल गया है

एक पुरानी कविता याद आती है...
"कहो जी बेटा राम सहाय
इतने जल्दी कैसे आए?
अभी तो दिन के दो ही बजे हैं
कहो आजकल बड़े मज़े हैं"

बस यही हाल आजकल अपना है... सुबह देर से उठाना, रात में देर तक जग सकना, bed-tea उठते ही हाँथ में होना... आहा... लगता है जैसे बरसों की कैद ख़त्म कर किसी holiday पर आ गयी हूँ...
बोले तो पूरी ऐश... no झंझट... सब कुछ फटाफट...
शायद इसीलिए एक बुरी आदत भी लग रही है... आलस की...
खैर... आजकल पापा के यहाँ हूँ... resignation letter पटक ही आई हूँ, तो टेंशन भी नहीं है...
पापा अच्छे-खासी govt. post पर हैं तो किसी चीज़ की कमी है ही नहीं... सुबह से "बड़ी दीदी जी, चाय" का राग शुरू होता है... मैं हूँ भी teaholic तो चाय के बिना तो काम ही नहीं चलता, बस taste बदलता रहता है... हाँ मम्मी जरूर कहती रहती हैं कि आदत बिगड़ जाएगी... पर हो गया यार, बड़े दिनों बाद ये आराम का वक़्त मिल रहा है... और वो भी न जाने कितने दिनों के लिए...
इस समय तो बस पुराने बचे, आधे-अधूरे novels ख़त्म करने में लगी हूँ... अपनी खुद की कुछ कवितायेँ जो यूँहीं लिखी फ़िर बीच में ही छोड़ दी उन्हें पूरा करने में जुट गयी हूँ...
आख़िर वक़्त मिला है, भले ही अपने मन का हो... तो करना भी चाहिए वही जो दिल चाहे...
सुबह भी बड़े दिनों बाद continuous गाने सुने... वर्ना बस पसंद आया, download किया पर सुन नहीं पाते थे, या फ़िर शुरू की कुछ लाईन्स... या फ़िर एक-दो बार बस...
पर आजकल... बस ऐश ही चल रही है...
हाँ मम्मी-पापा को जरूर कुछ ख़ास बना कर खिलाया... वो भी मेरा मन हुआ इसीलिए, वर्ना पापा ने मन किया था...
बस एक साल में ऐसे ही कुछ दिन मिल जाएं... और क्या चाहिए...
पर तब भी न जाने क्यूं कुछ रिश्तों में शायद कुछ ग्रहण सा लग गया है... जब देखो बहस... और इस समय में load लेने के मूड में नहीं हूँ... और न ही लड़ने-झगड़ने में... इसीलिए कन्नी काट लेती हूँ और निकल लेती हूँ पतली गली से... बस शायद बचने की कोशिश करती हूँ अभी इस सब चीज़ों से... वर्ना, short-tempered तो मैं हूँ ही...
ये भी जानती हों कि वो लोग अभी इस पोस्ट को पढ़ भी रहे होंगें... कुछ गुस्सा और कुछ हंसी, दोनों मूड में होंगे... छोडो न यार... ख़त्म करो... फिलहाल में मूड में नहीं हूँ लड़ने के... बाद में निपटेंगें...
खैर...

आप सभी को आनेवाले वर्ष की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं...

बाकी मैं पहली तारीख को तो आउंगी ही...

काश मुहब्बत कुछ आसाँ होती... तो...


काश मोहब्बत को पढ़ पाना
इतना आसाँ होता... तो...
एक-आध लाईब्रेरी हम भी बना लेते...

काश मोहब्बत को समझ पाना
इतना आसाँ होता... तो...
दो-चार गुरुओं को ख़ास हम भी बना लेते...

काश मोहब्बत को देख पाना
इतना आसाँ होता... तो...
टेलिस्कोप/माईक्रोस्कोप हम अपनी आँखों में लगवा लेते...

काश मोहब्बत को लिख पाना
इतना आसाँ होता... तो...
दो-चार महफ़िलें हम अकेले ही सजा लेते...

पिछले दिनों...

पिछले कुछ दिन बड़े अजीब बीते...
बहुत सारे परदे उठे,
बहुतों की सच्चाई सामने आई...
पहले तो यकीन नहीं हुआ,
कि ये वाकई सच है...
दिमाग ने मान भी लिया...
पर दिल को समझाना जरा मुश्किल था...
धीर-धीरे वो भी समझ गया

लगा जैसे किसी जोर का तमाचा मार
नींद से जगा दिया दिया हो मुझे...
और एक सुन्दर-सा ख्वाब
जो देख रही थी मैं
उसे तोड़ दिया हो
चकनाचूर कर दिया...
तिमिर से निकाल मुझे
अचानक
दोपहर कि चिचालती धुप में ला खड़ा किया हो...
आँखे भी मिलमिला गयीं थीं...

पर धीर-धीरे उन्होंने भी
साचा के उजाले को,
उसकी तपन को अपना लिया...

सबसे बड़े आश्चर्य की बात
न जाने कहाँ से मुझमें
ये सहनशक्ति आ गयी
कि मैं उन चेहरों को
देख मज़े ले रही थी
मुस्कुरा रही थी
मुझे खुद नहीं पता कि
मेरा comfort-zone
अचानक इतना बड़ा कैसे हो गया...

पर...
जो हुआ
बहुत खूब हुआ
अच्छा हुआ...
मुझे इस यथार्थ को जाने का संयोग प्राप्त हुआ...

उन सभी चेहरों को
उन मुखौटों को शुक्रिया...

और माई चली गई...

सुबह ही तो ज़रा-सी तबियत बिगड़ी थी... सिर्फ सर ही घूमा, थोड़ी-दी उल्टी हुई... पर रात में तो खाना खाई थी... अचानक... रात को 11 बजे... वो हम सब को छोड़ कर चली गई...
न जाने और क्या-क्या अचानक होगा???
पूरी तरह plan बनाया था कि, इस बार उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी... और मन भी बहुत था उनसे मिलने का...
वैसे तो वो मेरे दोस्तों की "दादी" थी, पर वो दोनों भी उन्हें माई बोलते थे इसीलिए वो सबकी माई बन गई थीं...
परसों रात से न तो किसी काम में मन लग रहा है और न ही उन दोस्तों से बात करने की हिम्मत हो रही है...
वो कुछ दिन और रुक जाती तो मिल तो लेती मैं...
सब न कहा कि कुछ लिख, पर मन ही नहीं हुआ... सोचा मन हटाने के लिए पुरानी कविताओं को पूरा करने की कोशिश करूँ, पर जो शब्द लिखे थे वो भी समझ नहीं आ रहे थे, आगे लिखती कैसे???
सच कहूँ तो यहाँ भी यूँही लिखे जा रही हूँ जो भी मन में आ रहा है... जाने कौन-सा शब्द किससे मिल रहा है, या नहीं... कोई चिंता नहीं... कुछ नहीं...
परसों रात ही लग रहा था भाग कर जाऊं और उनसे ऐसे ही लिपट कर रो लूं... पर शायद बदकिस्मती ये ही कहलाती है... और मन, वो तो इतना पापी है कि क्या कहूँ???
पहली बार अपनी intuitions पर इतना गुस्सा आ रहा है, चिढ हो रही है... सुबह जब उनकी तबियत कि खबर मिली थी तभे मन में आया था कि बोल दूं कि, "देखे रहना"... फ़िर लगा नहीं यार, ऐसा नहीं सोचते... अपने-आप को समझाया, और रात में...
रिकोर्ड है कि जब भी मेरी और माँ कि कमर दर्द होती है, वो एक अजीब-सा दर्द होता है जो न तो दवाई से ठीक होता है और न ही मालिश से, तब कुछ-न-कुछ अभशगुन होता है...
अभी भी ऐसा ही हो रहा था...
मेरा चचेरा भाई भी नाडियाट में admit है, उसके दोनों kidney fail हो गई हैं, उसकी भी तबिओयत रोज़ खराव्ब होती है... इसीलिए doctors transplant करने की process आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं... बस उसी का डर लगता है रोज़... जब भी फ़ोन आता है, किसी का भी हो, बस भगवान से अर्जी लगाना पहले शुरू कर देते हैं कि सब ठीक रखना...
कहाँ हम उसे ताक कर बैठे थे और कहाँ ये खबर...
हे भगवान!!! वाकई तुम्हारी लीला समझ से बाहर है...
We will miss you MAAI...

वो कलम...


काश ऐसी कलम ईज़ाद हुई होती
जो बस यूँही
चलती रहती बिना रुके
और मन की हर बात
लिख जाती
बिना चुप हुए बीच में...

जिसे सोचना न पड़ता
कि, किस बात को लिखना है किस तरह???

वो तो बस
चलती मदमस्त पवन की तरह
और उड़ा ले जाती
इस गम और ख़ामोशी के बादलों को कहीं दूर...
या बहती उस चंचल नदिया की तरह
जो सारे कलरव खुद में समेटती
अग्रसर होती है अपनी मंज़िल की ओर...
और एक दिन,
शांत हो जाती है मिलकर
उस अथाह समुद्र से
जो न जाने
कितनों का दुःख,
कितना शोर समेटे हुए है
अपने-आप में...
परन्तु तब भी शांत है...

पर कभी-कभी वो भी उछाल मारता है
लांघ कर अपनी सीमा
जताता है शायद,
कि,
अब उसका भण्डार भर गया है
या
उसकी कलम भी कहीं खो गयी है...

बनारस...

ये है एक पावन धरती
यहाँ है गंगा, भोलेनाथ
और न जाने कितनी संस्कृतियों का मेल...
मत करो ये शोरगुल, ये धमाके
और ये लाश बिछाने का खेल...
कुछ और नहीं कर सकते
तो इतना ही कर दो
अपने नाम के आगे से ये "INDIAN" ही हटा दो...

माँ का बर्थडे था...

4 दिसंबर को माँ का बर्थडे था, और इसीलिए तीन दिन तक मैं नदारद थी...
हुआ यूं, कि बर्थडे में माँ को गिफ्ट देने पर विचार चल रहा था कि क्या दें और क्या नहीं... क्योंकि माँ जो चाहती हैं उन्हें मिल जाता जाता है, तो कुछ ऐसा नहीं था जो वो चाहती हों और उनके पास न हो...
तो मैनें उन्ही से पूछ लिया कि उन्हें क्या गिफ्ट चाहिए... पहले तो उन्होंने मना कर दिया कि "कुछ नहीं चाहिए", पर बहुत जिद करने पर बोलीं कि "फ़िर जो चाहिए वो तुम दे नहीं पाओगी।"
मैं भी सोच में पड़ गई कि ऐसा वो क्या माँगने वालीं हैं???
पहले तो लगा कि फॉर वही शादी कि बात होगी, फ़िर लगा कि चलो जो होगा वो देखा जायेगा... मैंने भी कह दिया कि "ठीक है, आप मांगिये आपको जो भी माँगना है, मेरे बस का हुआ तो पक्का दूंगी।"
उन्होंने कहा कि "तुम्हारे बस का ही है, बशर्ते तुम दोगी"
मैंने कहा... "ठीक है, आप मांगिये"
फ़िर तो जो माँ न कहा वो bouncer ही था...
उन्होंने कहा कि "मुझे तुम्हारा time चाहिए, तुम तीन दिन हम सबके साथ रहोगी। और उन दिनों में कोई काम नहीं और न ही blogging... "
फ़िर मैं करती भी क्या, चुपचाप उनकी आज्ञा का पालन किया और अच्छी बिटिया कि तरह पहुँच गई उनके पास... और तीन दिन न e-mails, न blogging, और ही ऑफिस का काम, हाँ बस mobile से दिन में एक बार फेसबुक स्टेटस अपडेट कर दिया...
3 को माँ-पापा के पास पहुंची, मस्त उन्हें खाना-वाना खिलाया.... उस दिन माँ को रसोई से छुट्टी दे दी थी... वैसे भी काटने-बीनने का काम नौकर कर देते हैं पर माँ को उस दिन खाना भी नहीं बनाने दिया... 4 को भे यही था, हाँ खाने में कुछ खास लोगों को बुलाया था, माँ कि एक सहेली भी थी, जो उनके साथ स्कूल में थीं...
5 को सोन-घड़ियाल सेंचुरी गए थे, मगर शाम हो जाने के कारण सिर्फ प्रजनन-केंद्र देखा... उसके बारे में अगली पोस्ट में बताउंगी...
मगर हाँ, कई दिनों बाद सबके साथ इतना time spend करके बड़ा अच्छा लगा...
ये रहा माँ के बर्थडे का केक...
आप भी enjoy कीजिये...

आज की पोस्ट यहाँ नहीं है...

जी हाँ सही पढ़ा आपने, आज मेरी पोस्ट प्रकाशित तो हुई है, परन्तु यहाँ, मेरे ब्लॉग पर नहीं...
आज मेरी लिखी एक कविता प्रकाशित हुई है S.M.Masoom ji के ब्लॉग "अमन का पैगाम" में...
सच कहूँ तो जब मासूम जी ने मुझसे इस विषय पर लिखने को कहा, तब बुद्धि काम ही नहीं कर रही थी... समझ नहीं आया कि मैं क्या लिखूं इस परा क्योंकि बड़े-बड़े लोग इस विषय पर लिख रहे थे, और मासूम जी उनकी रचनाएँ पोस्ट भी कर रहे थे... और इस लोगों के सामने मैं तो एक विद्यार्थी हूँ... और मेरी बुद्धि, गज़ब है... हमेशा उल्टी ही चलेगी... उन्होंने लिखने को कहा था कुछ और मैं लिख रही थी कुछ... {आप पढियेगा, तो खुद ही समझ जाएगें} ...
खैर, डरते-डराते उन्हें अपनी रचना भेज दी... और साथ में ये भी लिख दिया कि, "आप पहले देख लें, ठीक लगे तभी प्रकाशित करें"... कल{1/dec} उनका मेल आया कि आज मेरी रचना को प्रकाशित किया जा रहा है... यकीन मानिये, लगा था कि हो गया बेटा पूजा जितनी भी image बनी है आज सबका कचरा होना है... लगा था कि लोग न जाने क्या सोचेंगें??? कहेंगें... "अच्छी उल्टी खोपड़ी की लडकी है"
पर आज जो हुआ... unbelievable... सच... यकीन नहीं हो रहा कि लोगो को पसंद आ रहा है... लोग तारीफ कर रहे हैं... शायद किस्मत है कि लोग और मेरी ऐसी उल्टी-पुलटी रचनाओं को भी पसंद कर रहे हैं...
सबसे पहले मासूम जी को धन्यवाद, जिन्होंने मुझे लिखने का अवसर प्रदान किया... और फ़िर उन सभी लोगों को धन्यवाद जिन्होंने यूं मुझपर अपना आशीष बनाया और मेरी ऐसी रचना को भी पसंद किया...
बहुत-बहुत शुक्रिया...
रचना यहाँ है...
कौन-सा पैगाम... और किसके नाम...???

चलो थोड़े स्वार्थी हो जांए...

आज की इस दुनिया और इस life style में इतने busy हो गए हैं की हमारे पास अपने लिए ही वक़्त नहीं रह गया है... जिसे देखो बस भाग रहा है या एक fixed life जी रहा है, सब कुछ time-table के हिसाब से... जिंदगी न होकर train हो गयी है, चढ़ा दिया पटरी पर, और फुरसत... बस चली जा रही है... हम सबका ख्याल रखते सिवाय खुद के... पर ऐसा क्यूँ? क्या वाकई अब हमें २४ घंटे भी कम पड़ने लगे हैं या जो भी हम करते है वो बस इस rat-race में बने रहने के लिए...
कितना मुश्किल है न आज की इस दुनिया में सफल होना... हर competition में अपने आप को prove करना , पहले school, फिर college, फिर job और फिर घर... सबसे पहले एक position बनाने की चिंता और फिर उसे maintain करने की... वाकई कितनी कठिन हो गयी है हमारी life... या कहे तो हमारी so called life...
और फिर जो भी वक़्त बचा इस rat-race से वो हम दे देते है अपनों को, वो जो हमारे करीब हैं... आख़िर उनका भी तो कुछ हक़ है हमारी ज़िन्दगी में... उनकी ख़ुशी, उनका दुःख... ये सब भी हमारी ही जिम्मेदारियों का ही एक हिस्सा है... और फिर ये keyboard, जहाँ हम web-pages में जहा हम कभी कोई रिश्ता निभा रहे होते है तो कभी ख़ुशी और शांति तलाश रहे होते हैं... पर इन सबके बीच हम कहाँ हैं? एक ऐसा पल जिसे हम पूरी तरह अपना कह सकें... क्या कभी यूँ ही बैठे-बैठे आप खुद miss नहीं करते, क्या कभी बस यूँ ही बिना बात के मुस्कुराना या यूँ ही खुश जाना या कोई अनजानी-सी या कोई भूली-बिसरी धुन गुनगुनाने का मन नहीं होता? होता है न... पर हम नहीं करते... क्यों??? क्योंकि उससे हम अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं... हमारा time-waste हो सकता है...
क्या याद है की last-time आप कब खुश हुए थे, या क्या ऐसा किया था जिससे आपको ख़ुशी मिली हो? last-time कब किसी दोस्त को बिना काम के, बस यूँ ही हाल-चाल जानने के लिए phone किया था...
या कब e-mail forward करने की वजाय बस यूँ ही "hii" "how are you" . type करके भेजा था... कर सकते थे... पर नहीं किया... क्यों... time-waste... क्या वाकई अब हमारी खुशियाँ हमारे लिए सिर्फ time-wastage बन कर रह गयी है... यही रह गयी हमारी हमारी खुशियूं की पहचान...
नहीं न...
तो चलो एक शुरुआत करते हैं... थोड़े से selfish हो जाते हैं... हर दिन... यानी २४ घंटो से कुछ पल चुराते हैं... जो सिर्फ हमारे होंगे...

तो चलो ...
थोड़े स्वार्थी हो जाते हैं
कुछ पल चुराते हैं....
बहुत मुस्कुरा लिए औरों के लिए ,
चलो एक बार अपने लिए मुस्कुराते हैं...
बहुत हुआ दूसरों की धुन गुनगुनाना,
चलो अब अपनी एक धुन बनाते है...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
थक गए ये हाथ कागज़ में sketch बनाते-बनाते,
चलो अब आसमाँ में उंगलिया चलाते हैं...
बहुत हुआ एक ही ढर्रे में चलना,
चलो अब कुछ नया आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
जाने-पहचाने रास्तों पे चलना, बहुत हुआ,
चलो कुछ अनजान रातों की ओर कदम बढ़ाते हैं...
वही पुरानी recipes, वही पुराना स्वाद,
चलो कोई नया ज़ायका आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
अपनों से अपनापन निभाते ज़माने हो गए,
चलो किसी अजनबी को अपना बनाते हैं...
थक कर चूर हो गए यूँ ही भागते-भागते...
चलो कुछ पल आराम के बिताते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...

P.S. :-
ये मेरी एक पुरानी पोस्ट है... न जाने क्यूं आज इसे पढ़कर फ़िर से आप लोगों के साथ बांटने का मन हुआ... सो पोस्ट कर दी...

मेरा सब तेरा ही तो था...

मेरी रूह तो तेरी थी
साँसे भी तेरी ही थीं
मेरा हर लम्हा तेरे लिए थे
मेरी हर घड़ी भी तेरी थी...

मेरी हर याद में तेरा ही साया था
मेरी धडकनों में भी सिर्फ तू ही समाया था
मेरे कानों में आवाज़ तेरी ही थी
मेरी आँखों में तस्वीर तेरी ही समाई थी...

मेरे अहसासों में तू था
मैं महसूस भी बस तुझे ही करती थी
बात किसी की भी हो
मैं बात तेरी ही करती थी...

मेरी मंज़िल भी तू ही था
और था तू ही मेरा साहिल भी...
बस इन पन्नों की सफेदी में
उकेरे कुछ शब्द ही बस मेरे थे...

आज ये भी तुझमें शामिल हो गए...

लाली देखन मै भी चली...

"लाली मेरे लाल की, जित देखूं उत लाल...
लाली
देखन मै गयी, मैं भी हो गयी लाल..."


पंक्तियों को पढ़
सज-सँवर,

प्रेम-रस में डूब कर...
अपने नन्हें हाथों में
कुछ कोमल सपनों की पोटली ले
निकली थी

मैं भी अपने लाल को खोजने...

बाहर आकर देखा
तो मंज़र कुछ और ही था...

हर दरवाज़े पर एक लाल खोपड़ी टंगी थी...
और नीचे लिखा था... DANGER... खतरा...
प्यार के रास्ते में ख़तरा???

बात समझ के परे थी ...
मैं आगे चल पडी...


जो दिखा...
उसमें...
कहीं लडकी होने के कारण

बुरी नीयतों का खतरा...
कहीं जात-पात का खतरा
कहीं रिवाजों के टूट जाने का खतरा...
तो कहें ऊँच-नीच का खतरा

कहीं सह्गोत्री होने के कारण
ऑनर-किलिंग का खतरा...
तो कहीं नकास्ल्वाद,
आतंकवाद का खतरा...
या फ़िर,
प्रादेशिक अलगाव या भाषा अलग होने से
पहचाने जाने का खतरा...

कहीं धोखे-से किसी दरवाज़े को

छूने की कोशिश भी करती...
चरों ओर से खतरनाक आवाज़ गूंजती...
"खतरा... ख़तरा... खतरा..."
इतना सुन
ऐसा लगा मनो
फट पड़ेंगीं दिमाग की नसें...
पागल हो जाउंगी मै इस गर्जना से...
और टूट जायेंगे मेरे सपने सच होने से पहले...

इसी डर से समेट ली
अपनी पोटली अपने सीने में

और चीख पड़ी थी ज़ोर से...

पर ध्यान आया अचानक
अपने नन्हें सपनों का
फटाफट खोली वो पोटली...

पर...
तब तक...
वो त्याग चुके थे अपने प्राण
और मैं नहा रही थी उनके लहू से...


तब याद आया कि...
लाल रंग केवल प्रेम का नहीं
"खतरे" का सूचक भी है...
और अब उन पंक्तियों का मतलब मैं समझ भी गयी थी
और उन्हें आज के युग में चरितार्थ भी कर रही थी...

वाकई...

"लाली मेरे लाल की, जित देखूं उत लाल... लाली देखन मै गयी, मैं भी हो गयी लाल..."

आ गया प्रीलिम का रिसल्ट... ;)

जैसा की मैंने आप सभी को अपने प्रीलिम इंटरव्यू के बारे में बताया था... तो बनी बात है की आज नहीं तो कल रिसल्ट भी आना ही था...
फ़ोन बजा, माँ ने उठाया...
चाचा का था...
"हाँ अरुण"... माँ न कहा, अरुण मेरे तीसरे नंबर के चाचा का नाम है, और वो ऐसे मामलों में हमारे सबसे करीब हैं...
तो चाचा और माँ की जो भी बात हुई हो। मुझे जो पता चला वो ये, कि लड़के की तरफ से हाँ है, न तो उसकी कोई डिमांड है और न ही और कोई मांग। बस वो मुझसे बात करना चाहता है और चाहता है कि मै शादी के बाद जॉब न करूँ।
जॉब करूँ? पर क्यूं? जॉब और शादी का क्या कनेक्शन है?
"कैसा बकवास लड़का है?" तुरंत मेरे मुंह से निकला... और माँ का पारा हाई...
मै समझ गयी माँ गुस्सा हो गयी हैं...और मुझे समझाया कि मैं एक बार उससे बात तो करून... खैर, माँ गुस्सा देख मैं तो चुपचाप वहां से खिसक गयी
उनका गुस्सा होना लाजमी भी था, आख़िर वो उनकी सहेली औए पापा के दोस्त का लड़का था, वो घर में सभी को पसंद था... आख़िर उसकी लम्बाई जो इतनी थी... मुझे मैच करता था।
मगर ये सोच... न बाबा न... मुझसे तो नहीं हो पाएगी ये शादी भई।
मैनें भी तुरंत अम्मा; अम्मा यानि मेरी बड़ी माँ, हमारे यहाँ ऐसे फैसले सभी की रजामंदी से होते हैं, वो घर के बड़े हैं और मैं उनकी लाडली; हाँ तो मैंने तुरंत अम्मा को फ़ोन किया और सीधे पूछा "और कोई गन्दा लड़का नहीं मिला था आपको मेरे लिए?" आवाज़ ज़रा-सी रोनी और लाड़ वाली कर ली थी... भई नौटंकी जो करनी थी और उन्हें पटाना जरूरी था...
अम्मा ने कहा "तुम चिंता मत करो, यही बात मुझे भी परेशान कर रही है। आने दो तुम्हारे बाबूजी को मैं बात करती हूँ"। बाबूजी यानि मेरे बड़े पापा, माँ कहती है कि मुझे उन्हीं के लाड़-प्यार ने बिगाड़ रखा है...
पर चलो... अम्मा न खुद भी यही सोचा... सो अब मै पूरी तरह से बेफिक्र हूँ... क्योंकि मुझे तो वो पहले से पसंद नहीं था... मैं क्या, मेरी बहनों न भी उसे रिजेक्ट कर दिया था... बस ये सोचिये कि मज़ा आ गया...

इन्ही पन्नों पर...

अपनी हर मुलकात की,
हर बात,
अपनी हर रात का,
हर अहसास,
यूंही कैद कर लेना चाहती हूँ...
इन्हीं पन्नों पर...

हर वो खुशी,
जब भी आई हंसी,
हर वो गम,
जब आँखें हुईं नाम,
यूंही लिख देना चाहती हूँ कलम से...
इन्हीं पन्नों पर...

हर वो सदा,
जो याद आ गयी,
हर वो अदा,
जो इस मन को भा गयी,
यूंही सरे पल समेट लेना चाहती हूँ...
इन्हीं पन्नों पर...

हमेशा के लिए...

आगमन की खबर...

सुबह आँख मीचते हुए
नींद में ही करवट बदली जब,
किसी नन्हे उजाले ने
मेरा हाँथ थामा था...
जाने क्या...
किसी सफ़र में चलने को कह रहा था शायद...

बस मैं भी चल पड़ी थी
उसके पीछे-पीछे
एक अंजान रस्ते में...
पर यकीन था कि
रास्ता सही चुना है मैंने
आख़िर वो ख्वाब था मेरा
यकीन करना तो लाज़मी था...

जब चल रही थी उस रास्ते पर
कुछ नर्म-सी घांस और ओस का
अहसास हुआ था पैरों को,
ठंडी-सी हवा न छुआ था मुझे,
कुछ पत्तों की सरसराहट भी पड़ी थी
कानों में मेरे,
बहते पानी का शोर भी
समझ आया था,
जैसे कहीं दूर कोई नदी हो,
चिड़ियों की चहचहाहट भी सुनाई दी थी
जैसे उड़ा हो कोई झुण्ड आसमाँ में
एक पेड़ से दूसरे में जा बैठने के लिए....

फ़िर धीरे से करवट बदली जब दुबारा...
और आँखे हल्की-सी खोलीं थीं...
दरवाज़े से एक धुंधली-सी परछाईं
झाँक रही थी,
खिड़की से पर्दा हटाया
लगा जैसे कोई यूँही निकला हो वहां से

जिज्ञासा बढ़ी
बिस्तर छोड़ा
दरवाज़ा खोला
बाहर झाँका
जिसे पाया
वो
हल्की धुंध में लिपटी
गुलाबी ठण्ड थी
ठण्ड के आगमन की खबर के साथ...

आज छोटी दिवाली है...

देव-उठनी ग्यारस कहिये
या फ़िर कहिये तुलसी विवाह...
हमारे लिए तो ये छोटी दिवाली है...

आँगन धुलवाया है
आखिर वहां कुछ रंगों को सजाना जो है
दिए भी निकल आए धूप में
आख़िर उन्हें शाम को जगमगाना जो है...
सिंघाड़े, शकरकंद उबल गए
बेर, गन्ना, चने की भाजी, गेंहू की बाल...
लगभग हो गया सारा इंतजाम
शाम को भगवान को मनाना जो है...

दिवाली पर अपने घर पर थी
अम्मा-बाउजी, माँ-पापा
चाचा-चाची, भैया-भाभी
और सारे भाई-बहन...
और-तो-और, सारे मोहल्ले की रौनक...
पर आज,
कुछ नहीं,
कोई नहीं,
सिर्फ वही रंग, दिए और यादें...
शायद इसीलिए आज हमारी छोटी दिवाली है...

आप सभी को दिवाली एवं ईद-उल-जुहा की हार्दिक शुभकामनाएं...

कल प्रिलिम इंटरव्यू था...

जी हाँ... सही कह रही हूँ, कल मेरा प्रीलिम इंटरव्यू था, यानि प्रथम चरण...
अब आप सोचेंगे की कैसा इंटरव्यू और कैसा प्रथम चरण???
तो जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में मैनें "पूजा की शादी" वाली चर्चा का ज़िक्र किया था... तो कुछ लोग कुछ ज्यादा ही तेज़ निकले, अभी बात भी नहीं हुई कि घर ही पहुँच गए... उनका कहना था की उन्हें दिवाली की शुभकामनाएं देने आना है। माँ-पापा को सबकुछ पता था कि वो लोग क्यूं आ रहे हैं, पर मुझसे किसी न कुछ नहीं कहा। वो लोग ये तो कह नहीं सकते थे की मुझे देखने आ रहे हैं, क्योंकि देख तो मुझे कई बार चुके थे, आए तो बस मेरा मंतव्य जानने थे। मुझे यहाँ से इतनी दूर; 180 किमी बुलाया, सोचिये ज़रा रात में, म.प्र. की सड़कें और दूसरे दिन अचानक पता चले की लड़के के माँ-बाप आपको देखने आ रहे हैं, क्या हालत होगी? सबसे ज्यादा गुस्सा तो माँ-पापा पर आया कि "आप लोग तो मुझे बता सकते थे न?" खैर...
पर जैसा मैंने सोचा था वैसा तो कुछ हुआ ही नहीं... न मुझसे कोई सवाल न जवाब... बस आए, बैठे, गप्पे मारी, खाना खाए और चले गए। बस एक लडकी; जो लड़के की चचेरी बहन थी; वो मुझे घूर-घूर कर देख रही थी... न जाने क्या खोज रही थी, या मैं उसे दूसरे गृह की लग रही थी...
अब आप सोचेंगे कि जब कोई सवाल-जवाब हुआ ही नहीं तो मैंने इसे प्रीलिम इंटरव्यू क्यूं कहा? वो इसलिए क्योंकी अभी लड़के के माँ-पापा आए हैं, जो प्रीलिम स्टेज थी, फ़िर लड़का और उसकी बहन आयेंगे, जो मेन्स यानि सेकोन्दरी एंड फिनाल इंटरव्यू होगा। ऐसा लगता है जैसे शादी न हो गयी "लोक सेवा आयोग" के एक्साम्स हो गए.
क्या प्रोब्लम है इन लोगों का? एक बार में नहीं आ सकते क्या? खैर जो होगा देखा जायेगा... अभी तो मैं बस अपने काम पर और थोडा-सा लिखने पर ध्यान देना चाहती हूँ...

तो हम वापस आ गए...

हाँ जी...
तो दिवाली भी आ कर चली गयी, दिए भी स्टोर-रूम पहुँच गए, मिठाइयाँ भी ख़तम हो गईं, सब अपने-अपने काम में वापस लग गए... बस झालर की सजावट अभी भी वहीँ है, वो भी सिर्फ छोटी दिवाली यानी एकादशी तक... उसके बाद वो भी स्टोर में चली जाएगी... और हम भी घर से वापस कार्यस्थल आ गए...
जब मेल बॉक्स चेक किया, बड़ा अच्छा लगा... ढेर सारी बढ़ियाँ आईं थीं... मुझे बड़ी ख़ुशी होती है जब लोग मुझे याद रखते हैं... उन सभी लोगों को ढेर सारा शुक्रिया...
इस दिवाली कुछ नया करने की सोची थी, बहुत कुछ किया भी... जैसे, मिठाइयों की जगह फलों का उपयोग, मोमबत्तियों की जगह दीयों का उपयोग, और भी बहुत कुछ... लोगों को भी समझाने की कोशिश की, कुछ न सुनी, कुछ न समझी और कुछ वही पुराने, न सुनना न समझना" वाले फंडे में चले... खैर... उनसे मुझे ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता... पर कुछ लोगों के ऊपर गुस्सा भी आया, उनका टॉपिक ही नहीं बदला। जबसे घर आए, और जब तक चले नहीं गए, तब तक सिर्फ एक ही राग अलापते रहे... "पूजा की शादी"। मन तो आया कि पूछ लूं, कि उन्हें क्यूं इतनी चिंता है, उनके घर में भी तो लडकियां हैं उन्हें देखें... लग ही नहीं रहा था कि दिवाली मानाने आए हैं, लग रहा था जैसे मेट्रीमोनिअल वाले घर आ गए हों... और होड़ लगी हो कि ये कांट्रेक्ट किसे मिलता है... एक महाशय तो एक कदम और आगे, कहने लगे "न हो तो एक बार लड़का-लडकी मिल लें फ़िर देखा जाएगा, लड़का अभी घर आया हुआ है, कल ही मिलवा देते हैं दोनों को"... अरे, अच्छी जबरजस्ती है...
हे भगवन!!! कुछ लोग वाकई "इम्पोसिबल" होते हैं... खैर, बच गयी मैं, जिसने अपने-आप पर काबू रखा, "अतिथी देवो भवः" जहाँ में रखा... वरना अच्छी खासी इमेज का तो कचड़ा होना पक्का था...
पर समझ नहीं आता, कि लोगों को दूसरों की लड़कियों की इतनी चिंता क्यूं होती है?? भई, तुम्हारे घर में भी बच्चे हैं, उन्हें देखो, उनकी चिंता करो... और क्या शादी ही एक काम बचा है करने को... जब होनी होगी तब हो जाएगी...
हटाइए... जो होगा देखा जाएगा...
पर अच्छा तो ये था कि जो कुछ नया करने को सोचा था, उसमे बहुत कुछ सफल हुए... और आशा करती हूँ, आप सभी की भी दीपावली बहुत अच्छी हुई होगी...

मंगलमय दीपावली...

सबसे पहले आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
इस बार कई ब्लॉग पढ़े थे जिनमें नए-नए तरीके दिए गए थे, इस बार की दीपावली को कुछ खास और खुछ नया करने का...
मै उनमें से कई तरीके तो आज़माने वाली हूँ...
आप क्या नया कर रहे हैं???

आज फ़िर तुम्हें जाना है...

आज फ़िर से तुम्हें जाना है...
और मुझे याद आ रहा एक गाना है...
"मुझसे जुदा होकर तुम्हें दूर जाना है... पल भर की जुदाई, फ़िर लौट आना है.........."

अरे अरे!!!
ये क्या कर रही हूँ मैं...???
जो कुछ भी सोचा था,
उससे तो बिलकुल ही उल्टा कर रही हूँ मैं...

सोचा था...
न तो गाना गाऊँगी...
न तुम्हें रुकने को मानाउँगी...
और न ही किन्ही अदाओं से तुम्हें रिझाउँगी...
all-in-all, किसी फ़िल्मी अदाकारा जैसा कोई किरदार नहीं निभाउँगी...

पर न जाने क्यूँ...
किरदार निभाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रिझाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रोक लूँ कुछ भी कर के... बस...
गाना भी गाने का मन हो रहा है...
"आज जाने की जिद करो............
या...
" जाओ सैंयाँ... छुड़ा के बैंयां, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी...........

शायद ये problem हम सभी भारतींयों के साथ है...
जो बड़े ही ऐसी फ़िल्में और किरदार देखकर होते हैं...
जब हीरो कहीं दूर जाता है... तब
उसकी माँ, बहन और प्रेयसी की आँखों में आँसू होते हैं...
कभी अकेले छिप-छिपकर, तो कभी सब साथ मिलकर रोते हैं...
और रातों को भूखे पेट, करवटें बदलते हुए सोते हैं...
उसके ख़त, फ़ोन के इंतज़ार में,
दिन-रात का चैन खोते हैं...
"वो खुश रहें जहाँ भी रहे!"
बस, यही लफ्ज़ हमारी जुबाँ पे होते हैं...

ख़ैर!!!
फ़िल्में, फ़िल्मों के किरदार, या फ़िर कोई गाना...
कोई अदा, या अपना कोई फ़साना...
ये सब किसी काम के नहीं।
क्योंकि आख़िरकार...
आज तुम्हें जाना है
और मुझे
तुम्हारी यादों के साथ तन्हा रह जाना है...

बड़ा अच्छा लगता है... धन्यवाद...

आज, हमेशा की ही तरह, अपनी एक नई रचना को आप सभी के सामने प्रस्तुत करने आई थी।
पर आज ज़रा-सी उल्टी गिनती गिन ली। आमतौर पर पहले अपने ब्लॉग पे आती, या अपना डैशबोर्ड देखती, या फ़िर जिन ब्लोग्स पर कमेन्ट करना होता वहां जाती और फ़िर आख़िरी में अपने ई-मेल्स चेक करती... पर आज, न जाने क्यूं ई-मेल अकाउंट पहले चेक करने पहुँच और जो देखा उसपर मुझे तो यकीन न के बराबर हुआ... और फ़िर क्या, पूरा मेल पढ़ा, जो लिखा था उसे जाकर सही होने की पुष्टि की और फ़िर तो बस पूछिए मत... ख़ुशी इतनी की बस चली आई आप सभी के साथ यहाँ बाँटने... रहा नहीं गया मान लीजिये...
क्या है, हम जैसे नवजात ब्लोग्गर्स को इतनी खुशी भी बहुत बड़ी लगती है... हो सकता है आप लोगों के लिए ऐंवे-टाईप बात हो... पर मेरे लिए तो बड़ी है... और सबसे बड़ी बात... मै खुश हूँ...
धत तेरे की॥ बात तो बताई ही नहीं... हाँ जी तो बात यह है की मेरी कविता... "एक शुरुआत... अंत के बाद..." जागरण-जंक्शन के फीचर्ड ब्लोग्स में सेलेक्ट हुई है....
मेरा हौसला बढाने, मुझे हमेशा प्रेरित करने एवं मार्गदर्शन के लिए हार्दिक धन्यवाद... इसी साथ एवं मार्गदर्शन की आशा हमेशा रहेगी...

ये रही लिंक...

http://jagranjunction.com/

3G एवरेस्ट तो पहुँच गया, परा ज़मीन में कब आएगा???

आज BBC में एक न्यूज़ आई कि एक मोबाइल सेवा कंपनी ने अपना नेटवर्क माऊंट एवरेस्ट तक पहुंचा दिया। पढ़कर अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ, कि हम ज़मीन में रहने वालों को अभी यह सुविधा प्राप्त नहीं हुई और माऊंट एवरेस्ट पहुँच गयी।
Ncell नाम की एक नेपाली फर्म है जो की TeliaSonera नामक स्वीडिश कम्पनी की है, जिसने ये काम किया है।
अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

http://www.bbc.co.uk/news/world-south-asia-11651509

शायद मेरे जाने का वक़्त आ गया...

शायद,
अब वक़्त आ गया...
मेरे जाने का

माँ भी चुप-चाप तय्यारियाँ करती है
कभी साड़ियाँ चुनती तो
कभी गहने बनवाती है
कभी मेंहदी लगे हाथों को देख ललचाती है
और कभी पापा के साथ बैठ
मेरे मंडप के सपने सजाती है
जिसके नीचे बैठ वो सौंप देगी
मुझे मेरा नया जीवन...

कभी कोई नया रंग चुनती है...
कुछ दिन बाद उसी रंग के लिए कहती
"अब ये पुराना हो गया"
पर सच्चाई है कि माँ ने वो रंग किसी दुल्हन को पहने देख लिया था...

जब भी कोई घर आता है
उसे एक नया लड़का बताता है
कोई इंजीनियर तो कोई डॉक्टर
कोई किसी बड़ी एम्.एन.सी. में
तो कोई सरकारी नौकरी के साथ...
किसी का घर अच्छा है
तो किसी के घरवाले
कोई बहुत संपन्न है
तो कोई संस्कारोंवाले...

पर ये सब वो मुझसे नहीं कहती है
बस अपने आप ही सब ताना-बना बुनती है...

हर बार हर सपना
एक नई सोच के साथ
नए रंग के साथ
नई साज-सज्जा के साथ
और
नए तौर-तरीकों के साथ...

एक शुरुआत... अंत के बाद...

मंज़िल मेरी भी वही है
जो तेरी है...
जाना मुझे भी वहीं है
जहाँ तुझे है...
फ़र्क है तो बस इतना...
कि मैं जला दी जाउंगी और
तुझे दफनाया जाएगा...

तो क्यूं न एक काम करें...
सौंप दे अपने आप को
इस दुनिया के हाँथ में
मरने के बाद
और तत्पश्चात हम जिन्दा रहेंगें...
किसी की आँखों में
किसी के दिल में
किसी और के
किसी हिस्से में...

फ़िर तेरा और मेरा सफ़र एक जैसा होगा...
जैसी तेरी कहानी होगी, वैसा ही मेरा भी फसाना होगा...

और हम एक नई शुरुआत करेंगे
अपने अंत के बाद...

एक डरपोक ब्लॉगर से सामना...

कल बड़ी ही मजेदार घटना हुई... और न जाने क्यूं रह-रह कर मुझे अभी तक हंसी भी आ रही है... अच्छा आप में से कोई भी मुझे एक बात बताइए, यदि आप मेरे ब्लॉग पढ़ते हैं, जब सही लगता है तो तारीफ़ करते हैं और जब गलत तब मुझे बताते भी हैं... और जहाँ तक मुझे याद है, मैंने यदि गलती की है तो स्वीकार भी है, और उसे सुधारने की पूरी कोशिश भी की है, यहाँ तक कि जिन भी ब्लॉग में गयी हूँ, वह भी यदि किसी न लिखने वाले को गलती बताई है तो उसने मानी है... पर कल एक ब्लॉग पर गयी, वह कुछ ऐसी बातें लिखी गयीं थीं मै जिनसे बिलकुल भी सहमत नहीं थी, सो मैंने ऐतराज़ जताया, तब लिखनेवाले व्यक्ती न मुझे बड़ी ही अभद्रता से जवाब दिया, और-तो-और अपनी बात को सही साबित करने हेतु उन्होंने अजीब-सी बातें सामने रखीं, जब मैंने उन्हें भी काट दिया, उन बातों को गलत ठहराया और साबित भी कर दिया, तब रचयिता न बड़ा ही अजीब-ओ-गरीब जवाब प्रस्तुत किया, जो मुझे नागवार लगा... मैंने उसपर भी कटाक्ष किया और दूसरे तथ्य सामने रखे... तब उन्होंने मुझे वापस उत्तर नहीं दिया... रात हो चुकी थी सो मुझे लगा कि शायद उन्होंने निद्रासन की और प्रस्थान कर लिया... पर आज सुबह जब मैंने उनके उत्तर हेतु उनका ब्लॉग विसिट किया... तो जवाब तो नहीं ही थे, मेरे कमेंट्स भी मिटा दिए गए थे...
अब मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने ऐसा क्यूं किया??? या तो डर, कि उन्होंने फ़िर कोई जवाब दिया और मै उसे भी गलत साबित कर दूंगी या फ़िर वो निरुत्तर होंगे... परन्तु मेरे कमेंट्स मिटने का अर्थ मुझे अभी-भी समझ नहीं आया...
जहाँ तक मैंने इस ब्लॉग की दुनिया को जाना है, सीधी-सी बात कि यहाँ आपसे भी होशियार लोग हैं, तो उनकी बातें सुननी चाहिए... और हो सकता है आप जो कर रहे हो गलत हो, तो मानना भी चाहिए... परन्तु अपने-आप को सही साबित कने के लिए कभी-भी अभद्रता का, या ऐसे किसी कार्य का सहारा नहीं लेना चाहिए जो आपके डर को, आपके अहम् को प्रस्तुत करे...
मैंने तो जो कुछ, थोडा-बहुत सीखा है यहीं आप लोगों से ही सीखा है, क्योकी मेरे पास कोई लेखकों का आधार नहीं है... सही मायनों में, मेरे घर पर सिर्फ लोग सिर्फ पढ़ते हैं या पढ़ा हुआ लिखते हैं... उन्हें लिखने में कोई रूचि नहीं है...
हो सकता है यहाँ कुछ लोग मेरी बातों से सहमत न हों, तो कृपया मुझे बताएं... आपके कमेंट्स का स्वागत है...
धन्यवाद...

मेरी खता...

न जाने खता क्या हुई थी थी मुझसे...
मेरी तमन्नाएँ बढ़ गयीं थीं...
या
उनके पूरे होने की आरज़ू...

तुम्हारे प्रेम का अर्थ...

क्या प्रेम का अर्थ
केवल आलिंगन है???
या प्रेम और गहराया तो चुम्बन है???
बस यूंही तन की करीबी बढ़ती जाती है
और प्रेम गहराता जाता है...

क्या ह्रदय में उमड़ती प्रेम-भावनाओं का कोई मोल नहीं???
जहाँ छुअन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे की चिंता
जहाँ चुम्बन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे को समझना
जहाँ बदन की ज्व्लंतता का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे के बिना बोले शब्दों को सुनना
या...
एक-दूसरे का अहसास साथ होना...

पर...
तुम ऐसे क्यूं नहीं हो???
तुम्हारे लिए मेरे करीब आना जरूरी क्यूं नहीं???
क्यों तम्हारे लिए मेरे बदन पर तुम्हारे हाथों के निशाँ
से ज्यादा जरूरी
मेरे होठों पे मुस्कान का होना है???
क्यों नाराज़ होने के बाद भी...
तुम हमेशा मेरे साथ खड़े होते हो???
और आसुओं को मेरी आँखों से कोसों दूर रखते हो...
क्यों तुम मेरा चुम्बन नहीं लेते???
वरन... हर बहाने से मुझे खुशियाँ ही देते हो...
क्यों तुम मेरे करीब नहीं आते???
क्यों दूर से ही देख मुस्कुराते हो???
क्यों कोई वादा नहीं करते???
या वादा न तोड़ने की कसम मुझसे लेते हो???

क्या तुम इस दुनिया से अलग हो...
या...
मुझसे प्रेम नहीं करते...

वजह...

मुझसे मेरी बेचैनियों
मेरे आसुओं की वजह न पूछ...

मैं लूं हर बार उसका नाम
ये, उसे गवारा नहीं...

मुझे जानना चाहते हो???

यदि जानना चाहते हो मुझे...
तो कभी फुरसत से,
तन्हाई में
शांत मन से
पढ़ना उन अधूरी लाइनों को
उन अधूरे पन्नों को
जो अभी भी उस डायरी में मौजूद हैं...
जो मेरे सिराहने कही रखी है...

इस बार की नवरात्रि कुछ ख़ास है...

सर्वप्रथम आप सभी को नवरात्रों की शुभकामनाएं...
इस बार शरद नवरात्रि शुरू हुई 8 तारीख को... यानी कि बैठकी... वैसे तो नवरात्रि अपने-आप में ख़ास है, आख़िर इसके नौ दिन माता का संपूर्ण आशीर्वाद होता है अपने भक्तों पर... परन्तु इस बार की शुरुआत ही कुछ ख़ास थी...
8 तारिख को मेरी प्यारी-सी भांजी का जन्मदिन पड़ता है, जो इस साल बैठकी के दिन हुआ जो तिथि के अनुसार मेरे भाई का जन्मदिन है... तो हुआ न ख़ास... मातारानी के व्रतों का आरम्भ, भाई और भांजी का जन्मदिन...
ये तो हो गयी बैठकी की बात, अब यदि ज़रा-सा आगे आए तो, 15 तारीख को है अष्टमी, जो मेरे एक कज़िन भैया का जन्मदिन है तिथि के अनुसार और-तो-और उसके ठीक ek दिन पहले दिन, यानी 14 तारिख को उनका इंग्लिश कलेंडर के हिसाब से जन्मदिन... और वो भैया मेरे भाई होने के साथ-साथ बहुत अच्छे दोस्त भी हैं... अब यदि अंत की बात करें... तो दशहरा पड़ रहा है 17 को, जो मेरे एक बहुत ही ख़ास दोस्त का जन्मदिन है...
तो हुई न इस बार की नवरात्रि कुछ ज्यादा ही ख़ास... पर सिर्फ दुःख है तो एक कि मै इस सभी से पार्टी बाद में ही ले पाऊँगी... व्रत में बाहर का नहीं खाते न...
आशा करती हूँ आपकी भी हर नवरात्रि यूँही ख़ास हो...
हाँ मेरी भांजी की फोटो... बताइए तो कैसी लगती है? बस आप इसकी शक्ल पर जाइएगा, क्योंकी ये बहुत बोलती है और चालू भी है...

एक ओर अजीब-सा फूल...

कुछ दिनों पहले मैंने यहाँ अपने एक पोस्ट धतूरे का एक अजीब फूल प्रस्तुत किया था, जिसमे एक के अन्दर तीन फूल थे... आज फ़िर से एक अजीब सा फूल प्रस्तुत कर रही हूँ... ये बिलकुल लेटेस्ट फोटो नहीं है। हुआ यूं कि आज मै अपना सिस्टम यूं ही देख रही थी, इसी सिलसिले में कुछ पुरानी फोटोस भी देखीं, और ये फोटो नज़र आ गयी तो सोचा क्यूं न इसे भी आप लोगों के साथ शेयर करूँ... ये बेला का फूल है ओर कुछ अजीब है... आप खुद ही देख लीजिये...

वो आज भी वैसा ही है...


जैसे वो पहले मुझे सताता था
आज भी सताता है...
जैसे वो पहले मुझे रुलाता था,
आज भी रुलाता है
न जाने क्यूं और कैसे वो इतनी मोहब्बत कर लेता है मुझसे?
"वो हमेह्सा मेरे साथ ही रहेगा"
पहले क्या, आज भी यही जताता है मुझे...

पहले अपनी बदमाशियों से,
तो आज अपनी मजबूर बातों से सताता है
पहले अपने गुस्से से
तो आज अपनी यादों से रुलाता है
"न जाने क्या होगा हम दोनों का एक-दूसरे के बिना?"
मैं पूछती हूँ उससे...
पर ऐसा दिन कभी नहीं आने देगा...
यही कहकर हर बार खुद को मेरा बताता है मुझे...

शब्दों से दोस्ती...

न जाने क्यूं,
शब्दों से मेरी दोस्ती नहीं हैं...
इसीलिये शायद
कह पाने में असमर्थ होती हूँ
अपनी बात
हर बार...
और यही असमर्थता
खींच लाती है मुझे,
इस कागज़ की ओर...
और अपनी कलम उठा आ जाती हूँ
हर वो बात कहने
अपनी उँगलियों से
जो मेरी जुबां कह नहीं पाती...

आत्मपरिचय... हरिवंश राय बच्चन {कुछ अंश}

आज मैं यहाँ अपनी कोई राचन लेकर नहीं बल्कि प्रसिद्द कवि, और जो प्रसिद्द रचनाकार भी हैं, जी, "हरिवंश राय बच्चन जी" की ही बात कर रही हूँ. शायद ही आज संपूर्ण भारतवर्ष में इनके नाम से कोई अछूता हो। खैर... पर आज मैं उनकी एक रचना "आत्मपरिचय" की कुछ अंश लेकर प्रस्तुत हुई हूँ, जिन्होंने मुझे बहुत अन्दर तक छुआ... और शायद हर लिखनेवाले की व्यथा यही है...

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते हो, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ!

आशा करती हूँ आपको भी इन पंक्तियों न छुआ होगा... और इन्हें प्रस्तुत कर मै सफल हुई होंगी।
इन्हें पढ़ मेरे मन में जो आया वो कुछ इस प्रकार था...

"जो गीत तुमने गुनगुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा हाल-ऐ-दिल गा रहे हो
अभी जो तुमने राग सुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा ही तो रुदन सुना रहे हो
कैसे यूं समझ लेते हो, यूं लिख लेते हो तुम
मेरे ह्रदय की पीड़ा को
अभी जो तुमने करुण चित्र दिखाया, ऐसा लगा मनो
मुझे मेरा ही अक्स दिखा रहे हो..."

नमन... हिन्दी गुरुओं को...

आज एक अजीब-सा विचार मेरे मन में आया
और वही मुझे यहाँ तक खींच कर ले आया...
आज नमन करना है उन गुरुओं का...
जिन्होंने हिन्दी से मेरा परिचय करवाया...

सर्वप्रथम मेरे माता-पिता...
जिन्होंने हिंदी अक्षरों से अवगत कराया
और मेरी तोतली जुबां को बोलना सिखाया।
घर लाकर एक बड़ा-सा हिंदी अक्षर-माला का चार्ट
मुझे स्वरों-व्यंजनों को लिखना और बोलना सिखाया...
कभी सीधे, कभी बहाने से
मुझसे "अ आ इ ई" बुलवाया
तो कभी कहानियों के बीच ककहरा सुनाया
कभी देकर स्लेट-पेंसिल कहा
"इतना लिख कर दिखाओ"
तो कभी अपनी उँगलियों के बीच रख मेरी उंगलियाँ
अपनी गोद में बिठा कर लिखवाया...
कभी प्यार से तो कभी डांट कर... और बात न मानने पर,
मार के डर का प्रयोग आजमाया।
फ़िर अक्षरों को मिला-मिलाकर
शब्दों को पढ़ना सिखाया...
कुल-मिलाकर स्कूल जाते तक,
अपनी उम्रवालों के बीच मुझे हिंदी का उस्ताद बनाया।

अब बारी उन हिंदी के गुरुओं की
जिन्होंने हिन्दी विषय से परिचित कराया...
गद्य-पद्य का अर्थ और सारांश समझाया...
उसके पीछे छुपे अर्थ को कैसे समझना है
ये भी समझाया...
पर्यायवाची, समानार्थी, एकार्थी, रस, छंद, अलंकार
और भी न जाने क्या-क्या समाहित है इस व्याकरण में...
परन्तु,
उन्होंने इस कठिन हिस्से से भी निजाद दिलाया
इस भाषा की कठिनाइयों से कैसे निपटना है
ये भी बतलाया...
किसी कवी की कविताओं और
किसी लेखक के लेख की खासियत एवं
उसकी छिपी भावनाओं को कैसे पढ़ना है,
या उसे अपने वाक्यों में कैसे प्रस्तुत करना है ये भी पढ़ाया...

शायद उनका दिया ज्ञान ही है
जो यूं लिख पा रही हूँ मै...
अपनी हर भावना, हर चाहत और हर सोच को यूं
आप सभी के सामने रख पा रही हूँ मै...

इसलिए...
नमन उन सारे गुरुओं का जिन्होंने
मुझे इस प्यारी, अदभुत और
हमारी अपनी भाषा का ज्ञान दिया...
और मुझे उनकी शिष्या कहलाये जाने का सम्मान दिया...

कल के अन्जाने...

कल के अन्जाने
आज अपने-से लगने लगे...
कल तक नाम नहीं जानते थे एक-दूसरे का
आज देखो तो...
नज़रें भी पहचानने लगे

कल तक ये सुर्ख हवाएं,
अनजानी थीं मुझसे...
आज, ये मौसम भी अपना-सा लगता है...
कल तक,
डरता था दिल यहाँ आने से...
आज...
यहीं ठहर जाने को मन करता है...

"प्रोत्साहनम परम सुखम..."

बचपन से हमेशा सुनते आये कि "संतोषम परम सुखम"... और ये बात सही भी है। जब भी आप किसी भी चीज़ में अपने-आप को मना लेते हैं, संतोष कर लेते हैं... या किसी काम को करने में आपको आत्मिक या मानसिक संतोष प्राप्त होता है तो उससे अच्छा काम आपके लिए कुछ और हो ही नहीं सकता, फ़िर चाहे वो काम कितना भी बड़ा या कितना भी छोटा क्यूं न हो?
पर जब भी आप कोई काम करते हैं, अपने लिए, अपनों के लिए या फ़िर किसी और के लिए... और आपके काम को सराहा जाये, उसकी तारीफ की जाए... मतलब आपको प्रेत्साहित किया जाए तो कितनी खुशी होती है न... और इसके विपरीत यदि आपको उस काम के लिए डांटा जाए, फटकारा जाए या कह दिया जाए कि आप उस काम के लायक ही नहीं हैं, आपसे कोई उम्मीद ही नहीं की जा सकती है... आपको हतोत्साहित किया जाए तो मन टूट-सा जाता है, लगता है कि क्योंन हम ही बार-बार बलि का बकरा बने? कभी-कभी तो हम वापस उस समस्या से, उस हालात से लड़ने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु कभी-कभी ऐसी फटकार मिलती है कि बस... लगता है हटाओ, नहीं करना हमें भी कुछ...

और बिलकुल यही होता है जब हम अपने-से छोटों को, या अपने-से नीचे ओहदे में काम करने वालों के साथ करते हैं। उनका भी तो मन टूट जाता होगा जब हम उन्हें अच्छी खासी फटकार लगा देते हैं किसी काम के लिए। पर हमें तो बात सिर्फ अपने लिए ही याद रहती है, दूसरों के साथ यही व्यवहार करते वक़्त हम भूल जाते हैं कि वो भी इंसान हैं, उनके पास भी दिल है, उन्हें भी बुरा लग सकता है। शायद ये मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है... जो हर किसी में सामान होता है।
फटकार लगाते वक़्त लोग ये भूल जाते हैं कि वो जिसे डांट रहे हैं वो उन्ही का कोई ख़ास है, उन्ही के अपनों में से हैऔर इसी भूल में वो अपना नुक्सान करा लेते हैं... आख़िर आपके कुछ अपने आपसे रूठ जाएं, आपके उनके बीच कोई मन-मुटाव हो जाए या आपके लिए उनके दिल में कोई बैर जाए तो वो आपका नुकसान ही है ?
वैसे मैंने कहीं-कहीं देखा है कि, कुछ लोग आपकी गलतियों को भी बड़े प्यार से बताते हैं, समझाते हैं और आपको उसे कैसे सुधारना है ये भी समझाते हैं... तब बड़ा अच्छा लगता है। लगता है जैसे कोई हमारे पास भी है जो हमें सही राह कैसे पकडनी है ये समझा सकता है। हाँ, आजकल ऐसे लोग मिलते बड़े कम हैं...
मुझे भी गुस्सा आता था, मैंने भी कई बार अपने से छोटों को तरीके की फटकार लगाई है, पर ये बात शायद जल्द ही समझ आ गई और मेरा ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। इसीलिये मैंने यह तय किया कि अब मैन भी अपने आदत में सुधार लाऊँगी और डाटने-फटकारने की बजाय आराम-से, समझाउंगी... प्रोत्साहित करूंगी।
वैसे एक बात और है, हमेशा देखा गया है कि प्रोतसाहन पाने वाला इंसान ज्यादा जल्दी एवं ज्यादा अच्छी तरक्की करता है, और जिस बच्चे को प्रोतसाहन प्राप्त होता है वो हमेशा आगे ही होता है और सही दिशा की और अग्रसर रहता है। मतलब प्रोत्साहन में फायदा-ही-फायदा... आपका भी और आपके अपनों का भी...
और जब ये बातें मेरी समझ में आईं तो बस यही बात मेरे मन से निकली...
"प्रोतासाहनम परम सुखम"

चोप्ता... गढ़वाल की अनछुई सुन्दरता...

गढ़वाल या उत्तराँचल/उत्तराखंड... जिसे भगवान ने खुद अपने हाथों से सजाया-संवारा है शायद... अप्रतिम सुन्दरता से परिपूर्ण...यहीं एक सुन्दर जगह है "चोप्ता"... जो अभी लोगों से अनजान है... पर अब कुछ लोग जाने लगे हैं... इसे गढ़वाली "मिनी स्विट्ज़रलैंड" भी कहते हैं... ये समुद्र तल से लगभग 2900 मीटर्स की ऊंचाई पर, गोपेश्वर-उखीमठ मार्ग पर स्थित है। गोपेश्वर से इसकी दूरी लगभग 40 कि.मी. है, और ऋषिकेश से लगभग 254 कि.मी. है। वैसे तो एक चोप्ता और है परन्तु वो सिक्किम में है और उसे लोग "चोप्ता वैली" के नाम से जानते हैं।
खैर... हमें इसके बारे में तब पता चला जब हम केदारनाथ जी" के दर्शन कर जोशीमठ की ओऊ बढ़ रहे थे, क्योंकी अगले दिन हमें बद्रीनाथ जी" के दर्शन के लिए जाना था। हमारे ड्राइवर ने कहा कि "आपको न तो इस जगह के बारे में कोई बातएगा और न ही ज्यादा सुनाने को मिलेगा, पर साहब जगह देखेंगे तो मन खुश हो जायेगा"। हमने भी सोचा कि देखें तो कि ऐसी कौन-सी जगह है? और हमें कौन-सा कोई नया रास्ता पकड़ना है, बस ज़रा-सा उधर से न जाकर इधर से चल देंगे। तो हमने हामी भर दी, पर ड्राइवर्स ने वहां जाने का 40 रु. अलग से माँगा, हमने कहा ले लेना पर जगह अच्छी होनी चाहिए। सो हम चल दिए चोप्ता" की तरफ। बीच में हम "नंदा देवी नैशनल पार्क" से भी गुज़रे... और जब चोप्ता पहुंचे...



वाह!!!!!!!!!!!!!!!...
बस यही कह कर रह गए थे हम सभी...
मैं नहीं जानती की उस अप्रतिम, अद्वितीय सौंदर्य को देखने का अनुभव किन शब्दों में बयाँ करना चाहिए, या कैसे लिखना चाहिए... पर जो देखा वो वाकई किसी प्रेमी के प्रेम या किसी कवी की खूबसूरत कविता से कम नहीं था... मै कभी स्विटज़रलैंड नहीं गयी, परन्तु जिस वहां का जो सौंदर्य-वर्णन सुना है, ये जगह उससे कहीं खूबसूरत थी। शायद काश्मीर में ऐसी ही किसी जगह को देखकर मशहूर शायर "अमीर खुसरो" ने फ़रमाया होगा...
"गर फिरदौस रू-ऐ-ज़मीं अस्त, हमी अस्त-ओ हमी अस्त-ओ हमी अस्त-ओ हमी अस्त..."

वो सेब वाकई खट्टे थे...





आज फ़िर यादों के पिटारे से एक याद आपके साथ बांटने आई हूँ। ये बात है जब हम बद्रीनाथ जी के दर्शन करने गए थे... आज भी आँखे बंद कर लो तो पूरा नज़ारा सामने आ जाता है। तो हम निकले तो देहरादून से थे, रात में कर्णप्रयाग में रुके, और दूसरी सुबह केदारनाथ जी के दर्शन को चले गए। किस्मत बहुत अच्छी थी जो न तो लैंड-स्लाइड मिला और न ही कोई गेट बंद। सभी अच्छा-अच्छा... फ़िर तीसरे दिन हम पीपल" करके कोई जगह थी {मुझे नाम ठीक से याद नहीं है}, वहां से बद्री जी के दर्शन को निकले... रास्ते में सेब के पेंड़ देखे, वो सेब कुछ अजीब-से थे, परन्तु अच्छा लग रहा था। पहाड़ियां, घुमावदार रस्ते देखने में मज़ा आ रहा था। इंतज़ार थे कि कब मंदिर पहुंचेंगे। और पापा ने बताया कि वहां से हम "माना गाँव" भी जायेंगे, जो कि बिलकुल भारत-चीन बोर्डर का आख़िरी गाँव है। और ये सेब के पेंड़ देख कर तय हुआ कि लौटते में खरीदेंगे।
मंदिर गए, दर्शन किया, सबके लिए प्रशाद भी लिया, माना गाँव गए। जब लौटने लगे तो माँ-पापा ने भगवान से प्रार्थना की कि सभी को अपने द्वार एक बार जरूर बुलाना... उनका भी सोचना सही ही था।
हाँ तो जब लौटने लगे तो एक सेब-वाली के पास रुके, ड्राइवर भाव तय करने लगा, उसे वहां की भाषा आती थी तो उसके लिए आसान था। और हमने उन सेब के गुच्छों के साथ फोटो खिचवाने की इक्छा जाहिर की तो उसकी मालकिन ने माना कर दिया, हमने कहा भी कि उसके पेंड़ को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएंगे तब भी नहीं मानी।
खैर... उसके साथ न सही परन्तु उस पेंड़ की हमने कुछ फोटोस ले ली... परन्तु सबसे मज़ा तो तब आया जब हमने उस सेब को चखा... बाप रे बाप! सच मानिए इतना खट्टा सेब मैंने क्या हम सभी में से किसी ने अपनी अभी तक की ज़िन्दगी में नहीं खाया था... माँ खट्टा बहुत ही कम खातीं हैं तो उनकी तो हालत ही ख़राब हो गयी...
बाद में हमने वो सारे सेब उठा कर दोनों ड्राइवर्स को दे दिए...
परन्तु अनुभव अच्छा था...

वो धतूरे का फूल...


ये पीले धतूरे का फूल है... मेरे घर में खिला था। एक्चुली ये आया तो था मामाजी के लिए, उन्हें भगवान से जुड़े फूल-पत्ती घर में लगाने का बड़ा शौक है, कहीं से कुछ पता चलता है वो मंगवा लेते हैं। चाहे वो पीला धतूरा हो या सफ़ेद पलाश। परन्तु किसी करणवश ये मामा के घर जा नहीं पाया था... हम पहुंचा ही नहीं पाए थे, और वो भी नहीं कि ले जाएँ। इसी बीच उसमें ये फूल खिला, जो थोड़ा अजीब-सा लगा था, क्योंकि इसमें एक कि जगह तीन फूल एक के अन्दर एक थे। ये बात पहले समझ नहीं आई थी, जब इसमें केवल कलियाँ थीं, परन्तु जब फूल खिला तब समझ में आया, और बिना देर किये मैंने इसे अपने कैमरे में कैद कर लिया। और आज इसे आप सबके सामने प्रस्तुत भी कर दिया... हो सकता है कि आपमें से कुछ ने ऐसा कुछ कहीं देखा हो, परन्तु मेरे और मेरे परिवार के लिए ये पहला अनुभव था, सो आप सभी के साथ बाँट रही हूँ...
मिलती हूँ अगली पोस्ट में...

कुछ ख़ास...

एक आस, एक प्यास...
बस एक और मंज़िल की तलाश...

इतना मिलने के बाद भी यदि चाहत है कुछ और पाने की...
तो, हो-न-हो, वो ज़रूर है कुछ ख़ास...

जाने क्यूं???

न जाने आज तेरा इतना इंतज़ार क्यूं है?
न जाने आज तुझे देखने को दिल इतना बेकरार क्यूं है?
कभी-कभी तो सोचती हूँ...
न जाने तेरी हर बात पे मुझे, मेरे दिल को
इतना ऐतबार क्यूं है???
...

धन्यवाद...

आज तक सिर्फ सुना था कि आपको कब किसकी दुआ मिल जाये और कब किसकी दुआ लग जाये ये कह नहीं सकते, पर जब यही मेरे साथ हुआ तब यकीन आ गया, कि नहीं ऐसा सिर्फ कहने के लिए नहीं बल्कि होता भी है। कुछ दिनों पहले मै बहुत ही असमंजस की स्थिति में थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? तभी यहीं-कहीं से कुछ खास लोगों ने मुझे अपने आशीर्वाद से नवाज़ा और मेरे लिए दुआ की, और उनकी प्रार्थना उस ऊपरवाले ने कबूल भी कर ली... {मेरी पिछली कविता में}...
इसीलिए ये पोस्ट उन सभी लोगों को समर्पित करना चाहती हूँ जिन्होंने मुझे अपनी दुआओं से नवाज़ा... और वो मुझे सिर्फ यहाँ, यानी मेरे ब्लॉग के ज़रिये जानते हैं... पर कहूँ या कहूँ परन्तु इस धन्यवाद का बहुत बड़ा हिस्सा चिठ्ठाजगत को भी जाता है जिन्होंने उन लोगों को मुझ तक पहुँचाया... वरना वो मुझसे और मै उनसे अनजान ही थी...
आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया और आशा करती हूँ कि यूँही हमेश आप मुझे अपने आशीर्वाद और दुआओं से नवाजते रहेंगे...
धन्यवाद...

कुछ लिखना चाहती हूँ...

कुछ लिखना तो चाहती हूँ,
पर... लिख नहीं पा रही हूँ...
कुछ कहना तो चाहती हूँ,
पर... कह नहीं पा रही हूँ...
न जाने ये चोर दिल के किस कोने में छुपा बैठा है?
उसे भगा अपने -आप से दूर कर देना चाहती हूँ...
पर...
भगा नहीं पा रही हूँ...

मै अपने बचपन की सखियाँ कहाँ से लाऊं???

आज एक बहुत-ही पुराना और प्यारा-सा गीत सुना... और जब से सुना है तब से ज़ुबां पर वही गीत है। हाँ, माँ जरूर खुश हैं कि शायद अब मै शादी के लिए तैयार हूँ। खैर, वो उनकी गलतफहमी मात्र है। गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं:-

अगले बरस भेज भैया को बाबुल
सावन में लीजो बुलाय रे...
लौतेम्गी जब मेरे बचपन की सखियाँ,
दीजो संदेसा बजाय रे...


फिल्म:- बंदिनी {1963}
गीतकार:- शैलेन्द्र
गायिका:- आशा भोंसले
संगीत निर्देशक:- एस. डी. बर्मन


{गीत सुननें के लिए गीत के बोलों को क्लिक करें}

मेरे लिए तो सावन भी आएगा, पापा बुलवा भी संदेस भी भेजवा देंगे और बुलवा भी लेंगे, पर मै अपने बचपन की सखियाँ कहाँ से लाऊँगी? क्योंकी वो सब तो कहीं खो गयीं हैं। मेरे पापा की सरकारी नौकरी है, और इसीलिए हम एक जगह से दूसरी जगह और तबादलों का सिलसिला यूँही चलता रहता है। पर आज यह गाना सुनकर अचानक सारी सहेलियों के चहरे आँखों के सामने आ गए, सबके नाम यूँही याद करने लगी। बड़ी अजीब-सी बात है कि कईयों के नाम भी नहीं याद। न जाने वो कैसी होंगी? उन्हें मै याद भी होऊँगी या नहीं?
खैर... हाँ पर इस तबादले के सिलसिलों में एक चीज़ अच्छी
है कि आपको दोस्त बहुत सारे और बहुत प्रकार के मिलते हैं। ये भी अपना अलग ही महत्त्वपूर्ण अनुभव है। परन्तु, आज के इस तकनीकी युग में इतना तो है कि किसी को भी खोजना इतना मुश्किल नहीं है, जैसे:- ऑरकुट या फेसबुक के ज़रिये आप बहुत सारे ओगों को खोज भी सकते हैं और नए लोगों से जुड़ भी सकते हैं, पर क्या है न, कि सभी लोग नहीं मिलते... और जो नहीं मिलते उनके मिलने की सिर्फ आस लगाई जा सकती है।
तो मै भी इसी आस में हूँ कि हो सकता है आज नहीं तो कल मै भी अपने बचपन के मीतों से मिलूंगी... बस जब तक नहीं मिल रही हूँ तब तक यहीं से उनकी खुशीयों की कामना कर सकती हूँ...

हम सुबह चार बजे क्यूं जागें?

सुबह हुई नहीं कि दलीलें मिलनी शुरू हो जाती हैं, "हम तुम्हारी उम्र के थे तब चार बजे से उठ कर पढ़ते थे", "हम तो कभी नहीं सो सकते सात बजे तक, पता नहीं तुम लोग कैसे सो लेते हो", रात में जल्दी सो जाया करो तो सुबह भी जल्दी नींद खुले", क्यों जागते रहते हो रातभर, सुबह से उठ कर काम कर लिया करो"... वगैरा-वगैरा। और हम मन-ही-मन सोचते हैं कि हमसे नहीं होता दिन में काम, ऑफिस निपटाओ, घर आओ फ़िर वही, न बाबा न... और दिनभर घर फुटबाल का मैदान भी तो बना रहता है, और फ़िर स्कूल के वक़्त से ही आदत हो गयी है रात को पढने की, जागने की तो अब क्या करें? खैर...
और-तो-और वहीँ दूसरी ओर हमें महान वैज्ञानिकों, लेखकों, हस्तियों के नाम और काम से प्रेरित करने की कोशिश भी करते हैं... बताते हैं कि कैसे उन लोगों ने रात-रात भर जाग कर पढ़ाई की, चिंतन-मनन किया और तब जाकर अपने क्षेत्र में महारत और नाम हासिल किया। जैसे:- गैलिलियो रातभर मोमबत्ती के सहारे पढ़ते थे, शेक्सपीयर स्ट्रीट-लाइट में पढ़ते थे, और भी न जाने कौन-कौन क्या-क्या करते थे। पर एक तो ये बात समझ से परे है, ये लोग दिन में क्या करते थे जो सारे आविष्कार, लेख और बड़ी संरचनाएँ रात में ही गढ़ी गयीं। और फ़िर हमें जिसका उदाहरण देकर कुछ बनने और कुछ बड़ा कर गुजरने, नाम कमाने की प्रेरणा दी जाती है, हम तो उन्ही रास्तों पर चल रहे हैं। तो फ़िर हम क्यूं सुबह चार बजे से उठें? कभी सुना है कि कोई वैज्ञानिक ने कोई आविष्कार सुबह किया हो? या किसी बड़े साहित्यकार ने रात में ली पूरी नींद का वर्णन किया हो, किया भी होगा तो किसी और की नींद का, न कि अपनी।
तो फ़िर हमें भी रातभर जागने दीजिये। क्या पता किसी दिन हम भी कुछ ऐसा कर जाएँ और आनेवाली संतति के लिए एक और बोझ छोड़ जाएँ, जैसे हमारे लिएय कईयों ने छोड़ें। उन्हें क्या, उन्होंने तो नाम कमाया और चल दिए, अब हमसे पूछिए कि हमें कितना पढना पड़ता है, और वो भी जो कभी हमारे किसी काम नहीं आनेवाला। अरे नहीं, हो सकता है काम आए, जब हम अपने आनेवाली पीढी को पढ़ाएंगे या उनके साथ रोने में कुछ आंसू गिराएंगे। सही है तब तो काम आ ही जायेगा, आखिरकार अनुभव का अपना अलग ही स्थान है।

नहाने हो बाद में और खाने को पहले...

नमस्ते...
आज अचानक पूजा करते वक़्त, भगवान के समक्ष एक बात याद आ गई। सोचा क्यूं न आप लोगो के साथ बांटी जाए। बात को कुछ वक़्त हो चुका है, यही कोई 2 साल, हमारे नाना के घर एक बड़ा-सा पूजाघर है, और यदि देवालय बड़ा है तो बनी बात है की भगवान की मूर्तियों और रूपों की संख्या भी ज्यादा ही होगी। तो हुआ यूं कि हम सब भई-बहन आँगन में बैठे कुछ हँसी-ठिठोली कर रहे थे और उस पुजहा की और भी देख रहे थे, {जी नाना के यहाँ पूजाघर को पुजहा बोलते हैं}, और धीरे-धीरे हंस भी रहे थे, बीच में यदि कोई बड़ा वहां से गुजरता तो एक-दूसरे को चुप होने भी कहते, पर नाना जी के कान हमारी बातों में ही थे श्स्यद क्योंकी वो वहीँ आँगन में तैयार हो रहे थे संध्या-आरती के लिए। अरे भई! पुराने पंडित हैं, राजगुरु-राजपुरोहितों का खानदान है, तो परंपरा भी वैसी ही चली आ रहीं हैं, सुबह-शाम पूजा होना, भगवान का दोनों टाइम का नहाना, भोग लगना, पुजहा की साफ़-सफाई... वगैरा-वगैरा... पनतु यदि धोखे-से हम भाई-बहनों में किसी को कह दिया जाए किसी भी एक टाइम की पूजा करने को तो बस, सभी एक-दूसरे का मुँह देखते और इशारे से बोलते की "तुम कर लो"। पर वहां हमारी माँ-मौसियों का सिखाया को-ओपरेटिव फुन्दा काम कर जाता और दो-तीन लोग मिलकर पूजा निपटा देते।
बस ऐसी ही बातें चल ही रहीं थीं की नानाजी ने संध्या-आरती के लिए घंटे-घंटियाँ, शंख बजने की आवाज़ लगाई "जो-जो बच्चे आरती में आना चाहते हैं तो आ जाओ, आरती शुरू होने वाली है"। हाँ एक बात और, हमारे नानाजी थे बहुत ही अच्छे, वो हमेशा जानते थे की उनके नातिन-नातियों को क्या पसंद है, तो कभी भी उनकी तरफसे कोई भी बाध्यता नहीं होती थी कि आरती में आना जरूरी है या नहीं, और शायद यही सबसे बड़ी खासियत थी कि बच्चे उनके पास अपने-आप चले जाते थे। हाँ तो जैसे ही उन्होंने आवाज़ लगाई सारे बच्चे पहुँच गए उनके पास, और हाँ, जब भी हम सब इक्कठा होते थे वो शाम का भोग कुछ ख़ास और ज्यादा ही लगाते थे, बाकी आम दिनों में तो दूध-शक्कर, दूध-मिश्री या दूध की जगह मलाई हो जाती थी। तो जैसे ही हम सब पुजहा में पहुँचते, पूरा-का-पूरा पुजहा भर जाता, {हम कुछ ज्यादा ही बच्चे हैं, बड़ा परिवार है न, मम्मी लोग सात बहनें हैं, और उन सभी के बच्चे... तो आप खुद ही सोच सकते हैं}। खैर आरती हुई, प्रसाद मिला और हम सब फ़िर से आँगन में, अपनी पंचायत में... कुछ देर बाद नाना भी वंही आकर बैठे और अपनी चाय का इंतज़ार करने लगे। हम लोगों ने जैसे नाना को देखा पहले तो थोडा-सा चुप हुए और फ़िर टॉपिक ही बदल दिया। पर शायद नाना भांप गए थे, सो वो खुद ही बोले... बोले, "बच्चों चलो एक बात बताओ, कि क्या ये सही है कि भगवान नहाते तो तब हैं जब हम नहा कर उन्हें नहलाएं, और खाने के लिए हमसे पहले ही खा लेते हैं?"। हम सब नाना को देखना लगे, जैसे हमारी बातें पकड़ लीं गईं हों। तब नाना फ़िर से बोले, "आख़िर यदि हम नहाते पहले हैं तो हमें खाना भी पहले ही मिलना चाहिए, या भगवान को नहाना पहले चाहिए?" हंस अब धीरे-धीरे मुस्कुराने लगे, इतने में हमारी एक प्यारी-सी छोटी बहन बोल पड़ी, "पता है नाना जी, हम लोग अभी यही बात कर रहे थे, और भैया लोग तो ये भी बोल रहे थे कि इतने सारे भगवान हैं क्यूं पुजहा में? किसी दिन हम लोगों को पूजा करने को कहेंगे तो हम इन्हें आधे कर देंगे।" नानाजी पहले तो हम लोगों की तरफ देखे, फ़िर हसने लगे, बोले... "मुझे भी ऐसा ही लगता था, जब मैं छोटा था, पर तब इतने भगवान नहीं थे और न ही वो हनुमान जी का मंदिर" {अरे हाँ! हमारे नाना के घर के सामने एक बहुत बड़ा-सा मैदान है फ़िर रोड है और उसके उस पार हमारा ही एक कुआँ और हनुमान जी का मंदिर भी, और वहां भी रोज़ पूजा और भोग लगता है। और तो और नाना का घर इतना छोटा है कि वहां 8 तो आँगन हैं वो भी बड़े-बड़े, तो बाकी आप अंदाजा लगा लीजिये}। और हम सब हंसने... ऐसा लगा जैसे नाना जी समझ गए थे कि हम बच्चे किस बात को लेकर इतनी गपशप कर रहे थे और मज़े-से हंस रहे थे... और यदि हम लोग धोखे-से मम्मी लोगों से कहते तो पक्के-से दांत पड़ती, कि "आख़िर हम लोग भी तो बच्चे थे, हम लोगों ने भी किया है ये सब"। पर नाना, नाना बिलकुल अलग थे... इन लोगों जैसे नहीं... हाँ हामारी एक मौसी जरूर बताती हैं कि, वो जब छोटी थीं और उन्हें पूजा करने को कहा जाता था तो वो पाँचों उँगलियों से चन्दन लगती थीं, कहती थी कि, "हम एक साथ चन्दन घिस लेते और सभी भगवानों को एक थाली में रखकर {शिव जी और सभी सालिग्राम जी को } पाँचों उँगलियों में चन्दन लगाकर सभी को शोर्ट-कट में निपटा देते थे...
बस आज भी मम्मी के पुजहे में पूजा करते में अचानक से ये यादें ताज़ा हो गयीं... पर जवाब आज तक नहीं मिला, कि भगवान खाने को पहले और नहाने को बाद में क्यूं होते हैं?
आप भी सोचिये और मुस्कुराइए...

आज की बारिश... और यादें


आज बारिश में बच्चों को को भीगता देख,
मन फ़िर से यादों के गलियारों में भटकने चला गया...

वो स्कूल से घर आते में,
जानबूझ कर भीग जाना,
वो रेन-कोट न होने का बहाना बनाना...
ड्रेस गीली हो जाने पर,
मम्मी की भारी भरकम डांट खाना...
और,
यदि धोखे से बीमार पड़े तो,
सारे रिश्तेदारों, दोस्त-यारों के वो अजीबो-गरीब नुस्खे बताना...
और दुबारा ये बचपना न करूँ, ये भी समझाना...

ऐसा नहीं है कि अब भीग नहीं सकती,
या बहाने नहीं बनाऊँगी...
भीगूँगी, बहाने बनाऊँगी...
और मम्मी की ढेर सारी डांट खाऊँगी
रिश्तेदारों, दोस्त-यारों के भी फ़ोन आयेंगे,
फ़िर से सब अपने-अपने तरीकों से समझायेंगे...
पर...
अब बात ड्रेस गीली होने की नहीं,
बात होगी कि मै बड़ी हो गई हूँ...
बात मेरे बचपने की नहीं,
बात होगी की अब इतनी तो समझदार हो ही गई हूँ...

हाँ सही ही तो है...बड़ी तो सिर्फ मै हुई हूँ,
बाकी सब का यौवन तो वैसा ही है...
सावन तो सिर्फ मेरे लिए बदला है,
बाकी सब के लिए तो मौसम वैसा ही है...
खैर...
हाँ तो हम कहाँ थे...
उन बच्चों को देख,
उनके बीच खुद को खोज रही थी...
अपने भविष्य को, यूँही
भीगते, मस्ती करते सोच रही थी...
तभी अचानक, मम्मी की आवाज़ का कानों में आना...
"खिड़की बंद करो वरना पाने अन्दर आयेगा"
और हमेशा की तरह मेरी एक और सोच, एक और सपने का टूट जाना...

मेरी अपनी-सी तमन्ना...

धुंधली-सी रोशनी में
जागी-सी तमन्ना
रात की तन्हाई में
एक हमदम -सी तमन्ना
उमड़ती भावनाओं को किसी मंजिल की तलाश थी शायद...
चारों और पसरे सन्नाटे में
एक सिसकी-सी तमन्ना

सुलझे बालों के बीच
उलझी-सी तमन्ना
सजे-संवरे बिस्तर पर
बिखरी-सी तमन्ना
बहते दर्द को किसी मंजिल की थी शायद...
सूखी तकिया के किसी कोने में
गीली-सी तमन्ना

इस भीड़ के किसी कोने में
वो शांत-सी तमन्ना
कांच के टुकड़ों से भरी पोटली में
नाज़ुक ख्वाब-सी तमन्ना
भटकती आँखों को किसी मंजिल की तलाश थी शायद...
अनजानों के हुजूम में
मेरी अपनी-सी तमन्ना

अनकही बातों में
इशारों-सी तमन्ना
अनछुई चाहतों में
अहसासों-सी तमन्ना
बिखरते मोतियों को किसी मजिल तलाश थी शायद...
कुछ पूरी, कुछ अधूरी कविता में
लफ़्ज़ों-सी तमन्ना...

दो मिनट का मौन... आज़ादी-दिवस के नाम

जी हाँ, सही पढ़ा आपने... दो मिनट का मौन, आज़ादी-दिवस के नाम...
मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि मुझे भारतीय होने पर या स्वतंत्रता-दिवस जैसे शुभ दिन पर गर्व या इसे मानाने कि ख़ुशी नहीं है... बल्कि अब स्कूल छोड़ने का दुःख सताता है, क्योंकि स्कूल में हम ये दिन बड़े ही चाव से मानते थे... पर न जाने क्यों इस बार अपने इस गौरवपूर्ण दिवस पर दो मिनट का मौन; जो हम शोक व्यक्त करने और किसी की आत्मा की शांति के लिए रखते हैं; करने का मन हो रहा है... शोक से यह मत समझ लीजियेगा कि मै उन शहीदों की आत्मा या उनके बलिदान का शोक मनन चाहती हूँ, क्योंकि...
"शहीदों कि चिताओं पर लंगेगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही निशाँ होगा"
और मै उन्हें कुछ कह सकूँ इतनी मेरी हस्ती नहीं...
परन्तु यह शोक उन्ही से जुड़ा होगा, उन्ही की शहादत में होगा, क्योंकि ये मौन होगा उन सपनों के लिए जो उन्होंने देखे थे और उस एक सपने के लिए अपना हर सपना कुर्बान कर दिया, ये मौन होगा उस भविष्य के लिए जो उन्होंने इस देश के लिए चाहा था और उस एक चाहत के लिए अपनी हर चाहत देश के नाम कर दी, उस मकसद के लिए जिसके उनके रास्ते भले ही अलग-अलग थे पर मंजिल एक ही थी, उस एक तमन्ना के लिए जो उनके सीने में धड़कन की तरह धड़कती थी और उसी तमन्ना के लिए उन्होने अपनी हर धड़कन उन्ही हँसते-हँसते रोक दी, उस एक भारत के लिए जिसके लिए उन्होंने अपनी हस्ती ही मिटा दी... इससे ज्यादा मोहब्बत और क्या होगी किसी की अपने वतन से... पर आज, आज देखो तो वैसे कुछ भी नहीं जो उन्होंने चाहा था, जो उन्होंने अपनी हर दुआ में माँगा था। पर तब भी हम भारतीय अपने-आप को तसल्ली देने से नहीं चूकते, अपने-आप में ही खुश रहते हैं की हमने ये किया वो किया, तरक्की की विज्ञानं के क्छेत्र में, शिक्छा के छेत्र में, और भी न जाने क्या-क्या। पर ऐसी तरक्की किस काम की हमें जो हमें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दे? और अपनी गलती दूसरों पे मढ़ देना जो जैसे हमें बचपन से सिखाया गया हो... वो हमें सिखा गए थे अपनों के लिए लड़ना और हम, हम अपनों के लिए का तो पता नहीं पर हाँ अपनों से ज़रूर लड़ रहे हैं। न जाने क्या हो गया उनके सपनों का भारत? और इसीलिए कल, यानी १५ अगस्त, स्वतंत्रता दिवस पर मै रखूंगी दो मिनट का मौन... उनकी हर चाह, हर सपने और हर प्रार्थना के लिए।

आज होते गर तुम, तो देखते
कैसा है तुम्हारे सपनों का भारत
मै क्या कहूँ, कि
क्या से क्या हो गया तुम्हारे अपनों का भारत
तुमने चाही थी एकता, अखंडता और शांती...
यदि कहीं से देख सकते हो तो बताओ
क्या वकाई वैसा ही है तुम्हारे सपनों का भारत...

सोच

यूँ न पूछो...

न पूछो हमसे बीती रात का आलम...
बिस्तर की सिलवटें सारा हाल बयाँ करतीं हैं...




कोशिशों को पूरा होते देखने कि ख्वाइश थी शायद...

उन्नीदीं आँखों में जागते सपने संजोने की कोशिश थी शायद,
पंखे को चलता देख, थक कर सो जाने की कोशिश थी शायद,
मेरी करवटों से शायद ये बिस्तर भी थककर चूर हो गया...
बार-बार यूँ घड़ी वक़्त देखना...
आज पूर्व से किरणों को जल्दी बुलाने की कोशिश थी शायद...

टी.व़ी. के चैनल्स यूँ बदलने की वजह,
कोई आवाज़ सुनने की ख्वाइश थी शायद
कागज़ पर यूँ कलम चलने की वजह,
दिल की हर बात लिख देने की ख्वाइश थी शायद
कुछ खास ही होगा
जिसने मेरी नींद को यूँ मुझसे दूर कर दिया
ऐसे ही ढेर सवालों को लिखते-लिखते
ज़वाब खोज लेने की ख्वाइश थी शायद...

क्या Google हिंदी से डरता है???

जय हिंदी, जय हिन्दुस्तान
सभी हिंदी हिंदीभाषियों और हिंदी-प्रेमियों को जय-जय...
ये बात बहुत दिनों से मुझे, मेरे विचारों, और मेरे मन को खाए जा रही थी, पर आज न जाने क्यूं बिना लिखे रहा नहीं गया... क्या वाकई ये सच है कि गूगल जैसी बड़ी साईट हिंदी लेखकों से डरती है? क्या है, गूगल की अलग-अलग सुविधाओं द्वारा मेरा ध्यान आकर्षित किया और जब मैंने सही में ध्यान दिया तो ये एक बात पकड़ में आई...
हुआ यूँ, कि मेरे एक ब्लॉगर मित्र ने कहा कि, जब मै ब्लोगिंग कि दुनिया में प्रवेश कर ही चुकीं हूँ तो मुझे इससे कुछ लाभ भी उठाना चाहिए, आख़िर मेहनत तो मेरी ही है और यदि यूँही अपनी बात लिखने में कुछ कमी हो तो हर्ज़ ही क्या है? मुझे भी लगा कि सही ही है, आख़िर माँ-पापा को भी तो लगना चाहिए कि नहीं लड़की वक़्त जायर नहीं कर रही, कुछ भी यूँ ही कीबोर्ड पर खटर-पटर नहीं कर कर रही... और तो और आज तक मेरे परिवार में किसी ने लेखन के इस बड़े अखाड़े को देखा तक नहीं था, तो उन्हें भी लगा कि चलो किसी नए क्षेत्र में शुरुआत तो कर रही है... इसीलिए, मैंने माउस के ज़रिये गूगल की अलग-अलग सर्विसेस में हाथ-पाँव मारने शुरू कर दिए... और गूगल का बहुत-बहुत धन्यवाद जो उन्होंने हम जैसे लिखनेवालों के लिए सुविधाए उपलब्ध कराई है, परन्तु भेद-भाव के साथ... अब एक तरफ एक सर्विस है गूगल-एडवर्ड्स {Google-adwords}, जिसके लिए हमें गूगल को कुछ भुगतान करना पड़ता है, तो उसके लिए हिंदी की कोई रोक-टोक या किसी भी और भाषा की कोई पाबंदी नहीं है, परन्तु वही एक सर्विस है गूगल-एडसेंस {Google-adsence}, जिसके लिए गूगल लेखकों को भुगतान करता है... और यही आता है कहानी में मोड़, गूगल-एडसेंस के नियमों और शर्तों में हिंदी भाषा को अनुमति ही नहीं है... मतलब यदि आप हिंदी में लिख रहे हैं तो गूगल आपके उस अकाउंट को अनुमोदित नहीं करता है...
तो हम इसका अर्थ क्या निकाले, कि गूगल हिंदी-लेखकों से डरता है?
कि कहीं, हिंदी भाषा को अनुमति देदी, तो न जाने उसे किसे कितना भुगतान करना पड़े???
आप क्या सोचते हैं...

इतनी तेज़ बारिश और ये मन...

उफ़ ये बारिश... वो भी इतनी तेज़...
ये सर्द हवाएँऔर उस पर पानी की फुहार
न जाने क्यों है इतनी गर्जन
शायद हमसे कुछ कहना चाहता है ये मौसम
ये मौसम,
बढाताहै मेरी तन्हाई
कातिल उसकी याद, फ़िर खंजर ये जुदाई
पिघलना चाहती हूँ उसकी बांहों में
पढ़ना चाहती हूँ अपनी चाहत को उसकी आँखों में...

क्या होगा वो भी यूँ ही मेरे इंतज़ार में
"हम मिलेंगे कभी" इसी ऐतबार में...
न जाने कैसा होगा वो, कहाँ होगा?
कैसी होंगी उसकी आँखें, उसकी बाँहें?

ये सपना सच होगा या रहेगा सिर्फ धोखा
न जाने कब एक होंगी हमारी जुदा रांहें...

ये कैसा अहसास है...

दिन-रात महसूस होता है जो...
ये कैसा अहसास है???
है तो मुझसे दूर... पर...
फ़िर भी मेरे सबसे पास है...

मेरी मंजिल, मेरा साहिल और मेरी जीने की जुस्तज़ू
जानती हूँ मुश्किल है ये सोचना...
पर फ़िर भी हर आरज़ू के पूरे होने की आस है...

समझदार या नासमझ???

कभी-कभी कुछ बातें बिलकुल ही समझ से परे होती हैं... समझ नहीं आता कि हम किस पाले में हैं, या वो हमें क्या समझते हैं... कभी हम उनके लिए दुनिया में सबसे ज़्यादा समझदार इंसान होते हैं और फ़िर कभी अचानक से पूरे बेवकूफ... कभी उन्हें हमारा कोई काम न करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता और कभी वही काम करना पसंद नहीं आता... आख़िर हम करें भी तो क्या करें? और पूछें भी तो किससे कि हम उनकी नज़रों में हैं क्या... समझदार या नासमझ...?
जी हाँ... मेरा इशारा हमारे बड़ों की तरफ है, खासतौर पर हमारे माता-पिता... कभी-कभी लगता है कि हाँ, हम उन्हें कुच्छ तो समझते हैं, पर कभी-कभी वो, उनकी बातें कुछ भी समझ नहीं आती... कभी तो वो हमें किसी काम को करने या कोई निर्णय लेने पर कहते हैं कि, " हाँ, हमारा बेटी/बेटा अब समझदार हो गई/गया है" या "हमारे बच्चे अब बड़े हो गए हैं, अब वो सही फैसले ले सकते हैं" {तो क्या सही फैसले सिर्फ बड़े ले सकते हैं?}, खैर..., और कभी उन्ही बच्चों को अचानक से ये सुनने मिलता है कि, "अभी तुम इतने बड़े नहीं हुए कि ऐसे फैसले ले सको" या, "कभी तो बड़ों जैसी बात किया करो" या, "अब तो बड़े हो जाओ"... वगैरा-वगैरा... जब शाबाशी मिली तब तो फूल के गुप्पा हो गए पर जब फटकार हाँथ आई तब लग गए विश्लेषण करने में कि आख़िर गलती हुई कहाँ? पर गलती समझ ही नहीं आती... और ये किसी एक बच्चे की दास्ताँ नहीं है बल्कि घर घर कि कहानी है... न सिर्फ बच्चों को बल्कि यह बात हर छोटे को अपने बड़े से सुनने मिल जाती है...
बस इन्ही बातों ने परेशान किया था, कि आख़िर हमें कभी समझदार तो कभी एक नासमझ की पदवी क्यूं दे दी जाती है... और तो और ये तबादला बहुत ही जल्दी-जल्दी किया जाता है... तब मी इनकी बातों में ध्यान देना शुरू किया कि कौन-सी बातों के लिए हम होशियार और कौन-सी बातों के लिए नालायक होते हैं? और जो पाया वो तो और भी समझ से कोसों दूर था... जब हम कोई ऐसा काम करते हैं जो हमारे माता-पिता या बड़ों के मन का होता है तब तो हम समझदार और यदि धोखे से कोई ऐसा काम कर दिया जो उनके मन का नहीं होता तो हम नासमझ घोषित हो जाते हैं... और उससे भी बड़ी विडंबना यह कि कहते भी हैं कि, "भई, हमने तो तुम्हे पूरी आज़ादी दी कि तुम अपने मन से अपने काम करो और अपनी मर्जी से फैसले लो" या फ़िर, "हमने तुम आर कभी अपनी कोई मर्जी नहीं थोपी"... अरे! ये क्या बात हुई? एक तरफ तो आप कहते हैं कि आपको हमारा फैसला रास नहीं आया और दूसरी तरफ आप ही कहते हैं कि आप हम पर अपनी मर्जी नहीं थोपना चाहते... आख़िर हमारे लिए आपकी ख़ुशी सबसे ज़्यादा मायने रखती है, या फ़िर हम आपकी फिक्र करना छोड़ दें, पर ऐसा चाह कर भी नहीं क्र सकते... तो करें तो क्या करें?
हाँ, एक बात और, ऐसा लगता है कि वो जानबूज कर नहीं करते, ये हमारे समाज की मनोवैज्ञानिक समस्या है... हो सकता है कि कल को मै भी इसी समस्या से ग्रसित रहूँ, और मुझसे छोटे सोचें कि, वो ऐसा क्या करें कि हमेश ही मेरी नज़रों में वो समझदार रहें... आख़िर हर छोटा यही तो चाहता है कि उसके माता-पिता या बड़े उसे हमेशा ही समझदार माने... परन्तु, मेरी तरफ से मेरी पूरी-पूरी कोशिश रहेगी कि मैन अपने फैसले दूसरों पर न थोपूँ... चाहे छोटा हो या बड़ा... समझदार हो या नासमझ... ;-)

नानी की वो एनिमेटेड कहानियां...

याद है, बचपन में... चाहे गर्मी की छुट्टियों में या नाना के घर में कोई अवसर... बस पहुँच गए हम अपने ननिहाल... दिन-भर भाई-बहनों के साथ मस्ती, इधर दौड़ना उधर भागना, मौसी लोगों से ढेर सारी बातें करना, सब अपने-अपने स्कूल की, शहर की दोस्तों की बातें एक-दूसरे को बताना, नाना-मामा लोगों का वो मेहमाननवाजी करना, नानी का पूछना कि "क्या कहोगे? क्या बना दें?"... किसी भी माँ को ये टेंशन नहीं होता था कि उनका बच्चा कहाँ है, किसके साथ है, खाना खाया, नहीं खाया... बस पूरा का पूरा दिन कैसे कट जाता था, समझ ही नहीं आता था... और फ़िर आती थी रात, दिन-भर की दोस्ती रात में किसी के काम नहीं आती थी क्योंकि रात में तो नानी के बगल में कौन सोएगा, इस बात पर तो कोई भी बच्चा समझौता करने को तैयार ही नहीं होता था... सबको बस उनके बगल में ही सोना होता था, और हो भी क्यों न, एक नानी का वो ममत्व से भरा आँचल और उनकी वो कहानियाँ... बनी बात है कि जो बाजू में सोयेगा वो नानी के ज्यादा करीब रहेगा और उसे कहानी सबसे अच्छे से सुनाई देगी... यदि सच कहूँ नानी के बाजू में लेटकर कहानी सुनने का मज़ा कुछ और ही होता है... आज भी उस अहसास को भूला नहीं है ये मन...
वो कहानियाँ, जिनमे कभी एक रजा होता, उसकी तीन-चार रानियाँ होतीं, पर किसी को भी औलाद नहीं थी, फ़िर कोई संत-ग्यानी यज्ञ करते हैं और रजा को दक्षिण के जंगलों में जाना होता और वहां लगे किसी आम के पेड़ से 12 आमों का गुच्छा एक ही निशाने में तोडना होता और रानियों को लाकर देना होता, और उनमें से छोटी रानी वो आम मक्खन के घड़े में दाल देती और उसका बेटा उसी घड़े में जन्म लेता, बड़ा होता....................... या फ़िर एक राजकुमारी होती, जो रोती तो आंसू कि जगह मोती गिरते और हंसती तो फूल झड़ते, उसे एक दुष्ट जादूगर रजा अपने साथ ले जाता, फ़िर उसी रजा के महल के दासों में से एक दास, जिसे उस राजकुमारी पर दया आती और धीरे-धीरे वो उससे प्यार करने लगता,और उसे बचाता............... या फ़िर एक रजा के चार बेटे रहते, सबकी शादी हो जाती सिवाय छोटे राजकुमार के, वो जिससे शादी करना चाहते उसके महल तक पहुँचने का रास्ता जानने के लिए एक ऋषि-मुनि की सेवा करता और जब व्याह कर उसे घर ले जाने लगता तो बीच में एक भिखारिन उस राजकुमारी को कुँए में धकेल देती, और फ़िर वो राजकुमारी उस कुँए में कमल का फूल बनकर खिलती पर उसे कोई तोड़ नहीं पता, फ़िर वो कमल का फूल लोगों को कुछ संकेत देता, कोई पहेली बोलता जिसका जवाब वो राजकुमार होता और वो जैसे ही कमल का फूल तोड़ने के लिए आता, कमल का फूल अपने-आप कुँए से निकक उसके पाँव में आ जाता, फ़िर वो राजकुमार उसे घर ले जाता और फ़िर वो कमल का फूल कुछ कहता जिसे भिखारिन समझ जाती और उसे तोड़कर बागीचे में फेंक आती और वो कमल का फूल चने की भाजी बनाकर उग जाता............... या फ़िर कोई मूर्ख इंसान अपने ससुराल जा रहा होता तो उसकी माँ समझाती कि बेटा नाक की सिधाई में जाना और जहाँ रात हो वहीँ सो जाना, वो आदमी अपने ससुराल के पिछवाड़े तो पहुँच जाता है पर माँ ने कहा था इसीलिए वहीँ सो जाता है और ससुराल की सारी बातें सुन लेता है, दूसरे दिन ससुराल जाकर बिलकुल जानकार बन जाता है और पूरे शहर में "जानकार पांड़े" के नाम से मशहूर हो जाता है, फ़िर उससे मिलने लोग आने लगते हैं, भाग्य कुछ ऐसा साथ भी देता है कि उन्हें सब पहले से पता होता है, फ़िर रानी कि कोई चीज़ चोरी हो जाती है और रजा जानकार को बुलातें हैं, और इस बार जानकार को कुछ पता नहीं होता.................... और भी न जाने कितनी कहानियाँ... बच्चे तो बच्चे, बड़े भैया-दीदी भी आकर बैठ जाया करते थे इन कहानियों को सुनने, और कई बार तो कुछ लोग सुनते-सुनते सो जाते और दूसरे दिन किसी और से पूछते, और यदि धोखे से वो बच्चा सो जाता जिसकी बारी नानी के पास सोने की होती तब तो पूरी-पूरी सौदेबाजी होती थी, कि नानी के पास सोने दोगे तो बताएँगे... आज सोचो तो हंसी आती है, कि क्या-क्या नहीं किया नानी के पास सोने के लिए... और हाँ, यदि कभी ऐसा मौका आया कि सिर्फ हम लोग नानी के घर गए हैं तब तो शेर होते थे, और दूसरों को फ़ोन या मिलने पर बताते थे कि नानी ने कौन सी नयी कहानी सुनाई... पर कभी-कभी हम भी पहाड़ के नीचे आ जाते थे...
पर सच, कितना अच्छा लगता था, नानी सुनती जाती और हम सुनते रहते और उसे अपने ही रंगों से सजाते रहते... रजा कैसा दिखता होगा, रानिओ के कपडे जेवर, उसका बड़ा सा महल, राकुमारी कैसी होगी जिसके आँखों से मोती गिरते होंगे, बोलता हाउ कमल कैसा होगा, कढ़ाही पर फुदकती बोलती चने की भाजी कैसी दिखती होगी... हर किसी की अपनी सोच, अपने रंग और अपना आकार... कभी-कभी तो हम एक-दूसरे को चिढाने के लिए दुष्ट रजा के नाम से बुलाते और यहाँ तक कि "जानकार पांड़े" तो आजतक सबकी जुबां में हैं... वो सब भी तो एक तरह का एनीमेशन ही होता था... कभी कोई कमल बोलता नहीं, पर उन कहानियों में बोलता था... ये भी एक तरह का एनीमेशन ही हुआ... आजकल की फ़िल्में, अधिकतर, एनिमेटेड ही तो होती हैं... और पसंद भी वही की जातीं हैं... जहाँ शेर इंग्लिश बोलता है, आदमी हवा में उड़ते हैं... हनुमान, रिटर्न ऑफ़ हनुमान, अर्जुन, नीमो, हम हैं लाजवाब, बैटमैन, स्पाइडरमैन, अवतार, कोई मिल गया... न जाने कितनी ससरी फिल्में... कुछ पूरी एनिमेटेड और कुछ में इस तकनीक का इस्तेमाल...
आख़िर, एनीमेशन है क्या? एक तरह का प्रकाशीय भ्रम जो 2-D या 3-D आकृतियों से तैयार किया जाता है, और उसे चलचित्र के रूप में बड़ी स्क्रीन में दिखाया जाता है... वो सब कल्पना से परिपूर्ण होता है और सत्य से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखता... परतु यह तकनीक बहुत ही खर्चीली हैं, बहुत लागत आती है... उदहारण के तौर पर, अभी-अभी सुनने में आया कि शाहरुख़ खान अपने घर की छत पर खड़े होकर चिल्ला रहे थे, कि यदि उनकी "Ra.One" फिल्म नहीं चली तो वो सडकों पर आ जायेंगे, वैसे इस फिल्म में तकनीकी तौर पर एनिमेशन्स का इस्तेमाल किया गया है... इस बात में सच्चाई कितनी है पता नहीं पर सुनने को तो यही मिला... सही भी है, पहले 2-D, 3-D इमेजेस बनाना, फ़िर उन्हें एक क्रम से धीरे-धीरे ढालना... वक़्त और पैसा दोनों ही बहुत मात्र में लग जाता है... पर नानी की कहानियों कि लागत कुछ भी नहीं होती थी, और-तो-और उसमें मिलता ही था... नानी की वो ममता जो सिर्फ हमारे हिस्से की होती थी... आख़िर उन्हें भी तो "मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता था"...