दो मिनट का मौन... आज़ादी-दिवस के नाम

जी हाँ, सही पढ़ा आपने... दो मिनट का मौन, आज़ादी-दिवस के नाम...
मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि मुझे भारतीय होने पर या स्वतंत्रता-दिवस जैसे शुभ दिन पर गर्व या इसे मानाने कि ख़ुशी नहीं है... बल्कि अब स्कूल छोड़ने का दुःख सताता है, क्योंकि स्कूल में हम ये दिन बड़े ही चाव से मानते थे... पर न जाने क्यों इस बार अपने इस गौरवपूर्ण दिवस पर दो मिनट का मौन; जो हम शोक व्यक्त करने और किसी की आत्मा की शांति के लिए रखते हैं; करने का मन हो रहा है... शोक से यह मत समझ लीजियेगा कि मै उन शहीदों की आत्मा या उनके बलिदान का शोक मनन चाहती हूँ, क्योंकि...
"शहीदों कि चिताओं पर लंगेगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही निशाँ होगा"
और मै उन्हें कुछ कह सकूँ इतनी मेरी हस्ती नहीं...
परन्तु यह शोक उन्ही से जुड़ा होगा, उन्ही की शहादत में होगा, क्योंकि ये मौन होगा उन सपनों के लिए जो उन्होंने देखे थे और उस एक सपने के लिए अपना हर सपना कुर्बान कर दिया, ये मौन होगा उस भविष्य के लिए जो उन्होंने इस देश के लिए चाहा था और उस एक चाहत के लिए अपनी हर चाहत देश के नाम कर दी, उस मकसद के लिए जिसके उनके रास्ते भले ही अलग-अलग थे पर मंजिल एक ही थी, उस एक तमन्ना के लिए जो उनके सीने में धड़कन की तरह धड़कती थी और उसी तमन्ना के लिए उन्होने अपनी हर धड़कन उन्ही हँसते-हँसते रोक दी, उस एक भारत के लिए जिसके लिए उन्होंने अपनी हस्ती ही मिटा दी... इससे ज्यादा मोहब्बत और क्या होगी किसी की अपने वतन से... पर आज, आज देखो तो वैसे कुछ भी नहीं जो उन्होंने चाहा था, जो उन्होंने अपनी हर दुआ में माँगा था। पर तब भी हम भारतीय अपने-आप को तसल्ली देने से नहीं चूकते, अपने-आप में ही खुश रहते हैं की हमने ये किया वो किया, तरक्की की विज्ञानं के क्छेत्र में, शिक्छा के छेत्र में, और भी न जाने क्या-क्या। पर ऐसी तरक्की किस काम की हमें जो हमें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दे? और अपनी गलती दूसरों पे मढ़ देना जो जैसे हमें बचपन से सिखाया गया हो... वो हमें सिखा गए थे अपनों के लिए लड़ना और हम, हम अपनों के लिए का तो पता नहीं पर हाँ अपनों से ज़रूर लड़ रहे हैं। न जाने क्या हो गया उनके सपनों का भारत? और इसीलिए कल, यानी १५ अगस्त, स्वतंत्रता दिवस पर मै रखूंगी दो मिनट का मौन... उनकी हर चाह, हर सपने और हर प्रार्थना के लिए।

आज होते गर तुम, तो देखते
कैसा है तुम्हारे सपनों का भारत
मै क्या कहूँ, कि
क्या से क्या हो गया तुम्हारे अपनों का भारत
तुमने चाही थी एकता, अखंडता और शांती...
यदि कहीं से देख सकते हो तो बताओ
क्या वकाई वैसा ही है तुम्हारे सपनों का भारत...

सोच

9 comments:

  1. सपनों का भारत
    मेरे अपनों का भारत
    ऐसा तो नहीं था.

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  2. @Verma ji, Pabla sir... thank you so much for being agree...
    @pabla sir... मुम्मामीन

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  3. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 11 - 08 - 2011 को यहाँ भी है

    नयी पुरानी हल चल में आज- समंदर इतना खारा क्यों है -

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  4. नहीं , सपनों का भारत ऐसा तो नहीं ही रहा होगा ...
    टूटे सपनों की चुभन महसूस हो रही है रचना में ...
    सार्थक अभिव्यक्ति !

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  5. बहुत ही बढ़िया लेख बहुत ही अच्छा लगा पढ़ कर !

    मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है!!

    ब्लॉग की 100 वीं पोस्ट पेश करते हुए मुझे खुशी और हर्ष हो रहा है!

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  6. आपका प्रयास सराहनीय है

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  7. सटीक अभिव्यक्ति।

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