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शिकायतों का रिवाज़…
बड़े हमें नहीं समझते, हम छोटों को नहीं समझते...
कोई हमें नहीं समझता, हम किसी और को नहीं समझते...
बड़ी आम बातें हैं, बड़ी आम शिकायतें हैं...
अखिय ये बातें, ये शिकायतें क्यों है???
बड़े हमें क्यों नहीं समझते? क्यों वो हमेशा हमें गलत ही समझते हैं? क्यों उन्हें हमारे तरीकों से दिक्कत है? क्यों वो चाहते हैं कि हम हमेशा वो ही करें जो वो चाहते हैं, वैसे ही करें जैसे वो चाहते हैं? छोटों को हमेशा अपने से बड़ों से यही शिकायत होती है. और बड़े, उनके पास भी एक पुलिंदा होता है अपने से छोटों से शिकायतों का. जैसे छोटे हमेशा अपने ही मन की क्यों करते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि हम जो कह रहे हैं वो गलत है? क्यों उन्हें हम, हमारे विचार पुराने ज़माने के लगते हैं? उन्हें क्यों लगता है कि सिर्फ उन्हें सबकुछ आता है? वगैरा-वगैरा… अजीब-अजीब सी शिकायतें, अलग-अलग लोगों से शिकायतें. कहीं माँ-बाप को बच्चों से, कहीं बच्चों को माँ-बाप से और, कभी पति को पत्नी से तो कभी पति को , पत्नी से, कभी सम्बन्धियों से, कहीं रिश्ते से कहीं रिश्तेदारों से, और कभी दोस्तों से कभी दुश्मनों से, कभी नेताओं से कभी पड़ोसियों से… हज़ार शिकायतें, और उनके लाख बहाने।
कोई हमें नहीं समझता, हम किसी और को नहीं समझते...
बड़ी आम बातें हैं, बड़ी आम शिकायतें हैं...
अखिय ये बातें, ये शिकायतें क्यों है???
बड़े हमें क्यों नहीं समझते? क्यों वो हमेशा हमें गलत ही समझते हैं? क्यों उन्हें हमारे तरीकों से दिक्कत है? क्यों वो चाहते हैं कि हम हमेशा वो ही करें जो वो चाहते हैं, वैसे ही करें जैसे वो चाहते हैं? छोटों को हमेशा अपने से बड़ों से यही शिकायत होती है. और बड़े, उनके पास भी एक पुलिंदा होता है अपने से छोटों से शिकायतों का. जैसे छोटे हमेशा अपने ही मन की क्यों करते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि हम जो कह रहे हैं वो गलत है? क्यों उन्हें हम, हमारे विचार पुराने ज़माने के लगते हैं? उन्हें क्यों लगता है कि सिर्फ उन्हें सबकुछ आता है? वगैरा-वगैरा… अजीब-अजीब सी शिकायतें, अलग-अलग लोगों से शिकायतें. कहीं माँ-बाप को बच्चों से, कहीं बच्चों को माँ-बाप से और, कभी पति को पत्नी से तो कभी पति को , पत्नी से, कभी सम्बन्धियों से, कहीं रिश्ते से कहीं रिश्तेदारों से, और कभी दोस्तों से कभी दुश्मनों से, कभी नेताओं से कभी पड़ोसियों से… हज़ार शिकायतें, और उनके लाख बहाने।
न जाने कहाँ से आती हैं इतनी शिकायतें? क्यों करते हैं हम शिकायतें? जी, वैसे ये भी एक शिकायत ही है।यदि सोचा जाए तो असल में शिकायतें हमारे ही दिल-ओ-दिमाग की उपज होती हैं। और सबसे ज्यादा तब जब हमें असंतोष होता है। जब भी हमें किसी की कोई बात या काम हमारे हिसाब से सही नहीं होता, या हम उससे संतुष्ट नहीं होते तभी ये शिकायत पैदा होती है या हमारा कोई काम या बात किसी को पसंद नहीं आती तो उन्हें हमसे शिकायत हो जाती है। पर जब हमें किसी से शिकायत हो तो हमें सामने वाला गलत नजऱ आता है, परन्तु जब किसी और को हमसे शिकायत होती है तब भी हम सामनेवाले को ही गलत मानते हैं और खुद को सही… है न अजीब-सी बात। बात ये कि हम हमेशा खुद को सही और दूसरे को गलत। शायद ऐसी ही बातें, सोच और धारणा शिकायतों की जन्मदाता हैं। ये भी तो हो सकता है कि हमें किसी से शिकायत किसी गलत-फहमी की वजह से हो और किसी और को हमसे शिकवा हमारे किसी गलत कदम का नतीजा हो।
कितना अच्छा होता यदि हमें किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती। किसी को किसी से कोई भी दिक्कत न होती। क्योंकि जब भी कहीं कोई शिकायत होती है तब एक दर्द होता है। कभी उसे जिससे शिकायत की गई हो तो कभी करनेवाले को. बनी बात है जब हम सुनते हैं कि हमारे किसी अपने को हमारी कोई बात अच्छी नहीं लगी तो हमें तकलीफ होती है, ऐसे ही सामनेवाले को भी लगता होगा। हाँ एक और बात होती है, यदि हमसे हमारी शिकायत हमारे सामने, हमारे मुंह पर कर दी जाए तो ठीक भी है, परन्तु जब भी वो किसी और के सामने और हमारे पीठ पीछे के जाए तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जाती है, क्योंकि कभी-कभी वो शिकायत हम तक किसी और ही रूप में पहुँचती है। पर सबसे अच्छा तो तब होता जब न असंतोष होता और न ही इन शिकायतों का बीज पनपता… न गिला न शिकवा… सब हंसते-हंसाते, खिलखिलाते मजे से जिंदगी गुजारते…
तो आज से किसी से कोई गिला-शिकवा-शिकायत मत रखिये, और यदि होती भी है तो जिससे भी शिकायत है उसी से बात करें और उसे जल्द-से-जल्द समाप्त कर दें…
P.S. ये लेख सुरभ सलोनी में 23 अप्रैल को छपा था.
मेरे शब्दों कि रूह... अनकहे अलफ़ाज़
यूँ ही एक बात कही थी तुमने कल
बातों ही बातों में...
कुछ दबे भाव थे
उनमें... जो शब्द सीचें थे
लेकर हाँथ मेरा अपने हाथों में...
न जाने क्या था उन छिपी छिपी सी बातों में
बहुत था फर्क बड़ा...
लफ़्ज़ों और ज़ज्बातों में
पर कुछ तो था
जो कहना चाहते थे तुम...
या चाहते थे समझाना मुझे... कुछ भी कहे बिना...
जानते हो न कि समझ जाउंगी उन धडकनों को मैं...
और समझूँ भी क्यों न...
मैं ही तो हूँ वहां...
पर इस बार ज़रा-सा फेर हैया समझ में हो रही देर है
तुम जो कहते हो मैं सुन नहीं पाती
और इसीलिए शायद कुछ कह नहीं पाती
क्योंकि
मेरे शब्दों कि रूह तो तुम्हारे अनकहे अलफ़ाज़ ही है न...
और शिकायत तुम्हारी कि "मैं कुछ कहती नहीं"...
माना कि ये मेरा बचपना है...
अपनी हर अच्छी-बुरी, ख़राब-नायब बात लेकर यहाँ आ जाती हूँ... इसीलिए आज भी आ गई...
सब कहते हैं कि अभी भी मुझमें बचपना है...
जब tiger ख़तम हुआ तब मैं छोटी थी तो मान लिया, कि रोना जायज़ था... kity के ख़तम होने में भी सभी ने मान लिया क्योंकि उसे मेरी best-friend {शिखा} ने gift किया था... पर जब tony ख़तम हुआ तब जरूर सभी ने ज़रा-सा कहा... पर सिर्फ ज़रा-सा... क्योंकि उसे भी शिखा ने ही गिफ्ट किया था... पर अब... अब जब वो गई... और मेरा उदास चेहरा सबने देखा तो कुछ मुझे समझाने लगे और कुछ ने मज़ाक भी उड़ाया कि "अभी भी बच्ची है... बड़ी हो जा... तुझे और दिला देंगें... अब तो खुद ही खरीद सकती है..." और भी न जाने कितनी बातें और कितने तरह की बातें... यहाँ तक कि ये भी कहा कि चिंता मत करो, तुम्हारी शादी में तुम्हें कुछ और नहीं देंगे, वही गिफ्ट कर देंगें"...
माना कि मैं खुद भी खरीद सकती हूँ, या कोई नई और भी ज्यादा अच्छी आ जायेगी, पर क्या वो सारी यादें आयेंगीं जो उसके साथ जुडी हैं... कहते हैं teen-age सबसे ख़ास और बड़ी ही अजीब age होती है... उसमें सब-कुछ अच्छा ही लगता है, और मेरी उस उम्र की सबसे ख़ास और करीबी वही तो थी... मेरे सारे राज़, घूमना-फिरना, बदमाशियां-शैतानियाँ... all-in-all सबकुछ वो जानती थी... यहाँ तक कि मेरे कई ख्वाब जो मैंने कभी किसी के साथ नहीं share किये वो भी उसे पता थे...
अरे sorry sorry ... पूरी राम-कथा पढ़ दी मगर वो है कौन ये तो बताया ही नहीं... वो है मेरी प्यारी-सी kinetic honda... zx... white colour... MP20 JA 7513... मेरे सारे दोस्त उसे मेरी उड़न-खटोला कहते थे... मेरे भाई का नाम भी लिखा था उसमें... PRINCE
sorry... है नहीं थी... :(
माना कि मैं खुद भी खरीद सकती हूँ, या कोई नई और भी ज्यादा अच्छी आ जायेगी, पर क्या वो सारी यादें आयेंगीं जो उसके साथ जुडी हैं... कहते हैं teen-age सबसे ख़ास और बड़ी ही अजीब age होती है... उसमें सब-कुछ अच्छा ही लगता है, और मेरी उस उम्र की सबसे ख़ास और करीबी वही तो थी... मेरे सारे राज़, घूमना-फिरना, बदमाशियां-शैतानियाँ... all-in-all सबकुछ वो जानती थी... यहाँ तक कि मेरे कई ख्वाब जो मैंने कभी किसी के साथ नहीं share किये वो भी उसे पता थे...
अरे sorry sorry ... पूरी राम-कथा पढ़ दी मगर वो है कौन ये तो बताया ही नहीं... वो है मेरी प्यारी-सी kinetic honda... zx... white colour... MP20 JA 7513... मेरे सारे दोस्त उसे मेरी उड़न-खटोला कहते थे... मेरे भाई का नाम भी लिखा था उसमें... PRINCE
sorry... है नहीं थी... :(
कहीं उसकी एक फोटोग्राफ भी है... मिली तो पोस्ट जरूर करूंगी...
सच ऐसा लग रहा है जैसे ज़िंदगी का एक हिस्सा चला गया... :(
पता है... आप लोग भी पढ़ कर यही कहेंगें कि ये मेरा बचपना है...
मेरी और मेरे भाई की दोस्ती बढ़ने में भी उसने बहुत मदद की... हमारे घूमने का राज़ भी वही जानती थी... कई गोल और गोल-गप्पे की कहानियाँ, ice-cream, पेस्ट्री, और भी न जाने क्या-क्या... सब जानती थी वो...
और जबलपुर की सड़कों में कहाँ कितने चक्कर मारे हैं... सदर, गोरखपुर, जलपरी से लेकर घंटाघर, कमनीय गेट तक की सड़कें नापी हैं मैंने उससे... उसने सबसे ज्यादा साथ निभाया था जब हम जबलपुर में ही थे, मम्मी को अटैक आया था, और तभी पापा का ट्रान्सफर हो गया था... और सरकारी नौकरी की हालत तो बस... यदी आपकी जगह में आनेवाला अधिकारी अच्छा है तब तो ठीक वर्ना फ़िर न तो वो खुद support करता है और न ही किसी को करने देता है... तभी शैली; मेरी छोटी बहन, अरे हाँ कल {8 सितम्बर} उसका जन्मदिन भी है,; उसे स्कूल ले जाना-ले आना पड़ता था... भाई के लिए बस थी... उसने बहुत support किया था... और उसी समय था जब मुझे अपने दोस्तों की पहचान हुई थी... और एक बात, उस समय मेरी प्रिंसिपल "प्रकाशम मैडम" मेरे teachers ने बहुत support किया था... सब कहते थे, तुम मम्मी को देख लो, यहाँ कि चिंता मत करो... ये सब मेरे 10th क्लास की बात है... स्कूल से पूरी permission थी, क्योंकि CBSE बोर्ड था तो टेस्ट वगैरा की झंझट नहीं थी... और ये भी था कि मैं कभी भी झूठ नहीं बोलती थी अपने teachers से... और वो सब मुझपे भरोसा भी करते करते और मानते बहुत थे... Thank you so much all... :)
और जबलपुर की सड़कों में कहाँ कितने चक्कर मारे हैं... सदर, गोरखपुर, जलपरी से लेकर घंटाघर, कमनीय गेट तक की सड़कें नापी हैं मैंने उससे... उसने सबसे ज्यादा साथ निभाया था जब हम जबलपुर में ही थे, मम्मी को अटैक आया था, और तभी पापा का ट्रान्सफर हो गया था... और सरकारी नौकरी की हालत तो बस... यदी आपकी जगह में आनेवाला अधिकारी अच्छा है तब तो ठीक वर्ना फ़िर न तो वो खुद support करता है और न ही किसी को करने देता है... तभी शैली; मेरी छोटी बहन, अरे हाँ कल {8 सितम्बर} उसका जन्मदिन भी है,; उसे स्कूल ले जाना-ले आना पड़ता था... भाई के लिए बस थी... उसने बहुत support किया था... और उसी समय था जब मुझे अपने दोस्तों की पहचान हुई थी... और एक बात, उस समय मेरी प्रिंसिपल "प्रकाशम मैडम" मेरे teachers ने बहुत support किया था... सब कहते थे, तुम मम्मी को देख लो, यहाँ कि चिंता मत करो... ये सब मेरे 10th क्लास की बात है... स्कूल से पूरी permission थी, क्योंकि CBSE बोर्ड था तो टेस्ट वगैरा की झंझट नहीं थी... और ये भी था कि मैं कभी भी झूठ नहीं बोलती थी अपने teachers से... और वो सब मुझपे भरोसा भी करते करते और मानते बहुत थे... Thank you so much all... :)
पर सच उसका जाना बहुत अखरा... जब तक नहीं गई थी, तब एक उम्मीद थी, पर कहते हैं न कि कभी किसी से कोई उम्मीद मत करो वर्ना तकलीफ होती है...जब वो जा रही थी तब मैं उसे जाते भी नहीं देख पाई... अन्दर आके अपने रूम में जाकर खूब रोई... लगा कि जाऊं, जो ले गए हैं उनके सामने विनती करके उनसे मांग लूं... पर फ़िर लगा कि नहीं, पापा लोगों ने उन्हें दे दी है... उनकी बात का मान ज्यादा है... इसीलिए ये भी नहीं कर पाई... शायद इस बात का भी दुःख उस दुःख को बढ़ा रहा था कि पहली बार मैं उसके लिए कुछ नहीं कर पाई...
MISS YOU SO MUCH DARLING... :(
खुद को लगता है, तभी दुखता है...
पिछले दिनों में सबकुछ अल-अलग सा समझ आ रहा है... पता नहीं क्यों, पर कभी-कभी अपनी ही सोच अजीब-सी लगती है... doubt होता है की क्या वाकई मैं ही ऐसा सोच रही हूँ? और यदि हाँ, तो क्यों?
और जो सोच रही हूँ वो सही भी है या नहीं...
खैर...
पिछले दिनों में लन्दन में हो रहे दंगों की खबर ज़ोरों पर है... हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को अपनी छुट्टियां cancel करके वापस आना पड़ा...
यहाँ गलती पुलिस से भी हुई, जब उस बेचारे निर्दोष को गोली मार दी...
चलिए आज नहीं तो कल उनकी हालत सुधर जायेगी... पर मेरी चिंता कुछ और है... कहा जाये तो चिंता का विषय इस बार मैं खुद ही हूँ...
हुआ यूं कि कल जब मैं ये सारी खबरें देख रही थी तो अचानक मेरे मुंह से निकला, "हाँ आज बात खुद पर आई तो दर्द हो रहा है"
मम्मी ने डांट भी दिया कि ऐसा नहीं बोलते...
पर तब मन में कुछ पंक्तियाँ उठीं जो लिखे बिना और यहाँ बाँटें बिना रहा नहीं जा रहा...
जानती हूँ गलत है, ऐसे ख्याल मन में आने ही नहीं चाहिए... और कहते हैं कि गलत बातों को जितना जल्दी और जितने अधिक टुकड़ों में बाँट के अपने से दूर करदो, कर देना चाहिए...
--------------------
आज खुद पे पड़ी
तो दुख न!
सोचो, जब हमें लगा था
तब हमें भी तो दुख होगा न?
तुम्हारे घर में आग लगी,
तो सभी दौड़ पड़े बुझाने के लिए...
fire-brigade बुलाई,
पुलिस बिठाई,
तैनाती करवाई,
कुछ को हवालात कि हवा खिलाई...
बात ऐसी बिगड़ी थी,
कि,
प्रधानमंत्री तक की छुट्टी कैंसल करवाई...
अब समझ आया
कि लगता है तो कितना दुखता है...
चलो बात कुछ पुरानी करें,
याद वो कहानी करें...
कुछ जुल्म-ओ-सितम जो
तुम्हारे पूर्वजों ने
हमारे पूर्वजों पर ढाए थे
जब तुम व्यापार करने का बहाना ले
हमारे देश में आये थे...
फ़िर-फ़िर धीरे-धीरे
तुमने अपना जाल फैलाया
हमें अपना गुलाम बनाया...
तरह-तरह कि कहानी बनाई
अजब लूट थी, जो तुमने मचाई...
तुम्हारे यहाँ कि आग
से तो सिर्फ कुछ नुकसान हुआ होगा
तुम्हारे ही दंगाइयों ने कुछ buildings को फूंका होगा
तुमने पानी छिड़क
सारी आग बुझा भी दी होगी
पर उस आग का क्या
जो तुमने यहाँ दिलों में लगाई
भाई-भाई की दुश्मनी कराई
कितना लहू बहाया हमने,
आज भी बहा रहे हैं
तुम्हारी लगाई आग
आज तक बुझा रहे हैं...
याद करो वो 100 साल
जब हम थे बेहाल
और तुम खुशहाल...
फ़िर कुछ सरफिरों का दिमाग चकराया
तुम्हें खदेड़ा, मार भगाया...
कुछ हिंसा के पुजारी
तो कुछ अहिंसा के दीवाने थे
सबका मकसद एक,
सिर्फ अलग-अलग बहाने थे...
कुछ के नाम पटल पे हैं
पर कुछ से तो हम अभी भी अन्जाने हैं...
तुमने जो किया वो गलत था,
जो funda अपनाया
पता है, उसका अंजाम
हम आज तक भुगत रहे हैं...
याद है वो, "divide and rule policy"
तुम्हारा rule तो ख़त्म हो गया
पर तुम्हारी कुछ policies अभी भी हमारे बीच हैं...
और,
हम आज भी DIVIDE हैं...
पिछले दिनों में लन्दन में हो रहे दंगों की खबर ज़ोरों पर है... हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को अपनी छुट्टियां cancel करके वापस आना पड़ा...
कल अचानक बर्मिंगम में दंगाइयों ने आग लगा दी... बहुत नुकसान हुआ है... हिंसा ऐसी फ़ैली है कि इसने लीड्स, ब्रिस्टल और नॉटिंगम को भी अपनी चपेट में ले लिया... पुलिस ने इसी सिलसिले में 400 लोगों को गिरफ्तार भी किया...
ये सारी खबरें सुनकर बुरा लग रहा था... ये दंगाई कहीं भी हों, किसी भी कोने में हों... हमेशा कुछ-न-कुछ उटपटांग करते ही रहते हैं... यहाँ गलती पुलिस से भी हुई, जब उस बेचारे निर्दोष को गोली मार दी...
चलिए आज नहीं तो कल उनकी हालत सुधर जायेगी... पर मेरी चिंता कुछ और है... कहा जाये तो चिंता का विषय इस बार मैं खुद ही हूँ...
हुआ यूं कि कल जब मैं ये सारी खबरें देख रही थी तो अचानक मेरे मुंह से निकला, "हाँ आज बात खुद पर आई तो दर्द हो रहा है"
मम्मी ने डांट भी दिया कि ऐसा नहीं बोलते...
पर तब मन में कुछ पंक्तियाँ उठीं जो लिखे बिना और यहाँ बाँटें बिना रहा नहीं जा रहा...
जानती हूँ गलत है, ऐसे ख्याल मन में आने ही नहीं चाहिए... और कहते हैं कि गलत बातों को जितना जल्दी और जितने अधिक टुकड़ों में बाँट के अपने से दूर करदो, कर देना चाहिए...
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आज खुद पे पड़ी
तो दुख न!
सोचो, जब हमें लगा था
तब हमें भी तो दुख होगा न?
तुम्हारे घर में आग लगी,
तो सभी दौड़ पड़े बुझाने के लिए...
fire-brigade बुलाई,
पुलिस बिठाई,
तैनाती करवाई,
कुछ को हवालात कि हवा खिलाई...
बात ऐसी बिगड़ी थी,
कि,
प्रधानमंत्री तक की छुट्टी कैंसल करवाई...
अब समझ आया
कि लगता है तो कितना दुखता है...
चलो बात कुछ पुरानी करें,
याद वो कहानी करें...
कुछ जुल्म-ओ-सितम जो
तुम्हारे पूर्वजों ने
हमारे पूर्वजों पर ढाए थे
जब तुम व्यापार करने का बहाना ले
हमारे देश में आये थे...
फ़िर-फ़िर धीरे-धीरे
तुमने अपना जाल फैलाया
हमें अपना गुलाम बनाया...
तरह-तरह कि कहानी बनाई
अजब लूट थी, जो तुमने मचाई...
तुम्हारे यहाँ कि आग
से तो सिर्फ कुछ नुकसान हुआ होगा
तुम्हारे ही दंगाइयों ने कुछ buildings को फूंका होगा
तुमने पानी छिड़क
सारी आग बुझा भी दी होगी
पर उस आग का क्या
जो तुमने यहाँ दिलों में लगाई
भाई-भाई की दुश्मनी कराई
कितना लहू बहाया हमने,
आज भी बहा रहे हैं
तुम्हारी लगाई आग
आज तक बुझा रहे हैं...
याद करो वो 100 साल
जब हम थे बेहाल
और तुम खुशहाल...
फ़िर कुछ सरफिरों का दिमाग चकराया
तुम्हें खदेड़ा, मार भगाया...
कुछ हिंसा के पुजारी
तो कुछ अहिंसा के दीवाने थे
सबका मकसद एक,
सिर्फ अलग-अलग बहाने थे...
कुछ के नाम पटल पे हैं
पर कुछ से तो हम अभी भी अन्जाने हैं...
तुमने जो किया वो गलत था,
जो funda अपनाया
पता है, उसका अंजाम
हम आज तक भुगत रहे हैं...
याद है वो, "divide and rule policy"
तुम्हारा rule तो ख़त्म हो गया
पर तुम्हारी कुछ policies अभी भी हमारे बीच हैं...
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हम आज भी DIVIDE हैं...
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वापस आ ही रही थी कि...
आज फ़िर से आ गई... ये नहीं कहूँगी कि आ पाई... क्योंकि ये तीन महीने बहुत से अनुभवों से गुज़री और बहुत कुछ सीख भी गई...
और वापस तो 3 दिन पहले ही आ जाती... मगर ये गूगल रूपी काली बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो बस... हुआ ये कि इतने दिन बाद जब ब्लॉग लिखने पहुँची तो उससे हिंदी फ़ॉन्ट ही गायब... मुझे लगा कोई सेट्टिंग बदल गई... सब छाना-खंगाला, पर कुछ समझ नहीं आया... "help zone" भी ट्राई किया, मगर कोई फायदा नहीं... फ़िर मासूम अंकल को परेशान किया, तब उन्होंने बताया कि ये मेरे बस नहीं बल्कि सभी में यही दिक्कत आ रही है... और गूगल हिंदी टाईपिंग का रास्ता सुझाया... thank you so much uncle ... :)
हाँ अब अनुभवों की बात... और इन तीन महीनों की बात...
सीखना पड़ता ही, आज नहीं तो कल... बस कुछ हालत अलग होते... सबसे ज्यादा मेरी प्यारी-सी माँ खुश हैं... उनका कहना है कि "चलो अच्छा हुआ, भले ही मेरा हाँथ-पैर टूटा पर तुम इतना मैनेज करना सीख गई"... पर उन्हें या परिवार में बड़ी माँ, बुआ या चाचा लोगों को यकीन नहीं होता कि मैं ये सब मैनेज कर रही हूँ, क्योंकि उनकी नज़र में मैं आज भी वही छोटी सी पूजा हूँ... पर अब अचंभित और खुश... सबसे ज़्यादा माँ और मौसियाँ, क्योंकि उन्हें मैं नानी के यहाँ कि लड़कियों में एक लगती ही नहीं थी और दादा जी के घर में सब यही कह रहे हैं कि "हमें तो पता था कि जब भी वक़्त आएगा ये सब संभाल लेगी"...
खैर!!! ये हो गई घरवालों की बात, पर यदि अब मैं सच कहूं तो मैं खुद समझ नहीं पा रही कि ये सब मैंने कैसे संभाल लिया??? क्योंकि एक टाईम पे हमेशा एक ही मोर्चा संभाला है... पर इस बार तो बाबा रे बाबा... सब कुछ...
और हाँ एक सबसे जरूरी बात... वो सारी महिलायें जो "हाऊसवाईव्स" हैं, मेरा नतमस्तक प्रणाम स्वीकार करें...
मतलब, आप लोग कैसे सब कुछ इतने अच्छे से संभाल लेतीं हैं???
सच कितना मुश्किल होता है न... घर के फईनेंसस, खाना-पीना, मेन्यू, सबकी पसंद-नापसंद याद रखना, व्यवहार-रिश्तेदार, बच्चे... ये तो हो गए कुछ बड़े-बड़े काम... पर छोटे-छोटे काम जो दिखाई नहीं देते, जैसे किस कमरे में कौन-सी चादर, कैसे परदे... और भी पता नहीं क्या-क्या... सच में... तीन महीने में रोज़ मैं सारी हाऊसवाईव्स को सलाम करती थी... और मेरी माँ महान... जिनके कारण शायद मुझसे ये सब हैंडल हो गया... वर्ना पता नहीं मैं क्या करती और माँ की जमी-जमाई गृहस्थी का क्या होता???
पर सच कहूं... इन सारे उलझनों के बीच बस एक ही चीज़ अच्छी लगती थी, और वो थी माँ के चेहरे कि मुस्कराहट... जिसमें ज़रा-सी चिंता, ज़रा-सी मस्ती, ज़रा-सा भरोसा, ज़रा-सा चैन, ज़रा-सा आराम और ज़रा-सा गर्व होता है... और शायद में माँ के मन को ज़रा-सा समझ भी पाई हूँ... क्योंकि हमेशा मैं और मेरी बहन PAPA's Girls रहे... और लगता भी यही था कि माँ भाई को ज्यादा प्यार करती हैं, उसकी और माँ कि ज्यादा बनती है... पर नहीं... उनका असली ध्यान तो बेटियों के ऊपर रहता है... क्योंकि हम उनका गर्व होते हैं... ये बात माँ ने पहली बार मुझसे कही... कि माँ लड़कियों पे ज्यादा भरोसा कर सकती हैं और उन्ही पे ज्यादा डिपेंड भी हो सकती हैं... :)
और सच ये बात जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ... जो हम सोचते थे उससे बिल्कुल उल्टा... और बहुतhi सारी ख़ुशी...
आज के लिए इतना ही... बाकी ढेर सारी बातें धीरे-धीरे अलग-अलग पोस्ट्स में...
और वापस तो 3 दिन पहले ही आ जाती... मगर ये गूगल रूपी काली बिल्ली ने रास्ता काट दिया तो बस... हुआ ये कि इतने दिन बाद जब ब्लॉग लिखने पहुँची तो उससे हिंदी फ़ॉन्ट ही गायब... मुझे लगा कोई सेट्टिंग बदल गई... सब छाना-खंगाला, पर कुछ समझ नहीं आया... "help zone" भी ट्राई किया, मगर कोई फायदा नहीं... फ़िर मासूम अंकल को परेशान किया, तब उन्होंने बताया कि ये मेरे बस नहीं बल्कि सभी में यही दिक्कत आ रही है... और गूगल हिंदी टाईपिंग का रास्ता सुझाया... thank you so much uncle ... :)
हाँ अब अनुभवों की बात... और इन तीन महीनों की बात...
सीखना पड़ता ही, आज नहीं तो कल... बस कुछ हालत अलग होते... सबसे ज्यादा मेरी प्यारी-सी माँ खुश हैं... उनका कहना है कि "चलो अच्छा हुआ, भले ही मेरा हाँथ-पैर टूटा पर तुम इतना मैनेज करना सीख गई"... पर उन्हें या परिवार में बड़ी माँ, बुआ या चाचा लोगों को यकीन नहीं होता कि मैं ये सब मैनेज कर रही हूँ, क्योंकि उनकी नज़र में मैं आज भी वही छोटी सी पूजा हूँ... पर अब अचंभित और खुश... सबसे ज़्यादा माँ और मौसियाँ, क्योंकि उन्हें मैं नानी के यहाँ कि लड़कियों में एक लगती ही नहीं थी और दादा जी के घर में सब यही कह रहे हैं कि "हमें तो पता था कि जब भी वक़्त आएगा ये सब संभाल लेगी"...
खैर!!! ये हो गई घरवालों की बात, पर यदि अब मैं सच कहूं तो मैं खुद समझ नहीं पा रही कि ये सब मैंने कैसे संभाल लिया??? क्योंकि एक टाईम पे हमेशा एक ही मोर्चा संभाला है... पर इस बार तो बाबा रे बाबा... सब कुछ...
और हाँ एक सबसे जरूरी बात... वो सारी महिलायें जो "हाऊसवाईव्स" हैं, मेरा नतमस्तक प्रणाम स्वीकार करें...
मतलब, आप लोग कैसे सब कुछ इतने अच्छे से संभाल लेतीं हैं???
सच कितना मुश्किल होता है न... घर के फईनेंसस, खाना-पीना, मेन्यू, सबकी पसंद-नापसंद याद रखना, व्यवहार-रिश्तेदार, बच्चे... ये तो हो गए कुछ बड़े-बड़े काम... पर छोटे-छोटे काम जो दिखाई नहीं देते, जैसे किस कमरे में कौन-सी चादर, कैसे परदे... और भी पता नहीं क्या-क्या... सच में... तीन महीने में रोज़ मैं सारी हाऊसवाईव्स को सलाम करती थी... और मेरी माँ महान... जिनके कारण शायद मुझसे ये सब हैंडल हो गया... वर्ना पता नहीं मैं क्या करती और माँ की जमी-जमाई गृहस्थी का क्या होता???
पर सच कहूं... इन सारे उलझनों के बीच बस एक ही चीज़ अच्छी लगती थी, और वो थी माँ के चेहरे कि मुस्कराहट... जिसमें ज़रा-सी चिंता, ज़रा-सी मस्ती, ज़रा-सा भरोसा, ज़रा-सा चैन, ज़रा-सा आराम और ज़रा-सा गर्व होता है... और शायद में माँ के मन को ज़रा-सा समझ भी पाई हूँ... क्योंकि हमेशा मैं और मेरी बहन PAPA's Girls रहे... और लगता भी यही था कि माँ भाई को ज्यादा प्यार करती हैं, उसकी और माँ कि ज्यादा बनती है... पर नहीं... उनका असली ध्यान तो बेटियों के ऊपर रहता है... क्योंकि हम उनका गर्व होते हैं... ये बात माँ ने पहली बार मुझसे कही... कि माँ लड़कियों पे ज्यादा भरोसा कर सकती हैं और उन्ही पे ज्यादा डिपेंड भी हो सकती हैं... :)
और सच ये बात जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ... जो हम सोचते थे उससे बिल्कुल उल्टा... और बहुतhi सारी ख़ुशी...
आज के लिए इतना ही... बाकी ढेर सारी बातें धीरे-धीरे अलग-अलग पोस्ट्स में...
Labels:
कुछ ख़ास,
घर,
धन्यवाद,
मेरी उल्टी बुद्धि,
यादें,
यूँही,
लोग,
समझ से परे
ये एक साल...
21 फरवरी 2010...
1st post... :- DESIRES FROM THE ONE YOU LOVE...
जब मैनें इस ब्लोगिंग की दुनिया में कदम रखा...
न रास्ते पता, न मंज़िल...
न ही यहाँ के तौर-तरीके...
न लोगों से पहचान...
न ही कोई बैकग्राउंड...
न लिखना आता था, न ही कोई बतानेवाला की कैसे लिखा जाता है...
बस एक पेन, कुछ सपने और
लिखने का शौक लेकर आई थी...
एक डर था की कैसे लोग होंगें...
अपनायेंगें या नहीं???
मुझे इस दुनिया में अपनी जगह बनाने देंगें या नहीं???
पर दोस्त थे...
एक आदित्य और एक शैलेश...
वो इस दुनिया में कदम रख चुके थे...
आदित्य जी ने तो मुकाम भी बना लिया था...
यहाँ आकर लिखने की सलाह भी कुछ दोस्तों ने ही दी थी...
सो मैं अपना बोरिया-बिस्तर उठा चली आई...
जब यहाँ पहुँची...
जितना सोचा था उससे कहीं बड़ी थी ये दुनिया...
सोच थी की लिखनेवाले तो सभी अच्छे ही होते हैं...
पर वो भ्रम भी टूटा...
पर...
उसकी एवज मैं बहुत से अच्छे और अच्छे लोग मिले...
जिनसे साथ माँगा...
उन्होंने पूरा साथ दिया
जिनसे समय माँगा...
दिन-रात दे दिए...
कुछ अन्जाने से लोग मेरे अपने हो गए...
एक अलग ही रिश्ता कायम हो गया इस दुनिया से...
यहाँ एक छोटा सा आशियाना मेरा भी हो गया...
आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया, जिन्होंने मुझे ये सफ़र यहाँ तक तय करने में हमेशा ही सहयोग प्रदान किया...
इस आशीर्वाद की हमेशा जरूरत रहेगी...
और बहुत ज्यादा रहेगी... :)

जानती हूँ मुझे ये पोस्ट 21 तारिख को ही लिखनी चाहिए थी... पर सीढियों से गिरजाने के कारण असमर्थ थी...
इसीलिए... आज कुछ ठीक लगा... हिम्मत जुटा कर लिख दी...
1st post... :- DESIRES FROM THE ONE YOU LOVE...
जब मैनें इस ब्लोगिंग की दुनिया में कदम रखा...
न रास्ते पता, न मंज़िल...
न ही यहाँ के तौर-तरीके...
न लोगों से पहचान...
न ही कोई बैकग्राउंड...
न लिखना आता था, न ही कोई बतानेवाला की कैसे लिखा जाता है...
बस एक पेन, कुछ सपने और
लिखने का शौक लेकर आई थी...
एक डर था की कैसे लोग होंगें...
अपनायेंगें या नहीं???
मुझे इस दुनिया में अपनी जगह बनाने देंगें या नहीं???
पर दोस्त थे...
एक आदित्य और एक शैलेश...
वो इस दुनिया में कदम रख चुके थे...
आदित्य जी ने तो मुकाम भी बना लिया था...
यहाँ आकर लिखने की सलाह भी कुछ दोस्तों ने ही दी थी...
सो मैं अपना बोरिया-बिस्तर उठा चली आई...
जब यहाँ पहुँची...
जितना सोचा था उससे कहीं बड़ी थी ये दुनिया...
सोच थी की लिखनेवाले तो सभी अच्छे ही होते हैं...
पर वो भ्रम भी टूटा...
पर...
उसकी एवज मैं बहुत से अच्छे और अच्छे लोग मिले...
जिनसे साथ माँगा...
उन्होंने पूरा साथ दिया
जिनसे समय माँगा...
दिन-रात दे दिए...
कुछ अन्जाने से लोग मेरे अपने हो गए...
एक अलग ही रिश्ता कायम हो गया इस दुनिया से...
यहाँ एक छोटा सा आशियाना मेरा भी हो गया...
आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया, जिन्होंने मुझे ये सफ़र यहाँ तक तय करने में हमेशा ही सहयोग प्रदान किया...
इस आशीर्वाद की हमेशा जरूरत रहेगी...
और बहुत ज्यादा रहेगी... :)


जानती हूँ मुझे ये पोस्ट 21 तारिख को ही लिखनी चाहिए थी... पर सीढियों से गिरजाने के कारण असमर्थ थी...
इसीलिए... आज कुछ ठीक लगा... हिम्मत जुटा कर लिख दी...
लम्हें...
आ गया नया साल...
लीजिये जी आ गया नया साल...
नई उम्मीदों
नए सपनों
नए आसमाँ
नए अरमान
नई पहचान के साथ...

और पुराना साल दे गया
हमें ढेर सारी यादें
ढेर सारी
देर सारी सीख...
कितना अजीब है न ये समय-चक्र...
आज फ़िर हम 1 तारीख पर हैं,
पहले महीने में
बस वर्ष बदला हुआ है...
फ़िर कुछ नई चाहतें
फ़िर कुछ ख्वाब पूरे करने की उम्मीद...
कुछ नए वादे खुद से...
कुछ नई आदतें...
अच्छी अपनाने की
ख़राब छोड़ने की...
मैंने तो सोच लिया है...
थोड़ा और punctuality अपनानी है
थोड़ा और serious होना है काम के लिए
थोड़ा और परिधि बढ़ानी है अपनी सोच की
थोड़ा और खुद को मजबूत करना है...
और एक बात ठानी थी...
इस साल के आते ही अपना उपनाम छोड़ दूंगीं...
सो छोड़ दिया...

आपने क्या सोचा करने को???
और क्या किया???
मेरी तरफ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं...
नई उम्मीदों
नए सपनों
नए आसमाँ
नए अरमान
नई पहचान के साथ...

और पुराना साल दे गया
हमें ढेर सारी यादें
ढेर सारी
देर सारी सीख...
कितना अजीब है न ये समय-चक्र...
आज फ़िर हम 1 तारीख पर हैं,
पहले महीने में
बस वर्ष बदला हुआ है...
फ़िर कुछ नई चाहतें
फ़िर कुछ ख्वाब पूरे करने की उम्मीद...
कुछ नए वादे खुद से...
कुछ नई आदतें...
अच्छी अपनाने की
ख़राब छोड़ने की...
मैंने तो सोच लिया है...
थोड़ा और punctuality अपनानी है
थोड़ा और serious होना है काम के लिए
थोड़ा और परिधि बढ़ानी है अपनी सोच की
थोड़ा और खुद को मजबूत करना है...
और एक बात ठानी थी...
इस साल के आते ही अपना उपनाम छोड़ दूंगीं...
सो छोड़ दिया...

आपने क्या सोचा करने को???
और क्या किया???
मेरी तरफ से आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं...
काश मुहब्बत कुछ आसाँ होती... तो...

काश मोहब्बत को पढ़ पाना
इतना आसाँ होता... तो...
एक-आध लाईब्रेरी हम भी बना लेते...
काश मोहब्बत को समझ पाना
इतना आसाँ होता... तो...
दो-चार गुरुओं को ख़ास हम भी बना लेते...

काश मोहब्बत को देख पाना
इतना आसाँ होता... तो...
टेलिस्कोप/माईक्रोस्कोप हम अपनी आँखों में लगवा लेते...
काश मोहब्बत को लिख पाना
इतना आसाँ होता... तो...
दो-चार महफ़िलें हम अकेले ही सजा लेते...
और माई चली गई...
सुबह ही तो ज़रा-सी तबियत बिगड़ी थी... सिर्फ सर ही घूमा, थोड़ी-दी उल्टी हुई... पर रात में तो खाना खाई थी... अचानक... रात को 11 बजे... वो हम सब को छोड़ कर चली गई...
न जाने और क्या-क्या अचानक होगा???
पूरी तरह plan बनाया था कि, इस बार उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी... और मन भी बहुत था उनसे मिलने का...
वैसे तो वो मेरे दोस्तों की "दादी" थी, पर वो दोनों भी उन्हें माई बोलते थे इसीलिए वो सबकी माई बन गई थीं...
परसों रात से न तो किसी काम में मन लग रहा है और न ही उन दोस्तों से बात करने की हिम्मत हो रही है...
वो कुछ दिन और रुक जाती तो मिल तो लेती मैं...
सब न कहा कि कुछ लिख, पर मन ही नहीं हुआ... सोचा मन हटाने के लिए पुरानी कविताओं को पूरा करने की कोशिश करूँ, पर जो शब्द लिखे थे वो भी समझ नहीं आ रहे थे, आगे लिखती कैसे???
सच कहूँ तो यहाँ भी यूँही लिखे जा रही हूँ जो भी मन में आ रहा है... जाने कौन-सा शब्द किससे मिल रहा है, या नहीं... कोई चिंता नहीं... कुछ नहीं...
परसों रात ही लग रहा था भाग कर जाऊं और उनसे ऐसे ही लिपट कर रो लूं... पर शायद बदकिस्मती ये ही कहलाती है... और मन, वो तो इतना पापी है कि क्या कहूँ???
पहली बार अपनी intuitions पर इतना गुस्सा आ रहा है, चिढ हो रही है... सुबह जब उनकी तबियत कि खबर मिली थी तभे मन में आया था कि बोल दूं कि, "देखे रहना"... फ़िर लगा नहीं यार, ऐसा नहीं सोचते... अपने-आप को समझाया, और रात में...
रिकोर्ड है कि जब भी मेरी और माँ कि कमर दर्द होती है, वो एक अजीब-सा दर्द होता है जो न तो दवाई से ठीक होता है और न ही मालिश से, तब कुछ-न-कुछ अभशगुन होता है...
अभी भी ऐसा ही हो रहा था...
मेरा चचेरा भाई भी नाडियाट में admit है, उसके दोनों kidney fail हो गई हैं, उसकी भी तबिओयत रोज़ खराव्ब होती है... इसीलिए doctors transplant करने की process आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं... बस उसी का डर लगता है रोज़... जब भी फ़ोन आता है, किसी का भी हो, बस भगवान से अर्जी लगाना पहले शुरू कर देते हैं कि सब ठीक रखना...
कहाँ हम उसे ताक कर बैठे थे और कहाँ ये खबर...
हे भगवान!!! वाकई तुम्हारी लीला समझ से बाहर है...
We will miss you MAAI...
न जाने और क्या-क्या अचानक होगा???
पूरी तरह plan बनाया था कि, इस बार उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी... और मन भी बहुत था उनसे मिलने का...
वैसे तो वो मेरे दोस्तों की "दादी" थी, पर वो दोनों भी उन्हें माई बोलते थे इसीलिए वो सबकी माई बन गई थीं...
परसों रात से न तो किसी काम में मन लग रहा है और न ही उन दोस्तों से बात करने की हिम्मत हो रही है...
वो कुछ दिन और रुक जाती तो मिल तो लेती मैं...
सब न कहा कि कुछ लिख, पर मन ही नहीं हुआ... सोचा मन हटाने के लिए पुरानी कविताओं को पूरा करने की कोशिश करूँ, पर जो शब्द लिखे थे वो भी समझ नहीं आ रहे थे, आगे लिखती कैसे???
सच कहूँ तो यहाँ भी यूँही लिखे जा रही हूँ जो भी मन में आ रहा है... जाने कौन-सा शब्द किससे मिल रहा है, या नहीं... कोई चिंता नहीं... कुछ नहीं...
परसों रात ही लग रहा था भाग कर जाऊं और उनसे ऐसे ही लिपट कर रो लूं... पर शायद बदकिस्मती ये ही कहलाती है... और मन, वो तो इतना पापी है कि क्या कहूँ???
पहली बार अपनी intuitions पर इतना गुस्सा आ रहा है, चिढ हो रही है... सुबह जब उनकी तबियत कि खबर मिली थी तभे मन में आया था कि बोल दूं कि, "देखे रहना"... फ़िर लगा नहीं यार, ऐसा नहीं सोचते... अपने-आप को समझाया, और रात में...
रिकोर्ड है कि जब भी मेरी और माँ कि कमर दर्द होती है, वो एक अजीब-सा दर्द होता है जो न तो दवाई से ठीक होता है और न ही मालिश से, तब कुछ-न-कुछ अभशगुन होता है...
अभी भी ऐसा ही हो रहा था...
मेरा चचेरा भाई भी नाडियाट में admit है, उसके दोनों kidney fail हो गई हैं, उसकी भी तबिओयत रोज़ खराव्ब होती है... इसीलिए doctors transplant करने की process आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं... बस उसी का डर लगता है रोज़... जब भी फ़ोन आता है, किसी का भी हो, बस भगवान से अर्जी लगाना पहले शुरू कर देते हैं कि सब ठीक रखना...
कहाँ हम उसे ताक कर बैठे थे और कहाँ ये खबर...
हे भगवान!!! वाकई तुम्हारी लीला समझ से बाहर है...
We will miss you MAAI...
वो कलम...

काश ऐसी कलम ईज़ाद हुई होती
जो बस यूँही
चलती रहती बिना रुके
और मन की हर बात
लिख जाती
बिना चुप हुए बीच में...
जिसे सोचना न पड़ता
कि, किस बात को लिखना है किस तरह???
वो तो बस
चलती मदमस्त पवन की तरह
और उड़ा ले जाती
इस गम और ख़ामोशी के बादलों को कहीं दूर...
या बहती उस चंचल नदिया की तरह
जो सारे कलरव खुद में समेटती
अग्रसर होती है अपनी मंज़िल की ओर...
और एक दिन,
शांत हो जाती है मिलकर
उस अथाह समुद्र से
जो न जाने
कितनों का दुःख,
कितना शोर समेटे हुए है
अपने-आप में...
परन्तु तब भी शांत है...
पर कभी-कभी वो भी उछाल मारता है
लांघ कर अपनी सीमा
जताता है शायद,
कि,
अब उसका भण्डार भर गया है
या
उसकी कलम भी कहीं खो गयी है...
बनारस...
ये है एक पावन धरती
यहाँ है गंगा, भोलेनाथ
और न जाने कितनी संस्कृतियों का मेल...
मत करो ये शोरगुल, ये धमाके
और ये लाश बिछाने का खेल...
कुछ और नहीं कर सकते
तो इतना ही कर दो
अपने नाम के आगे से ये "INDIAN" ही हटा दो...
यहाँ है गंगा, भोलेनाथ
और न जाने कितनी संस्कृतियों का मेल...
मत करो ये शोरगुल, ये धमाके
और ये लाश बिछाने का खेल...
कुछ और नहीं कर सकते
तो इतना ही कर दो
अपने नाम के आगे से ये "INDIAN" ही हटा दो...
माँ का बर्थडे था...
4 दिसंबर को माँ का बर्थडे था, और इसीलिए तीन दिन तक मैं नदारद थी...
हुआ यूं, कि बर्थडे में माँ को गिफ्ट देने पर विचार चल रहा था कि क्या दें और क्या नहीं... क्योंकि माँ जो चाहती हैं उन्हें मिल जाता जाता है, तो कुछ ऐसा नहीं था जो वो चाहती हों और उनके पास न हो...
तो मैनें उन्ही से पूछ लिया कि उन्हें क्या गिफ्ट चाहिए... पहले तो उन्होंने मना कर दिया कि "कुछ नहीं चाहिए", पर बहुत जिद करने पर बोलीं कि "फ़िर जो चाहिए वो तुम दे नहीं पाओगी।"
मैं भी सोच में पड़ गई कि ऐसा वो क्या माँगने वालीं हैं???
पहले तो लगा कि फॉर वही शादी कि बात होगी, फ़िर लगा कि चलो जो होगा वो देखा जायेगा... मैंने भी कह दिया कि "ठीक है, आप मांगिये आपको जो भी माँगना है, मेरे बस का हुआ तो पक्का दूंगी।"
उन्होंने कहा कि "तुम्हारे बस का ही है, बशर्ते तुम दोगी"
मैंने कहा... "ठीक है, आप मांगिये"
फ़िर तो जो माँ न कहा वो bouncer ही था...
उन्होंने कहा कि "मुझे तुम्हारा time चाहिए, तुम तीन दिन हम सबके साथ रहोगी। और उन दिनों में कोई काम नहीं और न ही blogging... "
फ़िर मैं करती भी क्या, चुपचाप उनकी आज्ञा का पालन किया और अच्छी बिटिया कि तरह पहुँच गई उनके पास... और तीन दिन न e-mails, न blogging, और ही ऑफिस का काम, हाँ बस mobile से दिन में एक बार फेसबुक स्टेटस अपडेट कर दिया...
3 को माँ-पापा के पास पहुंची, मस्त उन्हें खाना-वाना खिलाया.... उस दिन माँ को रसोई से छुट्टी दे दी थी... वैसे भी काटने-बीनने का काम नौकर कर देते हैं पर माँ को उस दिन खाना भी नहीं बनाने दिया... 4 को भे यही था, हाँ खाने में कुछ खास लोगों को बुलाया था, माँ कि एक सहेली भी थी, जो उनके साथ स्कूल में थीं...
5 को सोन-घड़ियाल सेंचुरी गए थे, मगर शाम हो जाने के कारण सिर्फ प्रजनन-केंद्र देखा... उसके बारे में अगली पोस्ट में बताउंगी...
मगर हाँ, कई दिनों बाद सबके साथ इतना time spend करके बड़ा अच्छा लगा...

ये रहा माँ के बर्थडे का केक...
आप भी enjoy कीजिये...
हुआ यूं, कि बर्थडे में माँ को गिफ्ट देने पर विचार चल रहा था कि क्या दें और क्या नहीं... क्योंकि माँ जो चाहती हैं उन्हें मिल जाता जाता है, तो कुछ ऐसा नहीं था जो वो चाहती हों और उनके पास न हो...
तो मैनें उन्ही से पूछ लिया कि उन्हें क्या गिफ्ट चाहिए... पहले तो उन्होंने मना कर दिया कि "कुछ नहीं चाहिए", पर बहुत जिद करने पर बोलीं कि "फ़िर जो चाहिए वो तुम दे नहीं पाओगी।"
मैं भी सोच में पड़ गई कि ऐसा वो क्या माँगने वालीं हैं???
पहले तो लगा कि फॉर वही शादी कि बात होगी, फ़िर लगा कि चलो जो होगा वो देखा जायेगा... मैंने भी कह दिया कि "ठीक है, आप मांगिये आपको जो भी माँगना है, मेरे बस का हुआ तो पक्का दूंगी।"
उन्होंने कहा कि "तुम्हारे बस का ही है, बशर्ते तुम दोगी"
मैंने कहा... "ठीक है, आप मांगिये"
फ़िर तो जो माँ न कहा वो bouncer ही था...
उन्होंने कहा कि "मुझे तुम्हारा time चाहिए, तुम तीन दिन हम सबके साथ रहोगी। और उन दिनों में कोई काम नहीं और न ही blogging... "
फ़िर मैं करती भी क्या, चुपचाप उनकी आज्ञा का पालन किया और अच्छी बिटिया कि तरह पहुँच गई उनके पास... और तीन दिन न e-mails, न blogging, और ही ऑफिस का काम, हाँ बस mobile से दिन में एक बार फेसबुक स्टेटस अपडेट कर दिया...
3 को माँ-पापा के पास पहुंची, मस्त उन्हें खाना-वाना खिलाया.... उस दिन माँ को रसोई से छुट्टी दे दी थी... वैसे भी काटने-बीनने का काम नौकर कर देते हैं पर माँ को उस दिन खाना भी नहीं बनाने दिया... 4 को भे यही था, हाँ खाने में कुछ खास लोगों को बुलाया था, माँ कि एक सहेली भी थी, जो उनके साथ स्कूल में थीं...
5 को सोन-घड़ियाल सेंचुरी गए थे, मगर शाम हो जाने के कारण सिर्फ प्रजनन-केंद्र देखा... उसके बारे में अगली पोस्ट में बताउंगी...
मगर हाँ, कई दिनों बाद सबके साथ इतना time spend करके बड़ा अच्छा लगा...


ये रहा माँ के बर्थडे का केक...
आप भी enjoy कीजिये...
चलो थोड़े स्वार्थी हो जांए...
आज की इस दुनिया और इस life style में इतने busy हो गए हैं की हमारे पास अपने लिए ही वक़्त नहीं रह गया है... जिसे देखो बस भाग रहा है या एक fixed life जी रहा है, सब कुछ time-table के हिसाब से... जिंदगी न होकर train हो गयी है, चढ़ा दिया पटरी पर, और फुरसत... बस चली जा रही है... हम सबका ख्याल रखते सिवाय खुद के... पर ऐसा क्यूँ? क्या वाकई अब हमें २४ घंटे भी कम पड़ने लगे हैं या जो भी हम करते है वो बस इस rat-race में बने रहने के लिए...
कितना मुश्किल है न आज की इस दुनिया में सफल होना... हर competition में अपने आप को prove करना , पहले school, फिर college, फिर job और फिर घर... सबसे पहले एक position बनाने की चिंता और फिर उसे maintain करने की... वाकई कितनी कठिन हो गयी है हमारी life... या कहे तो हमारी so called life...
और फिर जो भी वक़्त बचा इस rat-race से वो हम दे देते है अपनों को, वो जो हमारे करीब हैं... आख़िर उनका भी तो कुछ हक़ है हमारी ज़िन्दगी में... उनकी ख़ुशी, उनका दुःख... ये सब भी हमारी ही जिम्मेदारियों का ही एक हिस्सा है... और फिर ये keyboard, जहाँ हम web-pages में जहा हम कभी कोई रिश्ता निभा रहे होते है तो कभी ख़ुशी और शांति तलाश रहे होते हैं... पर इन सबके बीच हम कहाँ हैं? एक ऐसा पल जिसे हम पूरी तरह अपना कह सकें... क्या कभी यूँ ही बैठे-बैठे आप खुद miss नहीं करते, क्या कभी बस यूँ ही बिना बात के मुस्कुराना या यूँ ही खुश जाना या कोई अनजानी-सी या कोई भूली-बिसरी धुन गुनगुनाने का मन नहीं होता? होता है न... पर हम नहीं करते... क्यों??? क्योंकि उससे हम अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं... हमारा time-waste हो सकता है...
क्या याद है की last-time आप कब खुश हुए थे, या क्या ऐसा किया था जिससे आपको ख़ुशी मिली हो? last-time कब किसी दोस्त को बिना काम के, बस यूँ ही हाल-चाल जानने के लिए phone किया था...
या कब e-mail forward करने की वजाय बस यूँ ही "hii" "how are you" . type करके भेजा था... कर सकते थे... पर नहीं किया... क्यों... time-waste... क्या वाकई अब हमारी खुशियाँ हमारे लिए सिर्फ time-wastage बन कर रह गयी है... यही रह गयी हमारी हमारी खुशियूं की पहचान...
नहीं न...
तो चलो एक शुरुआत करते हैं... थोड़े से selfish हो जाते हैं... हर दिन... यानी २४ घंटो से कुछ पल चुराते हैं... जो सिर्फ हमारे होंगे...
तो चलो ...
थोड़े स्वार्थी हो जाते हैं
कुछ पल चुराते हैं....
बहुत मुस्कुरा लिए औरों के लिए ,
चलो एक बार अपने लिए मुस्कुराते हैं...
बहुत हुआ दूसरों की धुन गुनगुनाना,
चलो अब अपनी एक धुन बनाते है...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
थक गए ये हाथ कागज़ में sketch बनाते-बनाते,
चलो अब आसमाँ में उंगलिया चलाते हैं...
बहुत हुआ एक ही ढर्रे में चलना,
चलो अब कुछ नया आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
जाने-पहचाने रास्तों पे चलना, बहुत हुआ,
चलो कुछ अनजान रातों की ओर कदम बढ़ाते हैं...
वही पुरानी recipes, वही पुराना स्वाद,
चलो कोई नया ज़ायका आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
अपनों से अपनापन निभाते ज़माने हो गए,
चलो किसी अजनबी को अपना बनाते हैं...
थक कर चूर हो गए यूँ ही भागते-भागते...
चलो कुछ पल आराम के बिताते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
P.S. :- ये मेरी एक पुरानी पोस्ट है... न जाने क्यूं आज इसे पढ़कर फ़िर से आप लोगों के साथ बांटने का मन हुआ... सो पोस्ट कर दी...
कितना मुश्किल है न आज की इस दुनिया में सफल होना... हर competition में अपने आप को prove करना , पहले school, फिर college, फिर job और फिर घर... सबसे पहले एक position बनाने की चिंता और फिर उसे maintain करने की... वाकई कितनी कठिन हो गयी है हमारी life... या कहे तो हमारी so called life...
और फिर जो भी वक़्त बचा इस rat-race से वो हम दे देते है अपनों को, वो जो हमारे करीब हैं... आख़िर उनका भी तो कुछ हक़ है हमारी ज़िन्दगी में... उनकी ख़ुशी, उनका दुःख... ये सब भी हमारी ही जिम्मेदारियों का ही एक हिस्सा है... और फिर ये keyboard, जहाँ हम web-pages में जहा हम कभी कोई रिश्ता निभा रहे होते है तो कभी ख़ुशी और शांति तलाश रहे होते हैं... पर इन सबके बीच हम कहाँ हैं? एक ऐसा पल जिसे हम पूरी तरह अपना कह सकें... क्या कभी यूँ ही बैठे-बैठे आप खुद miss नहीं करते, क्या कभी बस यूँ ही बिना बात के मुस्कुराना या यूँ ही खुश जाना या कोई अनजानी-सी या कोई भूली-बिसरी धुन गुनगुनाने का मन नहीं होता? होता है न... पर हम नहीं करते... क्यों??? क्योंकि उससे हम अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं... हमारा time-waste हो सकता है...
क्या याद है की last-time आप कब खुश हुए थे, या क्या ऐसा किया था जिससे आपको ख़ुशी मिली हो? last-time कब किसी दोस्त को बिना काम के, बस यूँ ही हाल-चाल जानने के लिए phone किया था...
या कब e-mail forward करने की वजाय बस यूँ ही "hii" "how are you" . type करके भेजा था... कर सकते थे... पर नहीं किया... क्यों... time-waste... क्या वाकई अब हमारी खुशियाँ हमारे लिए सिर्फ time-wastage बन कर रह गयी है... यही रह गयी हमारी हमारी खुशियूं की पहचान...
नहीं न...
तो चलो एक शुरुआत करते हैं... थोड़े से selfish हो जाते हैं... हर दिन... यानी २४ घंटो से कुछ पल चुराते हैं... जो सिर्फ हमारे होंगे...
तो चलो ...
थोड़े स्वार्थी हो जाते हैं
कुछ पल चुराते हैं....
बहुत मुस्कुरा लिए औरों के लिए ,
चलो एक बार अपने लिए मुस्कुराते हैं...
बहुत हुआ दूसरों की धुन गुनगुनाना,
चलो अब अपनी एक धुन बनाते है...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
थक गए ये हाथ कागज़ में sketch बनाते-बनाते,
चलो अब आसमाँ में उंगलिया चलाते हैं...
बहुत हुआ एक ही ढर्रे में चलना,
चलो अब कुछ नया आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
जाने-पहचाने रास्तों पे चलना, बहुत हुआ,
चलो कुछ अनजान रातों की ओर कदम बढ़ाते हैं...
वही पुरानी recipes, वही पुराना स्वाद,
चलो कोई नया ज़ायका आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
अपनों से अपनापन निभाते ज़माने हो गए,
चलो किसी अजनबी को अपना बनाते हैं...
थक कर चूर हो गए यूँ ही भागते-भागते...
चलो कुछ पल आराम के बिताते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
P.S. :- ये मेरी एक पुरानी पोस्ट है... न जाने क्यूं आज इसे पढ़कर फ़िर से आप लोगों के साथ बांटने का मन हुआ... सो पोस्ट कर दी...
आज छोटी दिवाली है...
देव-उठनी ग्यारस कहिये
या फ़िर कहिये तुलसी विवाह...
हमारे लिए तो ये छोटी दिवाली है...
आँगन धुलवाया है
आखिर वहां कुछ रंगों को सजाना जो है
दिए भी निकल आए धूप में
आख़िर उन्हें शाम को जगमगाना जो है...
सिंघाड़े, शकरकंद उबल गए
बेर, गन्ना, चने की भाजी, गेंहू की बाल...
लगभग हो गया सारा इंतजाम
शाम को भगवान को मनाना जो है...
दिवाली पर अपने घर पर थी
अम्मा-बाउजी, माँ-पापा
चाचा-चाची, भैया-भाभी
और सारे भाई-बहन...
और-तो-और, सारे मोहल्ले की रौनक...
पर आज,
कुछ नहीं,
कोई नहीं,
सिर्फ वही रंग, दिए और यादें...
शायद इसीलिए आज हमारी छोटी दिवाली है...
आप सभी को दिवाली एवं ईद-उल-जुहा की हार्दिक शुभकामनाएं...
या फ़िर कहिये तुलसी विवाह...
हमारे लिए तो ये छोटी दिवाली है...
आँगन धुलवाया है
आखिर वहां कुछ रंगों को सजाना जो है
दिए भी निकल आए धूप में
आख़िर उन्हें शाम को जगमगाना जो है...
सिंघाड़े, शकरकंद उबल गए
बेर, गन्ना, चने की भाजी, गेंहू की बाल...

लगभग हो गया सारा इंतजाम
शाम को भगवान को मनाना जो है...
दिवाली पर अपने घर पर थी

अम्मा-बाउजी, माँ-पापा
चाचा-चाची, भैया-भाभी
और सारे भाई-बहन...
और-तो-और, सारे मोहल्ले की रौनक...
पर आज,
कुछ नहीं,
कोई नहीं,
सिर्फ वही रंग, दिए और यादें...
शायद इसीलिए आज हमारी छोटी दिवाली है...
आप सभी को दिवाली एवं ईद-उल-जुहा की हार्दिक शुभकामनाएं...
आज फ़िर तुम्हें जाना है...
आज फ़िर से तुम्हें जाना है...
और मुझे याद आ रहा एक गाना है...
"मुझसे जुदा होकर तुम्हें दूर जाना है... पल भर की जुदाई, फ़िर लौट आना है.........."
अरे अरे!!!
ये क्या कर रही हूँ मैं...???
जो कुछ भी सोचा था,
उससे तो बिलकुल ही उल्टा कर रही हूँ मैं...
सोचा था...
न तो गाना गाऊँगी...
न तुम्हें रुकने को मानाउँगी...
और न ही किन्ही अदाओं से तुम्हें रिझाउँगी...
all-in-all, किसी फ़िल्मी अदाकारा जैसा कोई किरदार नहीं निभाउँगी...
पर न जाने क्यूँ...
किरदार निभाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रिझाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रोक लूँ कुछ भी कर के... बस...
गाना भी गाने का मन हो रहा है...
"आज जाने की जिद न करो............
या...
"न जाओ सैंयाँ... छुड़ा के बैंयां, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी...........
शायद ये problem हम सभी भारतींयों के साथ है...
जो बड़े ही ऐसी फ़िल्में और किरदार देखकर होते हैं...
जब हीरो कहीं दूर जाता है... तब
उसकी माँ, बहन और प्रेयसी की आँखों में आँसू होते हैं...
कभी अकेले छिप-छिपकर, तो कभी सब साथ मिलकर रोते हैं...
और रातों को भूखे पेट, करवटें बदलते हुए सोते हैं...
उसके ख़त, फ़ोन के इंतज़ार में,
दिन-रात का चैन खोते हैं...
"वो खुश रहें जहाँ भी रहे!"
बस, यही लफ्ज़ हमारी जुबाँ पे होते हैं...
ख़ैर!!!
फ़िल्में, फ़िल्मों के किरदार, या फ़िर कोई गाना...
कोई अदा, या अपना कोई फ़साना...
ये सब किसी काम के नहीं।
क्योंकि आख़िरकार...
आज तुम्हें जाना है
और मुझे
तुम्हारी यादों के साथ तन्हा रह जाना है...
और मुझे याद आ रहा एक गाना है...
"मुझसे जुदा होकर तुम्हें दूर जाना है... पल भर की जुदाई, फ़िर लौट आना है.........."
अरे अरे!!!
ये क्या कर रही हूँ मैं...???
जो कुछ भी सोचा था,
उससे तो बिलकुल ही उल्टा कर रही हूँ मैं...
सोचा था...
न तो गाना गाऊँगी...
न तुम्हें रुकने को मानाउँगी...
और न ही किन्ही अदाओं से तुम्हें रिझाउँगी...
all-in-all, किसी फ़िल्मी अदाकारा जैसा कोई किरदार नहीं निभाउँगी...
पर न जाने क्यूँ...
किरदार निभाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रिझाने का मन हो रहा है...
तुम्हें रोक लूँ कुछ भी कर के... बस...
गाना भी गाने का मन हो रहा है...
"आज जाने की जिद न करो............
या...
"न जाओ सैंयाँ... छुड़ा के बैंयां, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी...........
शायद ये problem हम सभी भारतींयों के साथ है...
जो बड़े ही ऐसी फ़िल्में और किरदार देखकर होते हैं...
जब हीरो कहीं दूर जाता है... तब
उसकी माँ, बहन और प्रेयसी की आँखों में आँसू होते हैं...
कभी अकेले छिप-छिपकर, तो कभी सब साथ मिलकर रोते हैं...
और रातों को भूखे पेट, करवटें बदलते हुए सोते हैं...
उसके ख़त, फ़ोन के इंतज़ार में,
दिन-रात का चैन खोते हैं...
"वो खुश रहें जहाँ भी रहे!"
बस, यही लफ्ज़ हमारी जुबाँ पे होते हैं...
ख़ैर!!!
फ़िल्में, फ़िल्मों के किरदार, या फ़िर कोई गाना...
कोई अदा, या अपना कोई फ़साना...
ये सब किसी काम के नहीं।
क्योंकि आख़िरकार...
आज तुम्हें जाना है
और मुझे
तुम्हारी यादों के साथ तन्हा रह जाना है...
वो आज भी वैसा ही है...

जैसे वो पहले मुझे सताता था
आज भी सताता है...
जैसे वो पहले मुझे रुलाता था,
आज भी रुलाता है
न जाने क्यूं और कैसे वो इतनी मोहब्बत कर लेता है मुझसे?
"वो हमेह्सा मेरे साथ ही रहेगा"
पहले क्या, आज भी यही जताता है मुझे...
पहले अपनी बदमाशियों से,
तो आज अपनी मजबूर बातों से सताता है
पहले अपने गुस्से से
तो आज अपनी यादों से रुलाता है
"न जाने क्या होगा हम दोनों का एक-दूसरे के बिना?"
मैं पूछती हूँ उससे...
पर ऐसा दिन कभी नहीं आने देगा...
यही कहकर हर बार खुद को मेरा बताता है मुझे...
नमन... हिन्दी गुरुओं को...
आज एक अजीब-सा विचार मेरे मन में आया
और वही मुझे यहाँ तक खींच कर ले आया...
आज नमन करना है उन गुरुओं का...
जिन्होंने हिन्दी से मेरा परिचय करवाया...
सर्वप्रथम मेरे माता-पिता...
जिन्होंने हिंदी अक्षरों से अवगत कराया
और मेरी तोतली जुबां को बोलना सिखाया।
घर लाकर एक बड़ा-सा हिंदी अक्षर-माला का चार्ट
मुझे स्वरों-व्यंजनों को लिखना और बोलना सिखाया...
कभी सीधे, कभी बहाने से
मुझसे "अ आ इ ई" बुलवाया
तो कभी कहानियों के बीच ककहरा सुनाया
कभी देकर स्लेट-पेंसिल कहा
"इतना लिख कर दिखाओ"
तो कभी अपनी उँगलियों के बीच रख मेरी उंगलियाँ
अपनी गोद में बिठा कर लिखवाया...
कभी प्यार से तो कभी डांट कर... और बात न मानने पर,
मार के डर का प्रयोग आजमाया।
फ़िर अक्षरों को मिला-मिलाकर
शब्दों को पढ़ना सिखाया...
कुल-मिलाकर स्कूल जाते तक,
अपनी उम्रवालों के बीच मुझे हिंदी का उस्ताद बनाया।
अब बारी उन हिंदी के गुरुओं की
जिन्होंने हिन्दी विषय से परिचित कराया...
गद्य-पद्य का अर्थ और सारांश समझाया...
उसके पीछे छुपे अर्थ को कैसे समझना है
ये भी समझाया...
पर्यायवाची, समानार्थी, एकार्थी, रस, छंद, अलंकार
और भी न जाने क्या-क्या समाहित है इस व्याकरण में...
परन्तु,
उन्होंने इस कठिन हिस्से से भी निजाद दिलाया
इस भाषा की कठिनाइयों से कैसे निपटना है
ये भी बतलाया...
किसी कवी की कविताओं और
किसी लेखक के लेख की खासियत एवं
उसकी छिपी भावनाओं को कैसे पढ़ना है,
या उसे अपने वाक्यों में कैसे प्रस्तुत करना है ये भी पढ़ाया...
शायद उनका दिया ज्ञान ही है
जो यूं लिख पा रही हूँ मै...
अपनी हर भावना, हर चाहत और हर सोच को यूं
आप सभी के सामने रख पा रही हूँ मै...
इसलिए...
नमन उन सारे गुरुओं का जिन्होंने
मुझे इस प्यारी, अदभुत और
हमारी अपनी भाषा का ज्ञान दिया...
और मुझे उनकी शिष्या कहलाये जाने का सम्मान दिया...
और वही मुझे यहाँ तक खींच कर ले आया...
आज नमन करना है उन गुरुओं का...
जिन्होंने हिन्दी से मेरा परिचय करवाया...
सर्वप्रथम मेरे माता-पिता...
जिन्होंने हिंदी अक्षरों से अवगत कराया
और मेरी तोतली जुबां को बोलना सिखाया।
घर लाकर एक बड़ा-सा हिंदी अक्षर-माला का चार्ट
मुझे स्वरों-व्यंजनों को लिखना और बोलना सिखाया...
कभी सीधे, कभी बहाने से
मुझसे "अ आ इ ई" बुलवाया
तो कभी कहानियों के बीच ककहरा सुनाया
कभी देकर स्लेट-पेंसिल कहा
"इतना लिख कर दिखाओ"
तो कभी अपनी उँगलियों के बीच रख मेरी उंगलियाँ
अपनी गोद में बिठा कर लिखवाया...
कभी प्यार से तो कभी डांट कर... और बात न मानने पर,
मार के डर का प्रयोग आजमाया।
फ़िर अक्षरों को मिला-मिलाकर
शब्दों को पढ़ना सिखाया...
कुल-मिलाकर स्कूल जाते तक,
अपनी उम्रवालों के बीच मुझे हिंदी का उस्ताद बनाया।
अब बारी उन हिंदी के गुरुओं की
जिन्होंने हिन्दी विषय से परिचित कराया...
गद्य-पद्य का अर्थ और सारांश समझाया...
उसके पीछे छुपे अर्थ को कैसे समझना है
ये भी समझाया...
पर्यायवाची, समानार्थी, एकार्थी, रस, छंद, अलंकार
और भी न जाने क्या-क्या समाहित है इस व्याकरण में...
परन्तु,
उन्होंने इस कठिन हिस्से से भी निजाद दिलाया
इस भाषा की कठिनाइयों से कैसे निपटना है
ये भी बतलाया...
किसी कवी की कविताओं और
किसी लेखक के लेख की खासियत एवं
उसकी छिपी भावनाओं को कैसे पढ़ना है,
या उसे अपने वाक्यों में कैसे प्रस्तुत करना है ये भी पढ़ाया...
शायद उनका दिया ज्ञान ही है
जो यूं लिख पा रही हूँ मै...
अपनी हर भावना, हर चाहत और हर सोच को यूं
आप सभी के सामने रख पा रही हूँ मै...
इसलिए...
नमन उन सारे गुरुओं का जिन्होंने
मुझे इस प्यारी, अदभुत और
हमारी अपनी भाषा का ज्ञान दिया...
और मुझे उनकी शिष्या कहलाये जाने का सम्मान दिया...
कल के अन्जाने...
कल के अन्जाने
आज अपने-से लगने लगे...
कल तक नाम नहीं जानते थे एक-दूसरे का
आज देखो तो...
नज़रें भी पहचानने लगे
कल तक ये सुर्ख हवाएं,
अनजानी थीं मुझसे...
आज, ये मौसम भी अपना-सा लगता है...
कल तक,
डरता था दिल यहाँ आने से...
आज...
यहीं ठहर जाने को मन करता है...
आज अपने-से लगने लगे...
कल तक नाम नहीं जानते थे एक-दूसरे का
आज देखो तो...
नज़रें भी पहचानने लगे
कल तक ये सुर्ख हवाएं,
अनजानी थीं मुझसे...
आज, ये मौसम भी अपना-सा लगता है...
कल तक,
डरता था दिल यहाँ आने से...
आज...
यहीं ठहर जाने को मन करता है...
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