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जाने कहाँ गया वो दिन???


"आज कुछ special बना दो, Sunday है... "
... अभी तो परसों कढ़ाही पनीर बनी थी... 

"सुनो, मैं अपने दोस्तों से मिल कर आ रहा हूँ, वो आज Sunday है न..."
... हाँ, दोस्त कौन, सब Office वाले ही तो हैं... जैसे बाकी दिन तो उनका मुँह भी देखने नहीं मिलता...
"Please, आज shopping पर मत चलो, आज घर पर ही रहते हैं... Sunday बस तो मिलता है..."
... हाँ हमारे लिए तो छुट्टी अलग दिन मिलती है... आज market मत जाओ और बाकी के दिन time नहीं मिलता... 
ये जुबां और मन की बातों की बहस चल ही रहा था कि एक आवाज़ आती है...
"भाभी, आज शाम को काम पे नहीं आएँगे, Sunday हैं न, तो बाज़ार जाना है..."
"ठीक है... कल आ जाना..."
...ह्म्म्म, तुम्हारा ही ठीक है... जाओ, बाज़ार जाओ, Sunday है... 
इतना जी जलना कम था जो फ़ोन पर भी...
"तुम चाहो तो छुट्टी लेलो, पर पेट की छुट्टी तो नहीं होती न... कुछ तो बना लो"
"आज तो वी भी कुछ अच्छा बनाना चाहिए, Sunday है"
... हाँ, सही है, रोज़-रोज़ तो बेकार ही बनता है खाना की आज बना दो... तो क्यूँ न सिर्फ Sunday को ही अच्छा बनाऊं, बाकि दिनों में ऐसा ही खाना दे दिया करूँ? जैसा नाना जी कहते थे, "पनिहार दाल, गिल्कोचा भात, नोन-नोन भरी तरकारी, अस जिउनार रचिस महतारी..."
... अरे क्यूँ बना लूं??? मेरा भी Sunday है, मुझे भी तो छुट्टी मिलनी चाहिए... पर नहीं... I don't deserve it?
मुझे ये मानसिकता समझ नहीं आती... क्यूँ Sunday है तो अच्छा खाना बने, बाकि दिनों में न बने... या Sunday है, इसिलिये पकवान पकाओ, बाकि दिन क्या सिर्फ लौकी की उबली सब्जी खाएँ?
मैं उबली सब्जी खाने को गलत नहीं कह रही, बस मिसाल के टूर पर एक बात राखी है... जिन्हें उबली सब्जियां पसंद हैं वो बेशक खाएं... सबकी अपनी-अपनी पसंद है...
Mostly घरों की यही कहानी है... Thank God मेरा घर इसका सिर्फ 50% ड्रामा झेलता है... and all thanks to माननीय पतिदेव... जो ये तो समझते हैं की आज मेरे लिए भी Sunday है...
कैसे रह लेती हैं वो औरतें जो ये सब अपने अन्दर ही लडती हैं... और किससे लडती हैं, उन्हें भी नहीं पता... कई बार तो वो अपने ही अन्दर ये बातें बोलती हैं, और बाद में अपनी कुछ खास सहेलियों से, जिनसे वो अपनी feelings share करतीं हैं...
बहुत बार मैंने ये बातें अपने आस-पास सुनी हैं... और उस पर भी पति बेचारे हो जाते हैं जिन्हें Sunday की भी छुट्टी नहीं मिलती, जो ये कहते पाए जाते हैं कि "पूरे हफ्ते office और ले-देकर एक दिन मिलता है तो वो भी..."
और अभी-अभी, फिलहाल में ही मैंने एक video भी देखा था इसी मुद्दे पर...

आप ये मत सोचियेगा की मुझे पुरुष वर्ग की Sunday की छुट्टी लेने में कोई दिक्कत नहीं है... न न, हर किसी का हक़ है, कि कम-से-कम एक दिन तो मिलना चाहिए... पर क्या महिला वर्ग का उसमे कोई अधिकार नहीं???
खासतौर पर ऐसे घरों में, जहाँ एस तरह के हालात हों...
शायद आपके आस-पास ये न होता हो... और बहुत अच्छा है यदि न होता हो...

यदि मेरी मानें तो मुझे लगता है कि, औरतों को Sunday को और भी अच्छी तरह उपयोग करना चाहिए, अपने लिए... आप भी सुबह से salon जाएँ, spa जाएँ... और यदि आप कहें तो couple में भी जा सकते हैं... हमारा आजमाया हुआ नुस्खा है... shopping चाहें तो जाएँ या न जाएँ पर यूँ ही घूमने जाएँ... जानती हूँ आपको पढने में थोडा अजीब लगेगा, पर फ़ालतू भी घूमना चाहिए, try करके देखिये... बिना काम, बिना decide किये की कहाँ जाना है, यूं ही निकल जाइये, एक drive लेकर लौट आइये... कभी, चाहें तो, फ़ोन बंद करके घर पर ही रहें... साथ में खाना बनाएँ, मूवी देखें, बातें करें... सार ये है की बस एक-दुसरे को वक़्त दें... क्यूंकि पूरा हफ्त तो वैसे भी वक़्त नहीं मिलता...

आप भी बातें की आपका experience कैसा है Sunday को लेकर... Specially शादी के बाद...  

कल भी मंत्री, कल भी मंत्री...

कल मुख्यमंत्री और कल वनमंत्री...
अरे नहीं नहीं, ये किसी राजनीतिक दंगल की बात नहीं हो रही और न ही मैं किसी उलटफेर की खबर आप तक पहुंचा रही हूँ... ये तो बस हम "सरकारी बच्चों" का दर्द है जो आज बयाँ कर रही हूँ...
सरकारी बच्चों" से मेरा क्या तात्पर्य है ये तो आप सब समझ ही गए होंगें... वो सारे बेचारे बच्चे जिनके parents का job-title "Govt. Job" हो... सबसे पहले तो हमें लोगों की अजीब -सी नज़रें झेलनी पड़ती है... यदि हम किसी से बेढंग तरीके से बात करें तब तो लोगों को बड़ा अच्छा लगता है "की, हाँ तुम्हारे पापा/मम्मी तो govt job में हैं न!!!" और यदि हम अच्छे-से पेश आएं तब उन्हें आश्चर्य होता है "अरे! लगता ही नहीं की तुम्हारे पापा/मम्मी Govt job में हैं"... क्यों भाई! क्या सरकारी बच्चों की सींग निकली होती है??? या, उनके दो-चार एक्स्ट्रा दांत होते हैं???पता नहीं... हो सकता है आप में से कुछ लोग मेरी बातों से सहमत न हो, परन्तु ये मेरा personal experience है...
खैर!!! अभी मैं जिस बात को लेकर यहाँ आई थी, "कल मुख्यमंत्री और कल वनमंत्री"...
आजकल यहाँ, सीधी में, मंत्रियों का आना-जाना कुछ ज्यादा ही लगा हुआ है, चुनाव की तय्यारियाँ भी शुरू हो चुकी हैं... अभी कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री "शिवराज सिंह चौहान जी" आए, रातों-रात यहाँ से ट्रांस्फर्स, और पूरी मेडिकल टीम को सस्पेंड कर के चले गए, कल फिर आए, सभा की, रैली निकली और चले गए... अब कल वनमंत्री आ रहे हैं, बोनस वितरण करेंगें, कुछ भाषण देंगें, कहीं का plantation देखेंगें और चले जाएंगें...
परसों नीलाम है...
फिर उसके बाद P.S. को रिपोर्ट भेजनी है...
और साथ ही साथ वन-मेला की तय्यारी, और हाँ वहां पहुंचना भी ज़रूरी है...

और ये सब देखने के बाद मम्मी कहतीं हैं कि, मेरी शादी वो एक Govt Job वाले से ही करेंगीं...
तीन दिन से मैंने अपने पापा की शक्ल ठीक से नहीं देखी, और उनके काम का इतना ज्यादा pressure जानने और समझने के बाद सब चाहते हैं कि मैं किसी ऐसे ही इंसान से शादी कर लूं... जबकि सब जानते हैं कि मुझे ये सब बिल्कुल नहीं पसंद... ये भी कोई जॉब है जिसमें न संडे, न दिवाली, न होली... किसी की भी छुट्टी नहीं... :(
मैंने बचपन से अपने पापा को यूँही देखा है, कई बार तो उन्हें ये भी पता नहीं होता था कि उनके बच्चे कौन-सी क्लास में पहुँच गए हैं??? Means, this is height.
और लोगों को लगता है कि हम, सरकारी बच्चे, सबसे ज्यादा लकी होते हैं दुनिया में... :(
होते हैं, क्योंकि हमें ऐसे parents मिले हैं... मगर कई बार दुःख भी होता है, जब घुन के साथ गेंहू को भी पिसना पड़ता है... :(
But, let it be... who cares... :)

शिकायतों का रिवाज़…

बड़े हमें नहीं समझते, हम छोटों को नहीं समझते...
कोई हमें नहीं समझता, हम किसी और को नहीं समझते...
बड़ी आम बातें हैं, बड़ी आम शिकायतें हैं...
अखिय ये बातें, ये शिकायतें क्यों है???


 बड़े  हमें क्यों नहीं समझते? क्यों वो हमेशा हमें गलत ही समझते हैं? क्यों उन्हें हमारे तरीकों से दिक्कत है? क्यों वो चाहते हैं कि हम हमेशा वो ही करें जो वो चाहते हैं, वैसे ही करें जैसे वो चाहते हैं? छोटों को हमेशा अपने से बड़ों से यही शिकायत होती है. और बड़े, उनके पास भी एक पुलिंदा होता है अपने से छोटों से शिकायतों का. जैसे छोटे हमेशा अपने ही मन की क्यों करते हैं? क्यों उन्हें लगता है कि हम जो कह रहे हैं वो गलत है? क्यों उन्हें हम, हमारे विचार पुराने ज़माने के लगते हैं? उन्हें क्यों लगता है कि सिर्फ उन्हें सबकुछ आता है?  वगैरा-वगैरा… अजीब-अजीब सी शिकायतें, अलग-अलग लोगों से शिकायतें. कहीं माँ-बाप को बच्चों से, कहीं बच्चों को माँ-बाप से और, कभी पति को पत्नी से तो कभी पति को , पत्नी से, कभी सम्बन्धियों से, कहीं रिश्ते से कहीं रिश्तेदारों से, और कभी दोस्तों से कभी दुश्मनों से, कभी नेताओं से कभी पड़ोसियों से… हज़ार शिकायतें, और उनके लाख बहाने।
न जाने कहाँ से आती हैं इतनी शिकायतें? क्यों करते हैं हम शिकायतें? जी, वैसे ये भी एक शिकायत ही है।
यदि सोचा जाए तो असल में शिकायतें हमारे ही दिल-ओ-दिमाग की उपज होती हैं। और सबसे ज्यादा तब जब हमें असंतोष होता है। जब भी हमें किसी की कोई बात या काम हमारे हिसाब से सही नहीं होता, या हम उससे संतुष्ट नहीं होते तभी ये शिकायत पैदा होती है या हमारा कोई काम या बात किसी को पसंद नहीं आती तो उन्हें हमसे शिकायत हो जाती है। पर जब हमें किसी से शिकायत हो तो हमें सामने वाला गलत नजऱ आता है, परन्तु जब किसी और को हमसे शिकायत  होती है तब भी हम सामनेवाले को ही गलत मानते हैं और खुद को सही… है न अजीब-सी बात। बात ये कि हम हमेशा खुद को सही और दूसरे को गलत। शायद ऐसी ही बातें, सोच और धारणा शिकायतों की जन्मदाता हैं। ये भी तो हो सकता है कि हमें किसी से शिकायत किसी गलत-फहमी की वजह से हो और किसी और को हमसे शिकवा हमारे किसी गलत कदम का नतीजा हो।
कितना अच्छा होता यदि हमें किसी से कोई भी शिकायत नहीं होती। किसी को किसी से कोई भी दिक्कत न होती। क्योंकि जब भी कहीं कोई शिकायत होती है तब एक दर्द होता है। कभी उसे जिससे शिकायत की गई हो तो कभी करनेवाले को. बनी बात है जब हम सुनते हैं कि हमारे किसी अपने को हमारी कोई बात अच्छी नहीं लगी तो हमें तकलीफ होती है, ऐसे ही सामनेवाले को भी लगता होगा। हाँ एक और बात होती है, यदि हमसे हमारी शिकायत हमारे सामने, हमारे मुंह पर कर दी जाए तो ठीक भी है, परन्तु जब भी वो किसी और के सामने और हमारे पीठ पीछे के जाए तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो जाती है, क्योंकि कभी-कभी वो शिकायत हम तक किसी और ही रूप में पहुँचती है। पर सबसे अच्छा तो तब होता जब न असंतोष होता और न ही इन शिकायतों का बीज पनपता… न गिला न शिकवा… सब हंसते-हंसाते, खिलखिलाते मजे से जिंदगी गुजारते…
तो आज से किसी से कोई गिला-शिकवा-शिकायत मत रखिये, और यदि होती भी है तो जिससे भी शिकायत है उसी से बात करें और उसे जल्द-से-जल्द समाप्त कर दें… 



P.S. ये लेख सुरभ सलोनी में 23 अप्रैल को छपा था. 

हिंदी दिवस... भाषा उपयोग...

आज, 14 सितम्बर... हिंदी दिवस... हर तरफ सिर्फ हिंदी-हिंदी चिल्लाते लोग... इस भाषा का उपयोग करने के लिए ज़ोर-शोर से लगे हैं... बहुत अच्छा लगता है ये सब देखकर... सच है हम हिन्दुस्तानी कहलाए जाते हैं, और हिंदी हमारी भाषा है, उसका सम्मान करना चाहिए, उसका उपयोग करना चाहिए... सारी बातें एकदम सत्य एवं यदि हम ही इन बातों को न करेंगें तो कौन करेगा???
कल रात, या कह लीजिये की 12 .00 बजे, जैसे ही 14th लगी... वैसे ही हिंदी-दिवस ने अचानक से ज़ोर पकड़ा... फेसबुक पे बधाइयों का सिलसिला चल निकला... विश्व दीपक जी ने शुरुआत की... उनकी पंक्तियाँ कुछ यूं थीं...
"चलो आज आगे बढ़कर सभ्यता के माथे बिंदी दें,
संस्कृति का पुनुरुत्थान करें, भाषा को उसकी हिंदी दें... "
बस इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मैंने भी एक छोटी-सी कोशिश की...
"अब हिंद को हिंदी का उत्थान चाहिए
हर युग की तरह, एक पूर्ण स्थान चाहिए
जो लोग अछूते हैं इस मिठास से, अभी भी
उन्हें इतिहास का ज़रा-सा ज्ञान चाहिए... "

हिंदी-दिवस पे कई पोस्ट पढ़ें, और हिंदी-उत्थान के लिए हमेशा पढ़ती भी रहती हूँ... भाषा को लेकर हमेशा कुछ-न-कुछ लिखा जाता रहता है... जरूरी भी है... परन्तु जो बात मुझे खलती है वो ये की, एक भाषा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए हम दूसरी भाषाओँ को गलत ठहराते हैं... खासतौर पे इंग्लिश को, उसे ही ये दोष दिया जाता है की उसके उपयोग के कारण हम हिंदी को भूलते जा रहे हैं...
बातें एक हद तक सही भी हैं, परन्तु इसमें गलती किसकी है... पोरा सिस्टम ही ऐसा है हमारा, तो क्या करियेगा??? और कई चीज़ें हैं इस सिस्टम में जो बदली भी नहीं जा सकती... और जो बात अखरती है वो "अपमान करना"... किसी भाषा या व्यक्ति या सभ्यता का अपमान करना कोई बहुत अच्छी बात तो नहीं, और ये हमें कभी सिखाया भी नहीं गया, की खुद को सही बताने के लिए हम दूसरों को गलत ठहराएं या दूसरों का अपमान करें... अब यदि मैं करेले की सब्जी नहीं खाती या हमारे घर में कोई उसे पसंद नहीं करता इसका मतलब ये तो नहीं की करेला एक बेकार सब्जी है... इसी तरह यदि हम हिंदी का उपयोग करते हैं, और दुसरे किसी और भाषा का, तो इसका मतलब ये नहीं की वो भाषा ख़राब है... 
खैर!!! ये बातें हटाते हैं, कुछ सिस्टम की बात करते हैं... सब चाहते हैं की उनके बच्चे, भाई-बहन किसी बहुत अच्छे संस्थान में पढ़ें, उच्च शिक्षा ग्रहण करें, एक बहुत ही उच्च पद के अधिकारी हों... इस सबके लिए हमें एक कड़े परिक्षा-प्रक्रिया से गुज़ारना पड़ता है... जिसमें सबसे पहले एक प्रश्न-पत्र हल करना पड़ता है, और फिर साक्षात्कार की प्रक्रिया... अब यदि हम technical-studies की बात करें तो, वो पढाई ही पूरी-की-पूरी इंग्लिश में होती है, तो क्या हम पढाई छोड़ दें??? फिर आती हैं जॉब की बारी, तो technical-studies के बाद आपसे उम्मीद की जाती की आप इंग्लिश में ही बात करेंगें, न भी करें तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं है... और हमारे देश की सबसे अच्छी सर्विसेस मानी जातीं हैं "पब्लिक सर्विसेस" {I.A.S.,I.P.S.,I.P.S,I.F.S.,I.Fo.S.,I.E.S., etc.} और इनके लिए तो आपको भाषा ज्ञान बहुत ही जरूरी है, फिर चाहे वो हिंदी हो, इंग्लिश हो या फिर आपकी क्षेत्रीय भाषा... परन्तु मुझे उसमें भी दिक्कत नहीं है... ये तो सभी जानते हैं... मेरा मेन प्रोब्लम है की हम किसी को गलत क्यों बोंले???
भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, हर भाषा को उतना ही सम्मान, उतना ही आदर जितना किसी दूसरी भाषा को... हर कदम में जहाँ पानी और भाषा बदलती हैं वो हमारा राष्ट्र है... अब उदाहरण के लिए, हमारी क्षेत्रीय भाषा "बघेली" है, परन्तु उसे भी लोगों ने मोडिफाई कर लिया... बघेली खासतौर पे विन्ध्य-क्षेत्र में बोली जाती है, जिसमें रीवा-सीधी-सिंगरौली-सतना-शहडोल शामिल हैं... यहाँ सभी जगह बघेली बोली जाती है, परन्तु हर जगह के हिसाब से उसमें मोडिफिकेशन है जैसे रीवा और सतना सिर्फ 52 km की दूरी पर है, भाषा कहने को बघेली ही है परन्तु लहज़ा और कुछ शब्दों का उपयोग बिलकुल अलग है... तो जहाँ इतनी सी दूरी में भी ऐसी भिन्नता पाई जाए, वहां आप कैसे कह सकते हैं की हर कोई एक भाषा का उपयोग कर रहा है... जी लिखने में बेशक सब एक जैसी ही हिंदी का उपयोग कर रहे हैं... और यदि बात क्षेत्र की हो तो केरल जैसी जगह में हम क्या करेंगे, क्योंकि वहां के तो कल्चर में ही इंग्लिश है... वो यदि अपने भगवान् को भी याद करते हैं तो इंग्लिश में ही करते हैं...
मेरी सोच मुझे एक बात और सोचने के लिए मजबूर कर देती है... जहाँ इतने लोग, इतनी भाषाएँ, इतनी भिन्नता पाई जाए वह यदि एक मंच ऐसा हो जहाँ हम सब एक-दुसरे से जुड़ें, अपनी भिन्नताओं को छोड़ सब एक जैसे ही हो जाएं तो क्या वो गलत है... क्योंकि मेरी नज़र में वो सारी बातें जो भेद-भावना को बढ़ावा दें या भेदभाव करें वो गलत हैं...  और हमें तो हमेशा ही मिलजुल के रहना सिखाया गया है... और यदि हिंदी को बढ़ावा देना है तो प्लीज़ उसके लिए किसी और भाषा का अपमान न करें...

एक बात और, मेरा मानना ये भी है की भाषा कोई भी हो, बस इतनी सरल हो की हर किसी के समझ में आ जाए... शब्द इतने क्लिष्ट न हो की हर शब्द के साथ शब्द-कोष खोलना पड़े... की पता चला, कुछ दिन तो ठीक परन्तु उसके बाद लोग हमें पढना और फिर हमसे बात करना भी छोड़ दें... इसीलिए बातें सरल भाषा में हों तो ज्यादा आसानी होती है... वरना litrature की कमी कम-से-कम हमारे देश में तो नहीं ही है...


P.S. कृपया मेरी इस पोस्ट को ये न समझा जाए की मेन इंग्लिश की पैरवी कर रही हूँ... मुझे कुछ बातें अखरी और मुझे लगा की आज सबसे अच्छा दिन है अपनी इस बात को आप सबके समक्ष रखने का...

खुद को लगता है, तभी दुखता है...

पिछले दिनों में सबकुछ अल-अलग सा समझ आ रहा है... पता नहीं क्यों, पर कभी-कभी अपनी ही सोच अजीब-सी लगती है... doubt होता है की क्या वाकई मैं ही ऐसा सोच रही हूँ? और यदि हाँ, तो क्यों?
और जो सोच रही हूँ वो सही भी है या नहीं...
खैर...
पिछले दिनों में लन्दन में हो रहे दंगों की खबर ज़ोरों पर है... हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को अपनी छुट्टियां cancel करके वापस आना पड़ा...
कल अचानक बर्मिंगम में दंगाइयों ने आग लगा दी... बहुत नुकसान हुआ है... हिंसा ऐसी फ़ैली है कि इसने लीड्स, ब्रिस्टल और नॉटिंगम को भी अपनी चपेट में ले लिया... पुलिस ने इसी सिलसिले में 400 लोगों को गिरफ्तार भी किया...
ये सारी खबरें सुनकर बुरा लग रहा था... ये दंगाई कहीं भी हों, किसी भी कोने में हों... हमेशा कुछ-न-कुछ उटपटांग करते ही रहते हैं...
यहाँ गलती पुलिस से भी हुई, जब उस बेचारे निर्दोष को गोली मार दी...
चलिए आज नहीं तो कल उनकी हालत सुधर जायेगी... पर मेरी चिंता कुछ और है... कहा जाये तो चिंता का विषय इस बार मैं खुद ही हूँ...
हुआ यूं कि कल जब मैं ये सारी खबरें देख रही थी तो अचानक मेरे मुंह से निकला, "हाँ आज बात खुद पर आई तो दर्द हो रहा है"
मम्मी ने डांट भी दिया कि ऐसा नहीं बोलते...
पर तब मन में कुछ पंक्तियाँ उठीं जो लिखे बिना और यहाँ बाँटें बिना रहा नहीं जा रहा...
जानती हूँ गलत है, ऐसे ख्याल मन में आने ही नहीं चाहिए... और कहते हैं कि गलत बातों को जितना जल्दी और जितने अधिक टुकड़ों में बाँट के अपने से दूर करदो, कर देना चाहिए...
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आज खुद पे पड़ी
तो दुख न!
सोचो, जब हमें लगा था
तब हमें भी तो दुख होगा न?

तुम्हारे घर में आग लगी,
तो सभी दौड़ पड़े बुझाने के लिए...
fire-brigade बुलाई,
पुलिस बिठाई,
तैनाती करवाई,
कुछ को हवालात कि हवा खिलाई...
बात ऐसी बिगड़ी थी,
कि,
प्रधानमंत्री तक की छुट्टी कैंसल करवाई...
अब समझ आया
कि लगता है तो कितना दुखता है...

चलो बात कुछ पुरानी करें,
याद वो कहानी करें...
कुछ जुल्म-ओ-सितम जो
तुम्हारे पूर्वजों ने
हमारे पूर्वजों पर ढाए थे
जब तुम व्यापार करने का बहाना ले
हमारे देश में आये थे...
फ़िर-फ़िर धीरे-धीरे
तुमने अपना जाल फैलाया
हमें अपना गुलाम बनाया...
तरह-तरह कि कहानी बनाई
अजब लूट थी, जो तुमने मचाई...

तुम्हारे यहाँ कि आग
से तो सिर्फ कुछ नुकसान हुआ होगा
तुम्हारे ही दंगाइयों ने कुछ buildings को फूंका होगा
तुमने पानी छिड़क
सारी आग बुझा भी दी होगी
पर उस आग का क्या
जो तुमने यहाँ दिलों में लगाई
भाई-भाई की दुश्मनी कराई
कितना लहू बहाया हमने,
आज भी बहा रहे हैं
तुम्हारी लगाई आग
आज तक बुझा रहे हैं...

याद करो वो 100 साल
जब हम थे बेहाल
और तुम खुशहाल...

फ़िर कुछ सरफिरों का दिमाग चकराया
तुम्हें खदेड़ा, मार भगाया...
कुछ हिंसा  के पुजारी
तो कुछ अहिंसा के दीवाने थे
सबका मकसद एक,
सिर्फ अलग-अलग बहाने थे...
कुछ के नाम पटल पे हैं
पर कुछ से तो हम अभी भी अन्जाने हैं...

तुमने जो किया वो गलत था,
जो funda अपनाया
पता है, उसका अंजाम
हम आज तक भुगत रहे हैं...
याद है वो, "divide and rule policy"
तुम्हारा rule तो ख़त्म हो गया
पर तुम्हारी कुछ policies अभी भी हमारे बीच हैं...
और,
हम आज भी DIVIDE हैं...

पिछले कुछ ख़ास दिन...

आज बहुत दिनों बाद लिखने आई हूँ... या कहूँ कि आ पाई हूँ...
याद भी नहीं कि कितने दिन चाह कर भी नहीं लिख पाई...
पहले घड़ी - नक्षत्र जैसी बातों पर यकीन नहीं होता था, पर अब लगने लगा है कि ऐसी चीज़ें होती हैं... इनके भी मायने होते हैं...
जिस दिन "वर्ल्ड कप" का फाईनल था, २ अप्रैल, उस दिन हमारी यात्रा शुरू हुई भोपाल के लिए, और बस तभी से सब-कुछ शुरू हो गया... मेरा मोबाईल चोरी होना, भोपाल-इंदौर का सफ़र इतना हेक्टिक होना, मेरी रिपोर्ट्स, पहली बार एम.आर.आई. होने में इतनी दिक्कत, डॉ. से डांट, सरवाईकल, और भी न जाने क्या-क्या??? परन्तु जहाँ इन सब का अंत हुआ वो सबसे ज्यादा ख़राब, जब लौटना था, ६ अप्रैल, हबीबगंज स्टेशन में माँ का पैर ट्विस्ट होना, उनका गिरना और हाथ-पाँव दोनों में फ्रैक्चर... :(
बस माँ का हाथ-पैर फ्रैक्चर हुआ नहीं कि सारे काम बंद, एट-लीस्ट मेरा तो सब काम ही रुक जाता है... बड़े होने का इतना फायदा तो होता ही है कि आप अपने छोटे भाई-बहन को इतना कह सकते हो... भाई से बहस भी हो गयी पर जीती मैं ही... खैर, दो दिन हुए पक्का प्लास्टर चढ़े, और तभी से माँ के पास से थोडा-सा वक़्त भी मिल जाता है... वर्ना, पहली बार माँ को बच्चों जैसे जिद करते देखा, और जो कभी शांत नहीं रहती थीं, लगातार लेटे रहने के कारण थोड़ी-सी चिडचिडी भी हो गईं थीं... पर अब सब मस्त मिजाज़ में वापस...
पर एक कहावत उनकी ज़ुबांपर रहती है, नोटिस पापा ने किया और माँ ने याद कर लिया... कहती हैं जो बड़े- बुजुर्ग कह गए हैं वो एकदम सही है...
"पारीबा, चौथ, चौदस, नवमी.... ये रिक्ता तिथियाँ हैं... इन दिनों यात्रा करने से पहले देख-भाल लो... और पारीबा यदि मंगल को पड़े तो बिल्कुल भी यात्रा शुरू न करें..."
हर बार की तरह हमारा महान परिवार फ़िर एक साथ... सब परेशान थे, पर साथ रहते दिन कैसे बीत रहें हैं पता ही नहीं रहा... लगता है जैसे कल-परसों ही घर लौटे हों... और हैं भी इस समय रीवा में, माँ-पापा दोनों के मायके और रिश्तेदार यहीं बसे हैं, तो सुबह से आने-जाने वाले भी... और उनके अजीब से किससे कहानियों के साथ हमारा मनोरंजन भी... सबसे मज़ा तो रात में ११-१२ के बाद आता है, जब खाना-वाना खा कर हम सब दिनभर की बातें और अपने-अपने अनुभव शेयर करते हैं, कुछ मोनोएक्टिंग एक्सपर्ट्स तो मस्त कॉपी भी करते हैं, और बाउजी या चाचा लोगों की नींद ख़राब न हो इसीलिए हम लोग उन्हें सबसे ऊपर वाले फ्लोर में सोने भेज देते हैं, तो बस फ़िर क्या सोते-सोते ३-४ तो आराम से बजते हैं... और हमेशा की ही तरह इस परिवार की खासियात, हर मुसीबत यूँहीं हंसते-हंसते निकल जाती है, और हम सब कुछ-न-कुछ सीख रहे हैं... यदि मैं अपनी बात कहूँ तो मैं आजकल दुनियादारी सीख रही हूँ... रिश्तेदारी निभाना तो हमें बोलने से पहले ही सिखा दी जाती है... और इस बार तो सबसे ख़ास, मैं और माँ, एक-दूसरे के और ज्यादा करीब आ गए... :)
और सबसे ख़ास तो तब लगता है जब लोगों के ई-मेल्स पढ़ती हूँ, माँ के लिए शुभकामनाएं और मेरे लिए चिंता... और मजेदार तो वो जिन्हें मेरा मोबाईल चोरी होने की खबर नहीं थी, और न ही उनके पास मेरा कोई दूसरा नंबर... कुछ लोग तो पुलिस-स्टेशन में गुमशुदा की रिपोर्ट लिखवाने जा रहे थे...
चलिए आज की मोहलत समाप्त... कुछ पढ़ना भी है...
तो चलती हूँ... फ़िर मिलूंगी जिस दिन वक़्त मिलेगा...

मृत्यु के पहले... मृत्यु...

मृत्यु के बाद जीवन है???
है या नहीं है?
पता नहीं...
यदि है...
तो कैसा है? क्या है ?

पुनर्जन्म होगा???
होगा या नहीं?
पता नहीं...
यदि होगा...
तो की होगा? कहाँ होगा?

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ये सवाल...
और इनसे घिरे हम
हमारा समाज
हमारा दिल
हमारा दिमाग़
हमारा कर्म
हमारा अस्तित्व...

अभी मिले इस जीवन को मृत्यु की संज्ञा क्यों दे रहा है???
क्या अभी मिली इन साँसों को जीने की जगह
हम इन्हें भोग रहे हैं???
इन मिले पलों को बिना गवाएं
क्या हम नहीं जी सकते???
उस पार की चिंता छोड़
हम इस पार नहीं जी सकते???
...

पिछले दिनों...

पिछले कुछ दिन बड़े अजीब बीते...
बहुत सारे परदे उठे,
बहुतों की सच्चाई सामने आई...
पहले तो यकीन नहीं हुआ,
कि ये वाकई सच है...
दिमाग ने मान भी लिया...
पर दिल को समझाना जरा मुश्किल था...
धीर-धीरे वो भी समझ गया

लगा जैसे किसी जोर का तमाचा मार
नींद से जगा दिया दिया हो मुझे...
और एक सुन्दर-सा ख्वाब
जो देख रही थी मैं
उसे तोड़ दिया हो
चकनाचूर कर दिया...
तिमिर से निकाल मुझे
अचानक
दोपहर कि चिचालती धुप में ला खड़ा किया हो...
आँखे भी मिलमिला गयीं थीं...

पर धीर-धीरे उन्होंने भी
साचा के उजाले को,
उसकी तपन को अपना लिया...

सबसे बड़े आश्चर्य की बात
न जाने कहाँ से मुझमें
ये सहनशक्ति आ गयी
कि मैं उन चेहरों को
देख मज़े ले रही थी
मुस्कुरा रही थी
मुझे खुद नहीं पता कि
मेरा comfort-zone
अचानक इतना बड़ा कैसे हो गया...

पर...
जो हुआ
बहुत खूब हुआ
अच्छा हुआ...
मुझे इस यथार्थ को जाने का संयोग प्राप्त हुआ...

उन सभी चेहरों को
उन मुखौटों को शुक्रिया...

वो कलम...


काश ऐसी कलम ईज़ाद हुई होती
जो बस यूँही
चलती रहती बिना रुके
और मन की हर बात
लिख जाती
बिना चुप हुए बीच में...

जिसे सोचना न पड़ता
कि, किस बात को लिखना है किस तरह???

वो तो बस
चलती मदमस्त पवन की तरह
और उड़ा ले जाती
इस गम और ख़ामोशी के बादलों को कहीं दूर...
या बहती उस चंचल नदिया की तरह
जो सारे कलरव खुद में समेटती
अग्रसर होती है अपनी मंज़िल की ओर...
और एक दिन,
शांत हो जाती है मिलकर
उस अथाह समुद्र से
जो न जाने
कितनों का दुःख,
कितना शोर समेटे हुए है
अपने-आप में...
परन्तु तब भी शांत है...

पर कभी-कभी वो भी उछाल मारता है
लांघ कर अपनी सीमा
जताता है शायद,
कि,
अब उसका भण्डार भर गया है
या
उसकी कलम भी कहीं खो गयी है...

बनारस...

ये है एक पावन धरती
यहाँ है गंगा, भोलेनाथ
और न जाने कितनी संस्कृतियों का मेल...
मत करो ये शोरगुल, ये धमाके
और ये लाश बिछाने का खेल...
कुछ और नहीं कर सकते
तो इतना ही कर दो
अपने नाम के आगे से ये "INDIAN" ही हटा दो...

आज की पोस्ट यहाँ नहीं है...

जी हाँ सही पढ़ा आपने, आज मेरी पोस्ट प्रकाशित तो हुई है, परन्तु यहाँ, मेरे ब्लॉग पर नहीं...
आज मेरी लिखी एक कविता प्रकाशित हुई है S.M.Masoom ji के ब्लॉग "अमन का पैगाम" में...
सच कहूँ तो जब मासूम जी ने मुझसे इस विषय पर लिखने को कहा, तब बुद्धि काम ही नहीं कर रही थी... समझ नहीं आया कि मैं क्या लिखूं इस परा क्योंकि बड़े-बड़े लोग इस विषय पर लिख रहे थे, और मासूम जी उनकी रचनाएँ पोस्ट भी कर रहे थे... और इस लोगों के सामने मैं तो एक विद्यार्थी हूँ... और मेरी बुद्धि, गज़ब है... हमेशा उल्टी ही चलेगी... उन्होंने लिखने को कहा था कुछ और मैं लिख रही थी कुछ... {आप पढियेगा, तो खुद ही समझ जाएगें} ...
खैर, डरते-डराते उन्हें अपनी रचना भेज दी... और साथ में ये भी लिख दिया कि, "आप पहले देख लें, ठीक लगे तभी प्रकाशित करें"... कल{1/dec} उनका मेल आया कि आज मेरी रचना को प्रकाशित किया जा रहा है... यकीन मानिये, लगा था कि हो गया बेटा पूजा जितनी भी image बनी है आज सबका कचरा होना है... लगा था कि लोग न जाने क्या सोचेंगें??? कहेंगें... "अच्छी उल्टी खोपड़ी की लडकी है"
पर आज जो हुआ... unbelievable... सच... यकीन नहीं हो रहा कि लोगो को पसंद आ रहा है... लोग तारीफ कर रहे हैं... शायद किस्मत है कि लोग और मेरी ऐसी उल्टी-पुलटी रचनाओं को भी पसंद कर रहे हैं...
सबसे पहले मासूम जी को धन्यवाद, जिन्होंने मुझे लिखने का अवसर प्रदान किया... और फ़िर उन सभी लोगों को धन्यवाद जिन्होंने यूं मुझपर अपना आशीष बनाया और मेरी ऐसी रचना को भी पसंद किया...
बहुत-बहुत शुक्रिया...
रचना यहाँ है...
कौन-सा पैगाम... और किसके नाम...???

चलो थोड़े स्वार्थी हो जांए...

आज की इस दुनिया और इस life style में इतने busy हो गए हैं की हमारे पास अपने लिए ही वक़्त नहीं रह गया है... जिसे देखो बस भाग रहा है या एक fixed life जी रहा है, सब कुछ time-table के हिसाब से... जिंदगी न होकर train हो गयी है, चढ़ा दिया पटरी पर, और फुरसत... बस चली जा रही है... हम सबका ख्याल रखते सिवाय खुद के... पर ऐसा क्यूँ? क्या वाकई अब हमें २४ घंटे भी कम पड़ने लगे हैं या जो भी हम करते है वो बस इस rat-race में बने रहने के लिए...
कितना मुश्किल है न आज की इस दुनिया में सफल होना... हर competition में अपने आप को prove करना , पहले school, फिर college, फिर job और फिर घर... सबसे पहले एक position बनाने की चिंता और फिर उसे maintain करने की... वाकई कितनी कठिन हो गयी है हमारी life... या कहे तो हमारी so called life...
और फिर जो भी वक़्त बचा इस rat-race से वो हम दे देते है अपनों को, वो जो हमारे करीब हैं... आख़िर उनका भी तो कुछ हक़ है हमारी ज़िन्दगी में... उनकी ख़ुशी, उनका दुःख... ये सब भी हमारी ही जिम्मेदारियों का ही एक हिस्सा है... और फिर ये keyboard, जहाँ हम web-pages में जहा हम कभी कोई रिश्ता निभा रहे होते है तो कभी ख़ुशी और शांति तलाश रहे होते हैं... पर इन सबके बीच हम कहाँ हैं? एक ऐसा पल जिसे हम पूरी तरह अपना कह सकें... क्या कभी यूँ ही बैठे-बैठे आप खुद miss नहीं करते, क्या कभी बस यूँ ही बिना बात के मुस्कुराना या यूँ ही खुश जाना या कोई अनजानी-सी या कोई भूली-बिसरी धुन गुनगुनाने का मन नहीं होता? होता है न... पर हम नहीं करते... क्यों??? क्योंकि उससे हम अपने लक्ष्य से भटक सकते हैं... हमारा time-waste हो सकता है...
क्या याद है की last-time आप कब खुश हुए थे, या क्या ऐसा किया था जिससे आपको ख़ुशी मिली हो? last-time कब किसी दोस्त को बिना काम के, बस यूँ ही हाल-चाल जानने के लिए phone किया था...
या कब e-mail forward करने की वजाय बस यूँ ही "hii" "how are you" . type करके भेजा था... कर सकते थे... पर नहीं किया... क्यों... time-waste... क्या वाकई अब हमारी खुशियाँ हमारे लिए सिर्फ time-wastage बन कर रह गयी है... यही रह गयी हमारी हमारी खुशियूं की पहचान...
नहीं न...
तो चलो एक शुरुआत करते हैं... थोड़े से selfish हो जाते हैं... हर दिन... यानी २४ घंटो से कुछ पल चुराते हैं... जो सिर्फ हमारे होंगे...

तो चलो ...
थोड़े स्वार्थी हो जाते हैं
कुछ पल चुराते हैं....
बहुत मुस्कुरा लिए औरों के लिए ,
चलो एक बार अपने लिए मुस्कुराते हैं...
बहुत हुआ दूसरों की धुन गुनगुनाना,
चलो अब अपनी एक धुन बनाते है...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
थक गए ये हाथ कागज़ में sketch बनाते-बनाते,
चलो अब आसमाँ में उंगलिया चलाते हैं...
बहुत हुआ एक ही ढर्रे में चलना,
चलो अब कुछ नया आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
जाने-पहचाने रास्तों पे चलना, बहुत हुआ,
चलो कुछ अनजान रातों की ओर कदम बढ़ाते हैं...
वही पुरानी recipes, वही पुराना स्वाद,
चलो कोई नया ज़ायका आज़माते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...
अपनों से अपनापन निभाते ज़माने हो गए,
चलो किसी अजनबी को अपना बनाते हैं...
थक कर चूर हो गए यूँ ही भागते-भागते...
चलो कुछ पल आराम के बिताते हैं...
चलो कुछ पल चुराते हैं...

P.S. :-
ये मेरी एक पुरानी पोस्ट है... न जाने क्यूं आज इसे पढ़कर फ़िर से आप लोगों के साथ बांटने का मन हुआ... सो पोस्ट कर दी...

लाली देखन मै भी चली...

"लाली मेरे लाल की, जित देखूं उत लाल...
लाली
देखन मै गयी, मैं भी हो गयी लाल..."


पंक्तियों को पढ़
सज-सँवर,

प्रेम-रस में डूब कर...
अपने नन्हें हाथों में
कुछ कोमल सपनों की पोटली ले
निकली थी

मैं भी अपने लाल को खोजने...

बाहर आकर देखा
तो मंज़र कुछ और ही था...

हर दरवाज़े पर एक लाल खोपड़ी टंगी थी...
और नीचे लिखा था... DANGER... खतरा...
प्यार के रास्ते में ख़तरा???

बात समझ के परे थी ...
मैं आगे चल पडी...


जो दिखा...
उसमें...
कहीं लडकी होने के कारण

बुरी नीयतों का खतरा...
कहीं जात-पात का खतरा
कहीं रिवाजों के टूट जाने का खतरा...
तो कहें ऊँच-नीच का खतरा

कहीं सह्गोत्री होने के कारण
ऑनर-किलिंग का खतरा...
तो कहीं नकास्ल्वाद,
आतंकवाद का खतरा...
या फ़िर,
प्रादेशिक अलगाव या भाषा अलग होने से
पहचाने जाने का खतरा...

कहीं धोखे-से किसी दरवाज़े को

छूने की कोशिश भी करती...
चरों ओर से खतरनाक आवाज़ गूंजती...
"खतरा... ख़तरा... खतरा..."
इतना सुन
ऐसा लगा मनो
फट पड़ेंगीं दिमाग की नसें...
पागल हो जाउंगी मै इस गर्जना से...
और टूट जायेंगे मेरे सपने सच होने से पहले...

इसी डर से समेट ली
अपनी पोटली अपने सीने में

और चीख पड़ी थी ज़ोर से...

पर ध्यान आया अचानक
अपने नन्हें सपनों का
फटाफट खोली वो पोटली...

पर...
तब तक...
वो त्याग चुके थे अपने प्राण
और मैं नहा रही थी उनके लहू से...


तब याद आया कि...
लाल रंग केवल प्रेम का नहीं
"खतरे" का सूचक भी है...
और अब उन पंक्तियों का मतलब मैं समझ भी गयी थी
और उन्हें आज के युग में चरितार्थ भी कर रही थी...

वाकई...

"लाली मेरे लाल की, जित देखूं उत लाल... लाली देखन मै गयी, मैं भी हो गयी लाल..."

कल प्रिलिम इंटरव्यू था...

जी हाँ... सही कह रही हूँ, कल मेरा प्रीलिम इंटरव्यू था, यानि प्रथम चरण...
अब आप सोचेंगे की कैसा इंटरव्यू और कैसा प्रथम चरण???
तो जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में मैनें "पूजा की शादी" वाली चर्चा का ज़िक्र किया था... तो कुछ लोग कुछ ज्यादा ही तेज़ निकले, अभी बात भी नहीं हुई कि घर ही पहुँच गए... उनका कहना था की उन्हें दिवाली की शुभकामनाएं देने आना है। माँ-पापा को सबकुछ पता था कि वो लोग क्यूं आ रहे हैं, पर मुझसे किसी न कुछ नहीं कहा। वो लोग ये तो कह नहीं सकते थे की मुझे देखने आ रहे हैं, क्योंकि देख तो मुझे कई बार चुके थे, आए तो बस मेरा मंतव्य जानने थे। मुझे यहाँ से इतनी दूर; 180 किमी बुलाया, सोचिये ज़रा रात में, म.प्र. की सड़कें और दूसरे दिन अचानक पता चले की लड़के के माँ-बाप आपको देखने आ रहे हैं, क्या हालत होगी? सबसे ज्यादा गुस्सा तो माँ-पापा पर आया कि "आप लोग तो मुझे बता सकते थे न?" खैर...
पर जैसा मैंने सोचा था वैसा तो कुछ हुआ ही नहीं... न मुझसे कोई सवाल न जवाब... बस आए, बैठे, गप्पे मारी, खाना खाए और चले गए। बस एक लडकी; जो लड़के की चचेरी बहन थी; वो मुझे घूर-घूर कर देख रही थी... न जाने क्या खोज रही थी, या मैं उसे दूसरे गृह की लग रही थी...
अब आप सोचेंगे कि जब कोई सवाल-जवाब हुआ ही नहीं तो मैंने इसे प्रीलिम इंटरव्यू क्यूं कहा? वो इसलिए क्योंकी अभी लड़के के माँ-पापा आए हैं, जो प्रीलिम स्टेज थी, फ़िर लड़का और उसकी बहन आयेंगे, जो मेन्स यानि सेकोन्दरी एंड फिनाल इंटरव्यू होगा। ऐसा लगता है जैसे शादी न हो गयी "लोक सेवा आयोग" के एक्साम्स हो गए.
क्या प्रोब्लम है इन लोगों का? एक बार में नहीं आ सकते क्या? खैर जो होगा देखा जायेगा... अभी तो मैं बस अपने काम पर और थोडा-सा लिखने पर ध्यान देना चाहती हूँ...

शायद मेरे जाने का वक़्त आ गया...

शायद,
अब वक़्त आ गया...
मेरे जाने का

माँ भी चुप-चाप तय्यारियाँ करती है
कभी साड़ियाँ चुनती तो
कभी गहने बनवाती है
कभी मेंहदी लगे हाथों को देख ललचाती है
और कभी पापा के साथ बैठ
मेरे मंडप के सपने सजाती है
जिसके नीचे बैठ वो सौंप देगी
मुझे मेरा नया जीवन...

कभी कोई नया रंग चुनती है...
कुछ दिन बाद उसी रंग के लिए कहती
"अब ये पुराना हो गया"
पर सच्चाई है कि माँ ने वो रंग किसी दुल्हन को पहने देख लिया था...

जब भी कोई घर आता है
उसे एक नया लड़का बताता है
कोई इंजीनियर तो कोई डॉक्टर
कोई किसी बड़ी एम्.एन.सी. में
तो कोई सरकारी नौकरी के साथ...
किसी का घर अच्छा है
तो किसी के घरवाले
कोई बहुत संपन्न है
तो कोई संस्कारोंवाले...

पर ये सब वो मुझसे नहीं कहती है
बस अपने आप ही सब ताना-बना बुनती है...

हर बार हर सपना
एक नई सोच के साथ
नए रंग के साथ
नई साज-सज्जा के साथ
और
नए तौर-तरीकों के साथ...

एक शुरुआत... अंत के बाद...

मंज़िल मेरी भी वही है
जो तेरी है...
जाना मुझे भी वहीं है
जहाँ तुझे है...
फ़र्क है तो बस इतना...
कि मैं जला दी जाउंगी और
तुझे दफनाया जाएगा...

तो क्यूं न एक काम करें...
सौंप दे अपने आप को
इस दुनिया के हाँथ में
मरने के बाद
और तत्पश्चात हम जिन्दा रहेंगें...
किसी की आँखों में
किसी के दिल में
किसी और के
किसी हिस्से में...

फ़िर तेरा और मेरा सफ़र एक जैसा होगा...
जैसी तेरी कहानी होगी, वैसा ही मेरा भी फसाना होगा...

और हम एक नई शुरुआत करेंगे
अपने अंत के बाद...

एक डरपोक ब्लॉगर से सामना...

कल बड़ी ही मजेदार घटना हुई... और न जाने क्यूं रह-रह कर मुझे अभी तक हंसी भी आ रही है... अच्छा आप में से कोई भी मुझे एक बात बताइए, यदि आप मेरे ब्लॉग पढ़ते हैं, जब सही लगता है तो तारीफ़ करते हैं और जब गलत तब मुझे बताते भी हैं... और जहाँ तक मुझे याद है, मैंने यदि गलती की है तो स्वीकार भी है, और उसे सुधारने की पूरी कोशिश भी की है, यहाँ तक कि जिन भी ब्लॉग में गयी हूँ, वह भी यदि किसी न लिखने वाले को गलती बताई है तो उसने मानी है... पर कल एक ब्लॉग पर गयी, वह कुछ ऐसी बातें लिखी गयीं थीं मै जिनसे बिलकुल भी सहमत नहीं थी, सो मैंने ऐतराज़ जताया, तब लिखनेवाले व्यक्ती न मुझे बड़ी ही अभद्रता से जवाब दिया, और-तो-और अपनी बात को सही साबित करने हेतु उन्होंने अजीब-सी बातें सामने रखीं, जब मैंने उन्हें भी काट दिया, उन बातों को गलत ठहराया और साबित भी कर दिया, तब रचयिता न बड़ा ही अजीब-ओ-गरीब जवाब प्रस्तुत किया, जो मुझे नागवार लगा... मैंने उसपर भी कटाक्ष किया और दूसरे तथ्य सामने रखे... तब उन्होंने मुझे वापस उत्तर नहीं दिया... रात हो चुकी थी सो मुझे लगा कि शायद उन्होंने निद्रासन की और प्रस्थान कर लिया... पर आज सुबह जब मैंने उनके उत्तर हेतु उनका ब्लॉग विसिट किया... तो जवाब तो नहीं ही थे, मेरे कमेंट्स भी मिटा दिए गए थे...
अब मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने ऐसा क्यूं किया??? या तो डर, कि उन्होंने फ़िर कोई जवाब दिया और मै उसे भी गलत साबित कर दूंगी या फ़िर वो निरुत्तर होंगे... परन्तु मेरे कमेंट्स मिटने का अर्थ मुझे अभी-भी समझ नहीं आया...
जहाँ तक मैंने इस ब्लॉग की दुनिया को जाना है, सीधी-सी बात कि यहाँ आपसे भी होशियार लोग हैं, तो उनकी बातें सुननी चाहिए... और हो सकता है आप जो कर रहे हो गलत हो, तो मानना भी चाहिए... परन्तु अपने-आप को सही साबित कने के लिए कभी-भी अभद्रता का, या ऐसे किसी कार्य का सहारा नहीं लेना चाहिए जो आपके डर को, आपके अहम् को प्रस्तुत करे...
मैंने तो जो कुछ, थोडा-बहुत सीखा है यहीं आप लोगों से ही सीखा है, क्योकी मेरे पास कोई लेखकों का आधार नहीं है... सही मायनों में, मेरे घर पर सिर्फ लोग सिर्फ पढ़ते हैं या पढ़ा हुआ लिखते हैं... उन्हें लिखने में कोई रूचि नहीं है...
हो सकता है यहाँ कुछ लोग मेरी बातों से सहमत न हों, तो कृपया मुझे बताएं... आपके कमेंट्स का स्वागत है...
धन्यवाद...

वो आज भी वैसा ही है...


जैसे वो पहले मुझे सताता था
आज भी सताता है...
जैसे वो पहले मुझे रुलाता था,
आज भी रुलाता है
न जाने क्यूं और कैसे वो इतनी मोहब्बत कर लेता है मुझसे?
"वो हमेह्सा मेरे साथ ही रहेगा"
पहले क्या, आज भी यही जताता है मुझे...

पहले अपनी बदमाशियों से,
तो आज अपनी मजबूर बातों से सताता है
पहले अपने गुस्से से
तो आज अपनी यादों से रुलाता है
"न जाने क्या होगा हम दोनों का एक-दूसरे के बिना?"
मैं पूछती हूँ उससे...
पर ऐसा दिन कभी नहीं आने देगा...
यही कहकर हर बार खुद को मेरा बताता है मुझे...

आत्मपरिचय... हरिवंश राय बच्चन {कुछ अंश}

आज मैं यहाँ अपनी कोई राचन लेकर नहीं बल्कि प्रसिद्द कवि, और जो प्रसिद्द रचनाकार भी हैं, जी, "हरिवंश राय बच्चन जी" की ही बात कर रही हूँ. शायद ही आज संपूर्ण भारतवर्ष में इनके नाम से कोई अछूता हो। खैर... पर आज मैं उनकी एक रचना "आत्मपरिचय" की कुछ अंश लेकर प्रस्तुत हुई हूँ, जिन्होंने मुझे बहुत अन्दर तक छुआ... और शायद हर लिखनेवाले की व्यथा यही है...

मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते हो, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ!

आशा करती हूँ आपको भी इन पंक्तियों न छुआ होगा... और इन्हें प्रस्तुत कर मै सफल हुई होंगी।
इन्हें पढ़ मेरे मन में जो आया वो कुछ इस प्रकार था...

"जो गीत तुमने गुनगुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा हाल-ऐ-दिल गा रहे हो
अभी जो तुमने राग सुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा ही तो रुदन सुना रहे हो
कैसे यूं समझ लेते हो, यूं लिख लेते हो तुम
मेरे ह्रदय की पीड़ा को
अभी जो तुमने करुण चित्र दिखाया, ऐसा लगा मनो
मुझे मेरा ही अक्स दिखा रहे हो..."

"प्रोत्साहनम परम सुखम..."

बचपन से हमेशा सुनते आये कि "संतोषम परम सुखम"... और ये बात सही भी है। जब भी आप किसी भी चीज़ में अपने-आप को मना लेते हैं, संतोष कर लेते हैं... या किसी काम को करने में आपको आत्मिक या मानसिक संतोष प्राप्त होता है तो उससे अच्छा काम आपके लिए कुछ और हो ही नहीं सकता, फ़िर चाहे वो काम कितना भी बड़ा या कितना भी छोटा क्यूं न हो?
पर जब भी आप कोई काम करते हैं, अपने लिए, अपनों के लिए या फ़िर किसी और के लिए... और आपके काम को सराहा जाये, उसकी तारीफ की जाए... मतलब आपको प्रेत्साहित किया जाए तो कितनी खुशी होती है न... और इसके विपरीत यदि आपको उस काम के लिए डांटा जाए, फटकारा जाए या कह दिया जाए कि आप उस काम के लायक ही नहीं हैं, आपसे कोई उम्मीद ही नहीं की जा सकती है... आपको हतोत्साहित किया जाए तो मन टूट-सा जाता है, लगता है कि क्योंन हम ही बार-बार बलि का बकरा बने? कभी-कभी तो हम वापस उस समस्या से, उस हालात से लड़ने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु कभी-कभी ऐसी फटकार मिलती है कि बस... लगता है हटाओ, नहीं करना हमें भी कुछ...

और बिलकुल यही होता है जब हम अपने-से छोटों को, या अपने-से नीचे ओहदे में काम करने वालों के साथ करते हैं। उनका भी तो मन टूट जाता होगा जब हम उन्हें अच्छी खासी फटकार लगा देते हैं किसी काम के लिए। पर हमें तो बात सिर्फ अपने लिए ही याद रहती है, दूसरों के साथ यही व्यवहार करते वक़्त हम भूल जाते हैं कि वो भी इंसान हैं, उनके पास भी दिल है, उन्हें भी बुरा लग सकता है। शायद ये मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है... जो हर किसी में सामान होता है।
फटकार लगाते वक़्त लोग ये भूल जाते हैं कि वो जिसे डांट रहे हैं वो उन्ही का कोई ख़ास है, उन्ही के अपनों में से हैऔर इसी भूल में वो अपना नुक्सान करा लेते हैं... आख़िर आपके कुछ अपने आपसे रूठ जाएं, आपके उनके बीच कोई मन-मुटाव हो जाए या आपके लिए उनके दिल में कोई बैर जाए तो वो आपका नुकसान ही है ?
वैसे मैंने कहीं-कहीं देखा है कि, कुछ लोग आपकी गलतियों को भी बड़े प्यार से बताते हैं, समझाते हैं और आपको उसे कैसे सुधारना है ये भी समझाते हैं... तब बड़ा अच्छा लगता है। लगता है जैसे कोई हमारे पास भी है जो हमें सही राह कैसे पकडनी है ये समझा सकता है। हाँ, आजकल ऐसे लोग मिलते बड़े कम हैं...
मुझे भी गुस्सा आता था, मैंने भी कई बार अपने से छोटों को तरीके की फटकार लगाई है, पर ये बात शायद जल्द ही समझ आ गई और मेरा ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। इसीलिये मैंने यह तय किया कि अब मैन भी अपने आदत में सुधार लाऊँगी और डाटने-फटकारने की बजाय आराम-से, समझाउंगी... प्रोत्साहित करूंगी।
वैसे एक बात और है, हमेशा देखा गया है कि प्रोतसाहन पाने वाला इंसान ज्यादा जल्दी एवं ज्यादा अच्छी तरक्की करता है, और जिस बच्चे को प्रोतसाहन प्राप्त होता है वो हमेशा आगे ही होता है और सही दिशा की और अग्रसर रहता है। मतलब प्रोत्साहन में फायदा-ही-फायदा... आपका भी और आपके अपनों का भी...
और जब ये बातें मेरी समझ में आईं तो बस यही बात मेरे मन से निकली...
"प्रोतासाहनम परम सुखम"