सुबह ही तो ज़रा-सी तबियत बिगड़ी थी... सिर्फ सर ही घूमा, थोड़ी-दी उल्टी हुई... पर रात में तो खाना खाई थी... अचानक... रात को 11 बजे... वो हम सब को छोड़ कर चली गई...
न जाने और क्या-क्या अचानक होगा???
पूरी तरह plan बनाया था कि, इस बार उनसे मिलने ज़रूर जाउंगी... और मन भी बहुत था उनसे मिलने का...
वैसे तो वो मेरे दोस्तों की "दादी" थी, पर वो दोनों भी उन्हें माई बोलते थे इसीलिए वो सबकी माई बन गई थीं...
परसों रात से न तो किसी काम में मन लग रहा है और न ही उन दोस्तों से बात करने की हिम्मत हो रही है...
वो कुछ दिन और रुक जाती तो मिल तो लेती मैं...
सब न कहा कि कुछ लिख, पर मन ही नहीं हुआ... सोचा मन हटाने के लिए पुरानी कविताओं को पूरा करने की कोशिश करूँ, पर जो शब्द लिखे थे वो भी समझ नहीं आ रहे थे, आगे लिखती कैसे???
सच कहूँ तो यहाँ भी यूँही लिखे जा रही हूँ जो भी मन में आ रहा है... जाने कौन-सा शब्द किससे मिल रहा है, या नहीं... कोई चिंता नहीं... कुछ नहीं...
परसों रात ही लग रहा था भाग कर जाऊं और उनसे ऐसे ही लिपट कर रो लूं... पर शायद बदकिस्मती ये ही कहलाती है... और मन, वो तो इतना पापी है कि क्या कहूँ???
पहली बार अपनी intuitions पर इतना गुस्सा आ रहा है, चिढ हो रही है... सुबह जब उनकी तबियत कि खबर मिली थी तभे मन में आया था कि बोल दूं कि, "देखे रहना"... फ़िर लगा नहीं यार, ऐसा नहीं सोचते... अपने-आप को समझाया, और रात में...
रिकोर्ड है कि जब भी मेरी और माँ कि कमर दर्द होती है, वो एक अजीब-सा दर्द होता है जो न तो दवाई से ठीक होता है और न ही मालिश से, तब कुछ-न-कुछ अभशगुन होता है...
अभी भी ऐसा ही हो रहा था...
मेरा चचेरा भाई भी नाडियाट में admit है, उसके दोनों kidney fail हो गई हैं, उसकी भी तबिओयत रोज़ खराव्ब होती है... इसीलिए doctors transplant करने की process आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं... बस उसी का डर लगता है रोज़... जब भी फ़ोन आता है, किसी का भी हो, बस भगवान से अर्जी लगाना पहले शुरू कर देते हैं कि सब ठीक रखना...
कहाँ हम उसे ताक कर बैठे थे और कहाँ ये खबर...
हे भगवान!!! वाकई तुम्हारी लीला समझ से बाहर है...
We will miss you MAAI...