न जाने खता क्या हुई थी थी मुझसे...
मेरी तमन्नाएँ बढ़ गयीं थीं...
या
उनके पूरे होने की आरज़ू...
तुम्हारे प्रेम का अर्थ...
क्या प्रेम का अर्थ
केवल आलिंगन है???
या प्रेम और गहराया तो चुम्बन है???
बस यूंही तन की करीबी बढ़ती जाती है
और प्रेम गहराता जाता है...
क्या ह्रदय में उमड़ती प्रेम-भावनाओं का कोई मोल नहीं???
जहाँ छुअन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे की चिंता
जहाँ चुम्बन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे को समझना
जहाँ बदन की ज्व्लंतता का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे के बिना बोले शब्दों को सुनना
या...
एक-दूसरे का अहसास साथ होना...
पर...
तुम ऐसे क्यूं नहीं हो???
तुम्हारे लिए मेरे करीब आना जरूरी क्यूं नहीं???
क्यों तम्हारे लिए मेरे बदन पर तुम्हारे हाथों के निशाँ
से ज्यादा जरूरी
मेरे होठों पे मुस्कान का होना है???
क्यों नाराज़ होने के बाद भी...
तुम हमेशा मेरे साथ खड़े होते हो???
और आसुओं को मेरी आँखों से कोसों दूर रखते हो...
क्यों तुम मेरा चुम्बन नहीं लेते???
वरन... हर बहाने से मुझे खुशियाँ ही देते हो...
क्यों तुम मेरे करीब नहीं आते???
क्यों दूर से ही देख मुस्कुराते हो???
क्यों कोई वादा नहीं करते???
या वादा न तोड़ने की कसम मुझसे लेते हो???
क्या तुम इस दुनिया से अलग हो...
या...
मुझसे प्रेम नहीं करते...
केवल आलिंगन है???
या प्रेम और गहराया तो चुम्बन है???
बस यूंही तन की करीबी बढ़ती जाती है
और प्रेम गहराता जाता है...
क्या ह्रदय में उमड़ती प्रेम-भावनाओं का कोई मोल नहीं???
जहाँ छुअन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे की चिंता
जहाँ चुम्बन का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे को समझना
जहाँ बदन की ज्व्लंतता का उतना महत्व नहीं
जितना एक-दूसरे के बिना बोले शब्दों को सुनना
या...
एक-दूसरे का अहसास साथ होना...
पर...
तुम ऐसे क्यूं नहीं हो???
तुम्हारे लिए मेरे करीब आना जरूरी क्यूं नहीं???
क्यों तम्हारे लिए मेरे बदन पर तुम्हारे हाथों के निशाँ
से ज्यादा जरूरी
मेरे होठों पे मुस्कान का होना है???
क्यों नाराज़ होने के बाद भी...
तुम हमेशा मेरे साथ खड़े होते हो???
और आसुओं को मेरी आँखों से कोसों दूर रखते हो...
क्यों तुम मेरा चुम्बन नहीं लेते???
वरन... हर बहाने से मुझे खुशियाँ ही देते हो...
क्यों तुम मेरे करीब नहीं आते???
क्यों दूर से ही देख मुस्कुराते हो???
क्यों कोई वादा नहीं करते???
या वादा न तोड़ने की कसम मुझसे लेते हो???
क्या तुम इस दुनिया से अलग हो...
या...
मुझसे प्रेम नहीं करते...
मुझे जानना चाहते हो???
यदि जानना चाहते हो मुझे...
तो कभी फुरसत से,
तन्हाई में
शांत मन से
पढ़ना उन अधूरी लाइनों को
उन अधूरे पन्नों को
जो अभी भी उस डायरी में मौजूद हैं...
जो मेरे सिराहने कही रखी है...
तो कभी फुरसत से,
तन्हाई में
शांत मन से
पढ़ना उन अधूरी लाइनों को
उन अधूरे पन्नों को
जो अभी भी उस डायरी में मौजूद हैं...
जो मेरे सिराहने कही रखी है...
इस बार की नवरात्रि कुछ ख़ास है...
सर्वप्रथम आप सभी को नवरात्रों की शुभकामनाएं...
इस बार शरद नवरात्रि शुरू हुई 8 तारीख को... यानी कि बैठकी... वैसे तो नवरात्रि अपने-आप में ख़ास है, आख़िर इसके नौ दिन माता का संपूर्ण आशीर्वाद होता है अपने भक्तों पर... परन्तु इस बार की शुरुआत ही कुछ ख़ास थी...
8 तारिख को मेरी प्यारी-सी भांजी का जन्मदिन पड़ता है, जो इस साल बैठकी के दिन हुआ जो तिथि के अनुसार मेरे भाई का जन्मदिन है... तो हुआ न ख़ास... मातारानी के व्रतों का आरम्भ, भाई और भांजी का जन्मदिन...
ये तो हो गयी बैठकी की बात, अब यदि ज़रा-सा आगे आए तो, 15 तारीख को है अष्टमी, जो मेरे एक कज़िन भैया का जन्मदिन है तिथि के अनुसार और-तो-और उसके ठीक ek दिन पहले दिन, यानी 14 तारिख को उनका इंग्लिश कलेंडर के हिसाब से जन्मदिन... और वो भैया मेरे भाई होने के साथ-साथ बहुत अच्छे दोस्त भी हैं... अब यदि अंत की बात करें... तो दशहरा पड़ रहा है 17 को, जो मेरे एक बहुत ही ख़ास दोस्त का जन्मदिन है...
तो हुई न इस बार की नवरात्रि कुछ ज्यादा ही ख़ास... पर सिर्फ दुःख है तो एक कि मै इस सभी से पार्टी बाद में ही ले पाऊँगी... व्रत में बाहर का नहीं खाते न...
आशा करती हूँ आपकी भी हर नवरात्रि यूँही ख़ास हो...
हाँ मेरी भांजी की फोटो... बताइए तो कैसी लगती है? बस आप इसकी शक्ल पर जाइएगा, क्योंकी ये बहुत बोलती है और चालू भी है...
इस बार शरद नवरात्रि शुरू हुई 8 तारीख को... यानी कि बैठकी... वैसे तो नवरात्रि अपने-आप में ख़ास है, आख़िर इसके नौ दिन माता का संपूर्ण आशीर्वाद होता है अपने भक्तों पर... परन्तु इस बार की शुरुआत ही कुछ ख़ास थी...
8 तारिख को मेरी प्यारी-सी भांजी का जन्मदिन पड़ता है, जो इस साल बैठकी के दिन हुआ जो तिथि के अनुसार मेरे भाई का जन्मदिन है... तो हुआ न ख़ास... मातारानी के व्रतों का आरम्भ, भाई और भांजी का जन्मदिन...
ये तो हो गयी बैठकी की बात, अब यदि ज़रा-सा आगे आए तो, 15 तारीख को है अष्टमी, जो मेरे एक कज़िन भैया का जन्मदिन है तिथि के अनुसार और-तो-और उसके ठीक ek दिन पहले दिन, यानी 14 तारिख को उनका इंग्लिश कलेंडर के हिसाब से जन्मदिन... और वो भैया मेरे भाई होने के साथ-साथ बहुत अच्छे दोस्त भी हैं... अब यदि अंत की बात करें... तो दशहरा पड़ रहा है 17 को, जो मेरे एक बहुत ही ख़ास दोस्त का जन्मदिन है...
तो हुई न इस बार की नवरात्रि कुछ ज्यादा ही ख़ास... पर सिर्फ दुःख है तो एक कि मै इस सभी से पार्टी बाद में ही ले पाऊँगी... व्रत में बाहर का नहीं खाते न...
आशा करती हूँ आपकी भी हर नवरात्रि यूँही ख़ास हो...
हाँ मेरी भांजी की फोटो... बताइए तो कैसी लगती है? बस आप इसकी शक्ल पर जाइएगा, क्योंकी ये बहुत बोलती है और चालू भी है...
एक ओर अजीब-सा फूल...
कुछ दिनों पहले मैंने यहाँ अपने एक पोस्ट धतूरे का एक अजीब फूल प्रस्तुत किया था, जिसमे एक के अन्दर तीन फूल थे... आज फ़िर से एक अजीब सा फूल प्रस्तुत कर रही हूँ... ये बिलकुल लेटेस्ट फोटो नहीं है। हुआ यूं कि आज मै अपना सिस्टम यूं ही देख रही थी, इसी सिलसिले में कुछ पुरानी फोटोस भी देखीं, और ये फोटो नज़र आ गयी तो सोचा क्यूं न इसे भी आप लोगों के साथ शेयर करूँ... ये बेला का फूल है ओर कुछ अजीब है... आप खुद ही देख लीजिये...

वो आज भी वैसा ही है...

जैसे वो पहले मुझे सताता था
आज भी सताता है...
जैसे वो पहले मुझे रुलाता था,
आज भी रुलाता है
न जाने क्यूं और कैसे वो इतनी मोहब्बत कर लेता है मुझसे?
"वो हमेह्सा मेरे साथ ही रहेगा"
पहले क्या, आज भी यही जताता है मुझे...
पहले अपनी बदमाशियों से,
तो आज अपनी मजबूर बातों से सताता है
पहले अपने गुस्से से
तो आज अपनी यादों से रुलाता है
"न जाने क्या होगा हम दोनों का एक-दूसरे के बिना?"
मैं पूछती हूँ उससे...
पर ऐसा दिन कभी नहीं आने देगा...
यही कहकर हर बार खुद को मेरा बताता है मुझे...
शब्दों से दोस्ती...
न जाने क्यूं,
शब्दों से मेरी दोस्ती नहीं हैं...
इसीलिये शायद
कह पाने में असमर्थ होती हूँ
अपनी बात
हर बार...
और यही असमर्थता
खींच लाती है मुझे,
इस कागज़ की ओर...
और अपनी कलम उठा आ जाती हूँ
हर वो बात कहने
अपनी उँगलियों से
जो मेरी जुबां कह नहीं पाती...
शब्दों से मेरी दोस्ती नहीं हैं...
इसीलिये शायद
कह पाने में असमर्थ होती हूँ
अपनी बात
हर बार...
और यही असमर्थता
खींच लाती है मुझे,
इस कागज़ की ओर...
और अपनी कलम उठा आ जाती हूँ
हर वो बात कहने
अपनी उँगलियों से
जो मेरी जुबां कह नहीं पाती...
आत्मपरिचय... हरिवंश राय बच्चन {कुछ अंश}
आज मैं यहाँ अपनी कोई राचन लेकर नहीं बल्कि प्रसिद्द कवि, और जो प्रसिद्द रचनाकार भी हैं, जी, "हरिवंश राय बच्चन जी" की ही बात कर रही हूँ. शायद ही आज संपूर्ण भारतवर्ष में इनके नाम से कोई अछूता हो। खैर... पर आज मैं उनकी एक रचना "आत्मपरिचय" की कुछ अंश लेकर प्रस्तुत हुई हूँ, जिन्होंने मुझे बहुत अन्दर तक छुआ... और शायद हर लिखनेवाले की व्यथा यही है...
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते हो, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ!
आशा करती हूँ आपको भी इन पंक्तियों न छुआ होगा... और इन्हें प्रस्तुत कर मै सफल हुई होंगी।
इन्हें पढ़ मेरे मन में जो आया वो कुछ इस प्रकार था...
"जो गीत तुमने गुनगुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा हाल-ऐ-दिल गा रहे हो
अभी जो तुमने राग सुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा ही तो रुदन सुना रहे हो
कैसे यूं समझ लेते हो, यूं लिख लेते हो तुम
मेरे ह्रदय की पीड़ा को
अभी जो तुमने करुण चित्र दिखाया, ऐसा लगा मनो
मुझे मेरा ही अक्स दिखा रहे हो..."
मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते हो, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!
मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ;
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का सन्देश लिए फिरता हूँ!
आशा करती हूँ आपको भी इन पंक्तियों न छुआ होगा... और इन्हें प्रस्तुत कर मै सफल हुई होंगी।
इन्हें पढ़ मेरे मन में जो आया वो कुछ इस प्रकार था...
"जो गीत तुमने गुनगुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा हाल-ऐ-दिल गा रहे हो
अभी जो तुमने राग सुनाया, ऐसा लगा मनो
मेरा ही तो रुदन सुना रहे हो
कैसे यूं समझ लेते हो, यूं लिख लेते हो तुम
मेरे ह्रदय की पीड़ा को
अभी जो तुमने करुण चित्र दिखाया, ऐसा लगा मनो
मुझे मेरा ही अक्स दिखा रहे हो..."
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