हिंदी दिवस... भाषा उपयोग...

आज, 14 सितम्बर... हिंदी दिवस... हर तरफ सिर्फ हिंदी-हिंदी चिल्लाते लोग... इस भाषा का उपयोग करने के लिए ज़ोर-शोर से लगे हैं... बहुत अच्छा लगता है ये सब देखकर... सच है हम हिन्दुस्तानी कहलाए जाते हैं, और हिंदी हमारी भाषा है, उसका सम्मान करना चाहिए, उसका उपयोग करना चाहिए... सारी बातें एकदम सत्य एवं यदि हम ही इन बातों को न करेंगें तो कौन करेगा???
कल रात, या कह लीजिये की 12 .00 बजे, जैसे ही 14th लगी... वैसे ही हिंदी-दिवस ने अचानक से ज़ोर पकड़ा... फेसबुक पे बधाइयों का सिलसिला चल निकला... विश्व दीपक जी ने शुरुआत की... उनकी पंक्तियाँ कुछ यूं थीं...
"चलो आज आगे बढ़कर सभ्यता के माथे बिंदी दें,
संस्कृति का पुनुरुत्थान करें, भाषा को उसकी हिंदी दें... "
बस इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मैंने भी एक छोटी-सी कोशिश की...
"अब हिंद को हिंदी का उत्थान चाहिए
हर युग की तरह, एक पूर्ण स्थान चाहिए
जो लोग अछूते हैं इस मिठास से, अभी भी
उन्हें इतिहास का ज़रा-सा ज्ञान चाहिए... "

हिंदी-दिवस पे कई पोस्ट पढ़ें, और हिंदी-उत्थान के लिए हमेशा पढ़ती भी रहती हूँ... भाषा को लेकर हमेशा कुछ-न-कुछ लिखा जाता रहता है... जरूरी भी है... परन्तु जो बात मुझे खलती है वो ये की, एक भाषा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए हम दूसरी भाषाओँ को गलत ठहराते हैं... खासतौर पे इंग्लिश को, उसे ही ये दोष दिया जाता है की उसके उपयोग के कारण हम हिंदी को भूलते जा रहे हैं...
बातें एक हद तक सही भी हैं, परन्तु इसमें गलती किसकी है... पोरा सिस्टम ही ऐसा है हमारा, तो क्या करियेगा??? और कई चीज़ें हैं इस सिस्टम में जो बदली भी नहीं जा सकती... और जो बात अखरती है वो "अपमान करना"... किसी भाषा या व्यक्ति या सभ्यता का अपमान करना कोई बहुत अच्छी बात तो नहीं, और ये हमें कभी सिखाया भी नहीं गया, की खुद को सही बताने के लिए हम दूसरों को गलत ठहराएं या दूसरों का अपमान करें... अब यदि मैं करेले की सब्जी नहीं खाती या हमारे घर में कोई उसे पसंद नहीं करता इसका मतलब ये तो नहीं की करेला एक बेकार सब्जी है... इसी तरह यदि हम हिंदी का उपयोग करते हैं, और दुसरे किसी और भाषा का, तो इसका मतलब ये नहीं की वो भाषा ख़राब है... 
खैर!!! ये बातें हटाते हैं, कुछ सिस्टम की बात करते हैं... सब चाहते हैं की उनके बच्चे, भाई-बहन किसी बहुत अच्छे संस्थान में पढ़ें, उच्च शिक्षा ग्रहण करें, एक बहुत ही उच्च पद के अधिकारी हों... इस सबके लिए हमें एक कड़े परिक्षा-प्रक्रिया से गुज़ारना पड़ता है... जिसमें सबसे पहले एक प्रश्न-पत्र हल करना पड़ता है, और फिर साक्षात्कार की प्रक्रिया... अब यदि हम technical-studies की बात करें तो, वो पढाई ही पूरी-की-पूरी इंग्लिश में होती है, तो क्या हम पढाई छोड़ दें??? फिर आती हैं जॉब की बारी, तो technical-studies के बाद आपसे उम्मीद की जाती की आप इंग्लिश में ही बात करेंगें, न भी करें तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं है... और हमारे देश की सबसे अच्छी सर्विसेस मानी जातीं हैं "पब्लिक सर्विसेस" {I.A.S.,I.P.S.,I.P.S,I.F.S.,I.Fo.S.,I.E.S., etc.} और इनके लिए तो आपको भाषा ज्ञान बहुत ही जरूरी है, फिर चाहे वो हिंदी हो, इंग्लिश हो या फिर आपकी क्षेत्रीय भाषा... परन्तु मुझे उसमें भी दिक्कत नहीं है... ये तो सभी जानते हैं... मेरा मेन प्रोब्लम है की हम किसी को गलत क्यों बोंले???
भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, हर भाषा को उतना ही सम्मान, उतना ही आदर जितना किसी दूसरी भाषा को... हर कदम में जहाँ पानी और भाषा बदलती हैं वो हमारा राष्ट्र है... अब उदाहरण के लिए, हमारी क्षेत्रीय भाषा "बघेली" है, परन्तु उसे भी लोगों ने मोडिफाई कर लिया... बघेली खासतौर पे विन्ध्य-क्षेत्र में बोली जाती है, जिसमें रीवा-सीधी-सिंगरौली-सतना-शहडोल शामिल हैं... यहाँ सभी जगह बघेली बोली जाती है, परन्तु हर जगह के हिसाब से उसमें मोडिफिकेशन है जैसे रीवा और सतना सिर्फ 52 km की दूरी पर है, भाषा कहने को बघेली ही है परन्तु लहज़ा और कुछ शब्दों का उपयोग बिलकुल अलग है... तो जहाँ इतनी सी दूरी में भी ऐसी भिन्नता पाई जाए, वहां आप कैसे कह सकते हैं की हर कोई एक भाषा का उपयोग कर रहा है... जी लिखने में बेशक सब एक जैसी ही हिंदी का उपयोग कर रहे हैं... और यदि बात क्षेत्र की हो तो केरल जैसी जगह में हम क्या करेंगे, क्योंकि वहां के तो कल्चर में ही इंग्लिश है... वो यदि अपने भगवान् को भी याद करते हैं तो इंग्लिश में ही करते हैं...
मेरी सोच मुझे एक बात और सोचने के लिए मजबूर कर देती है... जहाँ इतने लोग, इतनी भाषाएँ, इतनी भिन्नता पाई जाए वह यदि एक मंच ऐसा हो जहाँ हम सब एक-दुसरे से जुड़ें, अपनी भिन्नताओं को छोड़ सब एक जैसे ही हो जाएं तो क्या वो गलत है... क्योंकि मेरी नज़र में वो सारी बातें जो भेद-भावना को बढ़ावा दें या भेदभाव करें वो गलत हैं...  और हमें तो हमेशा ही मिलजुल के रहना सिखाया गया है... और यदि हिंदी को बढ़ावा देना है तो प्लीज़ उसके लिए किसी और भाषा का अपमान न करें...

एक बात और, मेरा मानना ये भी है की भाषा कोई भी हो, बस इतनी सरल हो की हर किसी के समझ में आ जाए... शब्द इतने क्लिष्ट न हो की हर शब्द के साथ शब्द-कोष खोलना पड़े... की पता चला, कुछ दिन तो ठीक परन्तु उसके बाद लोग हमें पढना और फिर हमसे बात करना भी छोड़ दें... इसीलिए बातें सरल भाषा में हों तो ज्यादा आसानी होती है... वरना litrature की कमी कम-से-कम हमारे देश में तो नहीं ही है...


P.S. कृपया मेरी इस पोस्ट को ये न समझा जाए की मेन इंग्लिश की पैरवी कर रही हूँ... मुझे कुछ बातें अखरी और मुझे लगा की आज सबसे अच्छा दिन है अपनी इस बात को आप सबके समक्ष रखने का...

28 comments:

  1. आलेख मे व्यक्त विचारों से सहमत।
    हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ।

    सादर

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  3. बहुत सच कहा है. अपनी माँ का महत्व सर्वोपरि है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य स्त्रियाँ पूज्य नहीं हैं.

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  4. हिन्‍दी दिवस की शुभकामनाओं के साथ ...
    इसकी प्रगति पथ के लिये रचनाओं का जन्‍म होता रहे ...

    आभार ।

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  5. आज के दिन का सार्थक लेख...हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएँ याद दिलाने का काम करती हैं कि निज भाषा को भूलें न...

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  6. हिंदी दिवस पर हार्दिक बधाई ....

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  7. हिंदी दिवस पर बहुत ही रोचक और विश्लेष्णात्मक पोस्ट
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    जय हिंद जय हिंदी राष्ट्र भाषा

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  8. निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल।

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  9. हिन्‍दी दिवस की शुभकामनाओं के बाद पूजा यह अवश्य कहूँगा तुम एक ऐसे सच को सामने लाई जिसके बारे मैं जानते सब है लेकिन बोलता कोई नहीं. अपनी मात्रभाषा सभी को प्यारी होती है लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के लिए दूसरी भाषाओँ को सीखना भी आवश्यक हुआ करता है और सीखना भी चाहिए. हाँ अब यदि कोई विज्ञान अंग्रेजी मैं पढ़े और हिंदी बोलने वालों को अपने से कम समझे तो यह अपनी मात्र भाषा का अपमान होगा.
    भाषा कोई भी हो उसका एक महत्व हुआ करता है.
    हम तो जब हिंदी पे आते हैं तो समझते हैं खुद को बड़ा साहित्यकार और इसके लिए ऐसी हिंदी लिखते हैं जो समझ मैं ही ना आये और जब अंग्रेजी पे आते हैं तो अपने हिंदी भाषियों पे ही अंग्रेजी बोल के रोब गांठने लगते हैं. होना तो यही चाहिए जैसे लोग वैसी बोली.

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  10. पूजा जी आपकी बातों से पुर्णतया सहमत हूँ...क्योंकि आज अंग्रेजी को अपना सम्मान समझा जाने लगा है..जो लोग अंग्रेजी जानते है..वो विशिष्ट समझे जाते है...इसीलिए तो सोच बदलने का फेर है......हम खुद में खुश नहीं है....पर कुछ मजबूरीयाँ है...जैसे पूरी दुनिया से जुड़ने के लिए अंतराष्ट्रीय भाषा का ज्ञान जरुरी है....पर अपनी प्यारी मीठी हिन्दी की खिल्ली भी नहीं उड़ायी जाये..इसका ध्यान रखा जाये......अपनी हिन्दी में हर संवेदना के लिए अलग अलग सुंदर शब्द है...पर इंग्लिश में सारी भावनाओं के लिए एक ही शब्द से काम चल जाता है...हिन्दी का विस्तार अनंत है.....बस उसके छुपे वजूद को जाग्रत करने की आवश्यक्ता है....धन्यवाद।

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  11. पूजा जी आप ने बिल्कुल सही कहा..विश्लेष्णत्मक सुन्दर सार्थक पोस्ट के लिए बधाई.....
    हिन्दी है आन हमारी,शान हमारी
    हिन्दी है हमको जान से प्यारी....
    हिन्दी दिवस की बहुत बहुत बधाई...शुभकामनाएँ

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  12. हिन्दी देश की शान, आन बान सब कुछ यही तो है जो पूरे देश में समझी जाती है।

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  13. puja ji,
    aapne sahi kaha ki dusre bhasha ka apmaan na karen. parantu ye bhi sach hai ki hindi bhashiyon ka apmaan hota hai, use heen drishti se dekha jata hai. karan hamari shaikshnik vyawastha hai. sarkaari school hindi maadhyam ke hain, koi bhi nahin chahta ki apne bachche ko wahaan padhaye, kyonki aage ki padhaai ke liye upyukt nahin hai. uchch shiksha ho ya naukri bina angreji ka kaam hi nahin chalta. sabhi praant mein hindi ko aniwaarya kar dena chaahiye, english ek vishay ke roop mein ho to kaafi had tak samasya khatm ho.
    achche lekh ke liye shubhkaamnaayen.

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  14. हिंदी दिवस पर सार्थक चिंतन.

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  15. गहन चिन्तनयुक्त प्रासंगिक लेख....

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  16. हिंदी तो दो पाटों को जोड़ता पुल है। इसी कारण से इसे उस भाषा की अनुगामिनी बनने की नियति प्रदान की गई जिसके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी तन कर खड़ी हुई थी।

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  17. hamari pahchan hindi aur bindi se hai aur use uchit samman jarur milni chahiye.

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  18. जिस एक भाषा को हम कोसते रहते हैं असल में उसी ने यहां ब्‍लागजगत पर हिन्‍दी के उत्‍थान में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस नाते हमें उसका आदर करना चाहिए।
    और केवल नारा लगाने से हिन्‍दी या कोई भी भाषा मजबूत नहीं होती है। वह मजबूत होती है उपयोग करने से।

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  19. अतयंत सार्थक बात रखी है आपने. भाषा की क्लिष्ठता ही उसकी दुश्मन हो जाती है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  20. aur aapki baaten hamen samajh men aa bhi gayin.....

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  21. अच्छा आलेख.
    हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें.

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  22. बहुत बढ़िया |
    बधाई |

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  23. आप से सहमत हूँ पूजा जी एक से अधिक भाषायें सीखना जानना और उनसे फायदा उठाना गलत नही है पर हिंदी हमारी माँ है उसका आदर सम्मान भी हमें ही करना है ।

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  24. आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @यशवंत जी... बहुत-बहुत धन्यवाद, आपको भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं...

    @वंदना जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... तेताला में शामिल करने के लिए...

    @कैलाश अंकल जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... बस यही मतलब...

    @सदा जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... तभी तो प्रगति पथ बना रहेगा...

    @मीनू दीदी... जी जरूर... और शुभकामनाएं बहुत जरूरी हैं... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @सुनील जी... आपको भी...

    @भाई... बहुत-बहुत धन्यवाद... आपको भी...

    @प्रवीण जी... बहुत-बहुत धन्यवाद...

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  25. @मासूम अंकल जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... जी बात यही है... बस समझ-समझ का फर्क है...

    @सत्यम... यही तो बात है... जब हमारी हिंदी अपने आप में एक बहुत शक्तिशाली और सशक्त भाषा है तो हम उसे कमज़ोर क्यों समझते हैं... हम क्यों उसे कमजोर और लाचार मानते हैं... बात उसके उपयोग की है... और हमें यही करना है... बाकी रही दूसरी भाषाओँ की बात तो, सभी का सम्मान करें... बहुत-बहुत धन्यवाद विचारों को शेयर करने के लिए...

    @महेश्वरी जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... आपको भी...

    @जाट जी... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @जेन्नी जी... जी, बहुत-बहुत धन्यवाद... परन्तु मुझे हमेशा यही लगता है कि ऐसा क्यों होता है... क्यों न, हम उन्हें शर्मिन्दा होने पे मजबूर कर दें जो लोग हिंदी-भाषियों का अपमान करते हैं...

    @अभिषेक जी... बहुत-बहुत धन्यवाद...

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  26. @शरद जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... यूं ही उत्साह-वर्धन करते रहें...

    @मनोज जी... जी बिल्कुल... और हिंदी तब भी, अब भी और हमेशा ही महत्वपूर्ण रहेगी... परन्तु तब भी कुछ भाषाओँ का ज्ञान लोगों ने अर्जित किया था, वही आज भी कर रहे हैं... :)
    बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @संध्या जी... जी बिल्कुल सही... और ये उचित सम्मान सिर्फ हम ही दें सकते हैं... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @राजेश अंकल जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... बस यही तो कहना चाह रही हूँ...

    @ताऊ... राम राम ताऊ... बहुत-बहुत धन्यवाद... और मिठास भी ख़त्म हो जाती हैं...

    @चन्दन जी... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @राजीव जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... मतलब मेरा लेख सफल हुआ...

    @बाऊजी... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @रविकर... बहुत-बहुत धन्यवाद...

    @आशा जी... बहुत-बहुत धन्यवाद... जी आपकी बातों से सहमत हूँ, परन्तु एक बात से नहीं, ये फायदा शब्द मुझे भाता ही नहीं है... भाषा तो भाषा है, उसका सम्मान करें न कि ऐसी सोच रखें... और हिंदी सर्वोपरी है...

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